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भाजपा की बड़ी चाल: बिहार के अति पिछड़ा वोटरों पर टिका राजनीतिक दांव

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भाजपा अति पिछड़ा वोट बैंक को आकर्षित करने की रणनीति तैयार कर रही है। पार्टी स्थानीय जातीय समीकरण के साथ नरेन्द्र मोदी के चेहरे का लाभ उठाकर जेडीयू के मजबूत आधार को चुनौती देगी।

पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों जोरदार चर्चा है कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के सबसे मजबूत किले यानी अति पिछड़ा वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट है – अति पिछड़ा वर्ग, जो बिहार की राजनीति में लगभग 36 प्रतिशत मतदाता आधार रखता है, को अपने पाले में लाकर 2025 में विधानसभा में निर्णायक बढ़त हासिल करना।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा अब तक अपनी चुनावी रणनीति में मुख्य रूप से सवर्ण और शहरी वर्ग पर ध्यान केंद्रित करती रही है। 2020 में पार्टी ने 101 उम्मीदवारों में से लगभग आधे सवर्ण वर्ग के चुने थे। लेकिन 2025 में इसका फोकस बदलने की योजना है। पार्टी अति पिछड़ा वोटर, खासकर तेली और अन्य ओबीसी उपवर्गों को अपने समर्थन में लाने के लिए पूरी रणनीति तैयार कर रही है। इस रणनीति के तहत भाजपा मुख्यमंत्री पद पर अति पिछड़ा नेता को आगे लाकर जातीय समीकरण को संतुलित करने की कोशिश करेगी।

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सत्ता संभालने के बाद भाजपा का अगला कदम होगा अति पिछड़ा वर्ग को राजनीतिक सम्मान देना। पार्टी के अंदर इस वर्ग के नेताओं को महत्व देना और उनके चेहरे को प्रचार में दिखाना इसकी प्रमुख योजना है। इसके साथ ही बिहार में नरेन्द्र मोदी के विकास पुरुष और सशक्त नेतृत्व की छवि का भी इस्तेमाल किया जाएगा। मोदी को विधानसभा चुनाव में विशेष रूप से तेली जाति का नेता बताकर अति पिछड़ों के समर्थन को सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में विकास से ज्यादा स्थानीय और जातीय समीकरण असर डालते हैं।

भाजपा की यह रणनीति उत्तर प्रदेश में पार्टी की सफलताओं पर आधारित है। यूपी में गैर-यादव और अति पिछड़ी जातियों के समर्थन से भाजपा ने अकेले दम पर बहुमत हासिल किया था। बिहार में भी पार्टी यही मॉडल अपनाने की तैयारी में है, लेकिन इसका टकराव जेडीयू के साथ होना लगभग तय है। जेडीयू का आधार अति पिछड़ा और महिला वर्ग पर निर्भर करता है, और पार्टी ने 2020 में भी अपनी करारी जीत में अति पिछड़ा वोटरों की महत्वपूर्ण भूमिका देखी थी।

विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा को अगर अकेले सत्ता हासिल करनी है तो उसे अपने पुराने सवर्ण आधार से आगे बढ़कर अति पिछड़ा और ओबीसी वोटरों तक पहुंचना होगा। इसके लिए पार्टी ने जातीय समीकरण के साथ स्थानीय नेताओं और नरेंद्र मोदी के चेहरे का प्रचार माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति तैयार की है। यह रणनीति नीतीश कुमार के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है, क्योंकि जेडीयू का अति पिछड़ा वोट बैंक पार्टी के लिए सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है।

भविष्य में अति पिछड़ा वर्ग की नजर भाजपा और जेडीयू दोनों पर होगी। जब नीतीश कुमार राज्य से बाहर होंगे या केंद्रीय स्तर पर व्यस्त होंगे, तब भाजपा इस वर्ग को अपने समर्थन में लाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार की विधानसभा चुनाव राजनीति में जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाता है और इस बार भाजपा इसे अपने पक्ष में मोड़ने की तैयारी कर रही है।

पार्टी रणनीतिकारों का अनुमान है कि अति पिछड़ा वोट बैंक को आकर्षित करने की सफलता भाजपा को विधानसभा में निर्णायक बढ़त दिला सकती है। इसके लिए पार्टी स्थानीय मुद्दों, जातीय संतुलन और नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का संयोजन करेगी। इस पूरी रणनीति से यह स्पष्ट है कि बिहार की आगामी राजनीति में अति पिछड़ा वर्ग केंद्र में रहेगा और चुनावी समीकरणों को नया आयाम देगा।

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