मोहम्मद आलम
पटना: सरकार कितनी भी zero tolerance के नारे लगा ले — सच्चाई जमीन पर कुछ और ही रंग दिखाती है। लोग कहते हैं कि बिहार में अब ‘नोट और नाम’ तय करते हैं कि आपका काम होगा या नहीं: थाना से लेकर प्रखंड‑अंचल, अंचल से अनुमंडल, अनुमंडल से ज़िला और ज़िला से राजधानी तक — हर जगह रिश्वत और रेत‑दारों वाली mafias जैसी व्यवस्था रचनात्मक रूप से कार्य कर रही है।स्थानीय शिकायतें साधारण नहीं हैं कई मामलों में पुलिस, प्रशासकीय अफसर और स्कीमों के संचालक सीधे रूप से लाभकारी नेटवर्क से जुड़े पाए जा चुके हैं। पिछले महीनों में पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के खिलाफ मिली शिकायतों और दर्ज मामलों ने इस अव्यवस्था की तस्वीर साफ़ की है।
“लक्ष्मीकांत‑प्यारेलाल” और ‘पहले पैसे’ की संस्कृति
गाँव‑कस्बों में आम आदमी का कहना है पहले लक्ष्मीकांत‑प्यारेलाल का नाम पूछते हैं। जिसने दिया, उसका काम हुआ; जिसने नहीं दिया, चाहे जो दफ्तर हो, काम ठहर गया।” यह सिर्फ़ गुस्से की बात नहीं — भर्ती, सब्सिडी, पेंशन, बिजली‑कनेक्शन जैसी आम सेवाओं में रिश्वत के ताज़ा मामले और पटना‑बाहरी जिलों में अधिकारियों पर छापेमारी/सस्पेंशन इस पर दस्तक दे चुके हैं।
कार्रवाई है — पर पद्धति सतही और नाकाफी
बिहार में कभी‑कभार तस्वीरें बदलती भी हैं: कुछ थानेदार निलंबित हुए, कुछ अफसरों के खिलाफ छापेमारी हुई — पर आम धारणा यही है कि यह “छोटे पांव की कार्रवाई” है, जड़ से लड़ाई नहीं। विशेषज्ञों और एक्टिविस्ट्स का कहना है कि भ्रष्टाचार के नेटवर्क को तोड़ने के लिए लगातार, पारदर्शी और उच्च‑स्तरीय जांच की ज़रूरत है।न कि केवल समय‑समय पर नाटकीय गिरफ्तारी। पिछले कुछ मामलों में भर्ती पर भ्रष्टाचार और पॉजिटिव कार्रवाई के बीच यही खिंचाव देखा गया।
सत्ता ऊपर भी सुरक्षित नहीं — आरोप और राजनीतिक उठा-पटक
सरकार के शीर्ष पर भी बदलते बयान और एक दूसरे पर आरोप‑प्रत्यारोप की राजनीति चल रही है। कुछ बड़े राजनीतिक आरोपों ने सूबे की सियासत में हलचल मचा दी है।और इन परिस्थितियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तविक इच्छाशक्ति पर सवाल उठते हैं। बड़े आरोपों और स्थानीय शिकायतों के बीच फर्क साफ़ है: लोग जमीन पर रोज़ की रिश्वत का किस्सा सुनाते हैं; पोलिटिकल स्कैन्डल्स पर जुड़ी जांचें अक्सर माहौल में ही गुम हो जाती हैं।
जनता का दर्द — जब हर काम ‘बेतहाशा भुगतान’ के पीछे टिका हो
एक सामान्य नागरिक का जीवन‑चक्र अब इस तरह चल रहा है: किसी भी सरकारी काम के लिए दफ्तर का चक्कर, फिर समिल्लित ‘रिश्वत‑प्रक्रिया’, और अंततः या तो काम हो जाता है या परिवार की गरिमा सार्वजनिक धन्यवाद‑सूची में बदल दी जाती है। लोग पूछ रहे हैं — क्या यह मुल्क का विकास है? या बस शानो‑शौकत वाला मामला?
क्या किया जा सकता है? — त्वरित सुझाव
पारदर्शिता: सभी लाभार्थियों के नाम और भुगतानों का सार्वजनिक पोर्टल।
ऑडिट‑मकेनिज्म: स्कीमों का नियमित तीसरे पक्ष का ऑडिट।
सख्त और निरपेक्ष जांच: रैंगलिंग नेटवर्क टूटने पर तेज़ और निष्पक्ष जांच।
लोकल शिकायत‑हॉटलाइन: छोटे‑नगरों के लिए मोबाइल‑आधारित व्हिसलब्लोअर सिस्टम।
निष्कर्ष: बिहार की ‘zero tolerance’ नीतियाँ पोस्टरों पर दमक सकती हैं।लेकिन जब प्रशासनिक लोकतंत्र की बुनियाद पर रिश्वत और नाम‑वार एहसान गिनने की संस्कृति हावी हो, तो नारे हवा में रह जाते हैं। बदलना होगा सिस्टम — नहीं तो जनता की इज्जत, जिसे सरकार मुफ्त बिजली या पैकेज देकर ‘छुपा’ देती है, लगातार बिकती रहेगी।