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झारखंड में ‘ट्रेजरी घोटाले’ से हड़कंप, दो कोषागारों से करोड़ों की संदिग्ध निकासी ने बढ़ाई चिंता

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बोकारो और हजारीबाग ट्रेजरी से करोड़ों की निकासी का मामला उजागर, राज्य की सभी कोषागारों की जांच के आदेश

रांची/आलम की खबर:झारखंड में सरकारी कोषागारों से संदिग्ध निकासी का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। शुरुआती जांच में दो अलग-अलग जिलों—बोकारो और हजारीबाग—के कोषागारों से करोड़ों रुपये के गड़बड़झाले का खुलासा हुआ है। यह मामला अब केवल वित्तीय अनियमितता भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सरकारी निगरानी तंत्र, ट्रेजरी नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करने वाली घटना के रूप में देखा जा रहा है। राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सभी 33 ट्रेजरी और सब-ट्रेजरी की व्यापक जांच कराने का फैसला किया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने 90 के दशक के उस चर्चित वित्तीय घोटाले की यादें भी ताजा कर दी हैं, जब अविभाजित बिहार में सरकारी कोषागारों से बड़े पैमाने पर फर्जी निकासी का मामला सामने आया था। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मामला झारखंड की वर्तमान वित्तीय व्यवस्था के बीच उजागर हुआ है, और शुरुआती संकेत बता रहे हैं कि यदि जांच गहराई तक गई तो आंकड़ा अभी सामने आई रकम से कहीं ज्यादा भी हो सकता है।

दो जिलों से शुरू हुआ मामला, लेकिन आशंका राज्यव्यापी

फिलहाल जिन दो मामलों ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, उनमें बोकारो ट्रेजरी से करीब 4.30 करोड़ रुपये और हजारीबाग कोषागार से लगभग 15 करोड़ रुपये की संदिग्ध निकासी शामिल है। कुल मिलाकर शुरुआती स्तर पर लगभग 19 करोड़ रुपये से अधिक की अनियमितता सामने आई है। हालांकि प्रशासनिक हलकों में यह आशंका जताई जा रही है कि यह रकम यहीं तक सीमित नहीं हो सकती और जांच बढ़ने के साथ घोटाले का दायरा 50 करोड़ रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि मामला किसी एक विभागीय चूक या एकल भुगतान त्रुटि तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि इसमें सिस्टम स्तर पर छेड़छाड़, फर्जी बिलिंग और भुगतान प्रक्रिया के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। यही वजह है कि सरकार ने इसे एक सामान्य वित्तीय गड़बड़ी मानने के बजाय व्यापक ऑडिट और बहुस्तरीय जांच का विषय बनाया है।

बोकारो में रिटायर कर्मी के नाम पर निकासी का आरोप

बोकारो ट्रेजरी से जुड़े मामले में जांच एजेंसियों को जो शुरुआती जानकारी मिली है, उसने पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी को कागजों पर फिर से सेवा में दिखाकर उनके नाम पर लंबे समय तक वेतन निकाला गया। जांच के अनुसार, संबंधित व्यक्ति पहले ही वर्षों पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन दस्तावेजी हेरफेर के जरिए उन्हें सेवा में दिखाते हुए महीनों तक वेतन आहरित किया जाता रहा।

जांच में यह भी सामने आया कि कथित तौर पर वेतन बिलों को तैयार करने और भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सिस्टम के भीतर से छेड़छाड़ की गई। आरोप है कि बिल मैनेजमेंट सिस्टम में बदलाव कर फर्जी भुगतान की राह बनाई गई। इस मामले में एक लेखा संबंधी अधिकारी की गिरफ्तारी भी की गई है और उसके बैंक लेन-देन की जांच शुरू हो चुकी है। अधिकारियों का दावा है कि अवैध रूप से निकाली गई राशि का कुछ हिस्सा निजी खातों में ट्रांसफर किया गया, जिसके बाद संबंधित बैंक खातों को फ्रीज करने की कार्रवाई की गई।

बैंक खातों और डिजिटल सिस्टम की पड़ताल तेज

बोकारो प्रकरण ने यह भी साफ कर दिया है कि अब जांच केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहने वाली। डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रेल, भुगतान मंजूरी की प्रक्रिया, ट्रेजरी एंट्री, डीडीओ स्तर के बिल और स्वीकृति श्रृंखला—इन सभी की गहन पड़ताल की जा रही है। इससे यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि फर्जी भुगतान की प्रक्रिया किस स्तर से शुरू हुई और किन-किन लोगों की भूमिका इसमें संदिग्ध हो सकती है।

यह भी माना जा रहा है कि यदि एक सेवानिवृत्त कर्मी के नाम पर इतनी लंबी अवधि तक भुगतान निकलता रहा, तो इसका मतलब यह है कि सिस्टम में कई स्तरों पर या तो गंभीर लापरवाही हुई, या फिर मिलीभगत के साथ काम हुआ। यही पहलू इस मामले को और गंभीर बना देता है।

हजारीबाग में भी 15 करोड़ से ज्यादा की संदिग्ध निकासी

बोकारो मामले की जांच चल ही रही थी कि हजारीबाग ट्रेजरी से भी 15 करोड़ रुपये से अधिक की संदिग्ध निकासी की जानकारी सामने आ गई। इस खुलासे ने राज्य सरकार और वित्त विभाग की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। शुरुआती स्तर पर वहां भी कुछ खातों को चिन्हित कर फ्रीज किया गया है और दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की गई है।

हजारीबाग प्रकरण को लेकर अभी विस्तृत आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है, लेकिन जिस पैमाने पर रकम की बात हो रही है, उसने संकेत दे दिया है कि यह मामला अलग-थलग घटना नहीं भी हो सकता। यदि दो अलग-अलग जिलों में इस तरह की निकासी सामने आई है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं और भी इसी तरह की अनियमितताएं छिपी हो सकती हैं। यही वजह है कि अब जांच का दायरा जिला-विशेष से निकलकर राज्यव्यापी हो चुका है।

सरकार ने मानी निगरानी तंत्र की विफलता

मामले के सामने आने के बाद राज्य सरकार की ओर से भी इसे गंभीर प्रशासनिक चूक के रूप में देखा गया है। वित्त विभाग से जुड़े शीर्ष स्तर पर यह स्वीकार किया गया है कि यह सिर्फ ट्रेजरी स्तर की गड़बड़ी नहीं, बल्कि निगरानी और नियंत्रण प्रणाली की विफलता का मामला भी है। यही कारण है कि सभी जिलों के उपायुक्तों और संबंधित अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र की ट्रेजरी और सब-ट्रेजरी की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।

सूत्रों के अनुसार, बोकारो में मामला उजागर होने के बाद राज्यभर के पुलिस अधीक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों को भी सतर्क किया गया, ताकि संभावित वित्तीय गड़बड़ियों की समय रहते पहचान की जा सके। कई जिलों में अब आंतरिक ऑडिट, भुगतान सत्यापन और पुराने बिलों की फाइलों की जांच शुरू कर दी गई है। इससे आने वाले दिनों में और भी चौंकाने वाले खुलासों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बोकारो में कार्रवाई तेज, भुगतान प्रक्रिया पर सख्ती

बोकारो में प्रशासन ने शुरुआती स्तर पर सख्ती दिखाते हुए कुछ जिम्मेदार कर्मियों पर कार्रवाई की है। विभागीय स्तर पर संबंधित लेखा कर्मियों को हटाने, भुगतान प्रक्रिया की समीक्षा करने और नए बिलों के भुगतान पर अस्थायी रोक जैसे कदम उठाए गए हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जांच पूरी होने तक किसी तरह की नई गड़बड़ी न हो और ट्रेजरी सिस्टम पर तत्काल नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

उपायुक्त स्तर पर भी वित्तीय अनुशासन मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। माना जा रहा है कि आगे विभागीय दंड, निलंबन, एफआईआर और रिकवरी जैसी कार्रवाइयां भी जांच के निष्कर्षों के आधार पर हो सकती हैं। इस पूरे मामले ने सरकारी भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता और रियल-टाइम निगरानी की जरूरत को फिर से रेखांकित कर दिया है।

हजारीबाग में जांच टीम सक्रिय, हिरासत की चर्चा

हजारीबाग में भी जिला प्रशासन ने मामले की जांच के लिए विशेष टीम गठित की है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि कुछ लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है, हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। लेकिन यह साफ है कि वहां भी मामला गंभीरता से लिया जा रहा है और दस्तावेजी जांच के साथ-साथ संबंधित लोगों की भूमिका खंगाली जा रही है।

जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे यह तय करें कि यह घोटाला किसी सीमित गिरोह का काम था, या फिर इसमें कई स्तरों पर फैली मिलीभगत शामिल है। यदि दूसरी संभावना सही साबित होती है, तो यह मामला झारखंड की वित्तीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक बड़े झटके के रूप में दर्ज होगा।

क्या यह ‘नया चारा घोटाला’ साबित होगा?

इस पूरे प्रकरण की तुलना पुराने चारा घोटाले से की जा रही है, लेकिन फिलहाल इस तुलना को प्रतीकात्मक स्तर पर ही देखना ज्यादा उचित होगा। दोनों मामलों में समानता केवल इतनी है कि सरकारी कोषागारों से संदिग्ध तरीके से धन निकासी की बात सामने आई है। लेकिन वर्तमान मामले की वास्तविक प्रकृति, पैमाना और जिम्मेदार लोगों की भूमिका जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

फिर भी, यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि यदि ट्रेजरी जैसे संवेदनशील वित्तीय तंत्र में इस स्तर की गड़बड़ी संभव हुई, तो नियंत्रण और ऑडिट प्रणाली आखिर किस हद तक प्रभावी है। यही सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

अब सबकी नजर जांच पर

फिलहाल झारखंड में यह मामला प्रशासनिक सतर्कता, वित्तीय अनुशासन और सरकारी जवाबदेही की अग्निपरीक्षा बन चुका है। राज्य सरकार ने जांच के आदेश देकर शुरुआती कदम जरूर उठाया है, लेकिन असली चुनौती यह होगी कि जांच कितनी निष्पक्ष, कितनी व्यापक और कितनी प्रभावी साबित होती है। यदि दोषियों तक कार्रवाई पहुंचती है और सिस्टम की खामियों को दूर किया जाता है, तो यह राज्य के लिए सुधार का अवसर भी बन सकता है। लेकिन अगर मामला सिर्फ शुरुआती हलचल तक सीमित रह गया, तो यह आने वाले समय में और बड़े संकट की जमीन भी तैयार कर सकता है।

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