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बिहार में स्पीकर पद पर सियासी घमासान: नई सरकार से पहले NDA में खींचतान तेज

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बिहार में नई सरकार गठन से पहले विधानसभा अध्यक्ष पद को लेकर NDA में हलचल तेज हो गई है। BJP और JDU के बीच संतुलन साधने की कोशिश जारी है, 14 अप्रैल तक बड़े फैसले की उम्मीद है।

पटना/आलम की खबर: बिहार में नई सरकार के गठन की कवायद तेज होते ही अब सत्ता के अहम पदों को लेकर सियासी सरगर्मी भी बढ़ गई है। मुख्यमंत्री पद के साथ-साथ अब विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर भी एनडीए के भीतर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। मौजूदा समय में यह पद भाजपा के पास है, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच जदयू इस पर अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुट गया है।

राजनीतिक सूत्रों की मानें तो इस बार सत्ता संतुलन के तहत दोनों प्रमुख सहयोगी दलों के बीच पदों के बंटवारे को लेकर मंथन जारी है। चर्चा यह है कि यदि मुख्यमंत्री भाजपा खेमे से आता है, तो जदयू विधानसभा अध्यक्ष का पद अपने हिस्से में लेने की रणनीति पर काम कर रहा है। पिछले वर्षों में भी इसी तरह के संतुलन का फॉर्मूला देखने को मिला है, जहां एक दल के पास मुख्यमंत्री और दूसरे के पास विधानसभा अध्यक्ष का पद रहा है।

बिहार की राजनीति में यह परंपरा कई बार देखने को मिली है। जब जदयू के नेतृत्व में सरकार बनी, तब भाजपा को विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। अब परिस्थितियां उलटती दिख रही हैं, ऐसे में जदयू इस समीकरण को अपने पक्ष में करना चाहता है।

सूत्रों का कहना है कि आने वाले कुछ दिनों में मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष दोनों पदों को लेकर अंतिम सहमति बन सकती है। 14 अप्रैल तक तस्वीर साफ होने की संभावना जताई जा रही है, जिस पर पूरे राजनीतिक गलियारे की नजर टिकी हुई है।

इतिहास पर नजर डालें तो बिहार में सत्ता संतुलन बनाए रखने के लिए अलग-अलग दलों के बीच महत्वपूर्ण पदों का बंटवारा होता रहा है। कभी महागठबंधन के दौर में सहयोगी दल को विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली, तो कभी एनडीए के भीतर यह पद सहयोगी दलों के बीच संतुलन का माध्यम बना।

मौजूदा हालात में जदयू केवल विधानसभा अध्यक्ष पद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सरकार में अहम विभागों पर भी अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। खास तौर पर गृह विभाग को लेकर पार्टी की दिलचस्पी बनी हुई है। पहले यह विभाग मुख्यमंत्री के पास रहता था, लेकिन बाद में इसे उपमुख्यमंत्री को सौंपा गया था। अब जदयू चाहता है कि नई सरकार में यह विभाग उसके हिस्से में आए।

उपमुख्यमंत्री पद को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं और पार्टी के भीतर कई नामों पर विचार किया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि जदयू को यह जिम्मेदारी मिलती है, तो विधानसभा अध्यक्ष पद पर किसी नए सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश की जा सकती है, खासकर अतिपिछड़ा वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार सरकार गठन केवल मुख्यमंत्री के चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें सहयोगी दलों के बीच संतुलन, सामाजिक समीकरण और भविष्य की रणनीति का पूरा गणित शामिल होगा।

कुल मिलाकर, बिहार में नई सरकार के गठन से पहले सत्ता के शीर्ष पदों को लेकर चल रही यह रस्साकशी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। अब सभी की निगाहें 14 अप्रैल पर टिकी हैं, जब यह साफ हो जाएगा कि सत्ता के समीकरण किस दिशा में जाते हैं और कौन-कौन से चेहरे अहम जिम्मेदारियों में नजर आएंगे।

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