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IGIMS में परीक्षा घोटाले का आरोप, पेपर लीक और कॉपी में छेड़छाड़ की जांच शुरू

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पटना के IGIMS में एमबीबीएस और पीजी परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में छेड़छाड़ के आरोप लगे हैं। 28 दिन बाद जांच समिति गठित, 7 दिन में रिपोर्ट।

पटना/आलम की खबर:राजधानी पटना स्थित Indira Gandhi Institute of Medical Sciences (IGIMS) एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गया है। इस बार मामला मेडिकल शिक्षा की विश्वसनीयता से जुड़ा है, जहां एमबीबीएस और पीजी अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में छेड़छाड़ के आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों ने न केवल संस्थान की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे राज्य की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था को भी कटघरे में ला खड़ा किया है।

मामले की शुरुआत एक बेनाम ईमेल से हुई, जिसमें 13 मार्च को ही परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी और पेपर लीक की शिकायत दर्ज कराई गई थी। हालांकि, इस गंभीर शिकायत के बावजूद संस्थान की ओर से तत्काल कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब जब मामला सार्वजनिक हुआ और चर्चा में आया, तब जाकर करीब 28 दिनों बाद जांच समिति का गठन किया गया है।

निदेशक की छुट्टी ने बढ़ाए सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे का अचानक छुट्टी पर चले जाना भी चर्चा का विषय बन गया है। जब मीडिया टीम मामले की पड़ताल के लिए संस्थान पहुंची, तो निदेशक कार्यालय से उनके अवकाश पर होने की जानकारी दी गई। ऐसे समय में जब संस्थान पर गंभीर आरोप लग रहे हों, शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी का अनुपस्थित रहना कई सवाल खड़े कर रहा है।

जांच के लिए बनी चार सदस्यीय समिति

मामले की गंभीरता को देखते हुए IGIMS प्रशासन ने चार सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता पीएसएम विभागाध्यक्ष डॉ. संजय कुमार को सौंपी गई है, जबकि अन्य सदस्यों में डॉ. ज्ञान भाष्कर और डॉ. अश्विनी शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी प्रभारी निदेशक सह डीन (अकादमिक) डॉ. ओम कुमार कर रहे हैं।

प्रभारी निदेशक डॉ. ओम कुमार के अनुसार, समिति को सात कार्य दिवस के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।

प्रिंसिपल को जांच से बाहर रखने पर विवाद

इस मामले में एक और बड़ा विवाद सामने आया है, जो जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा कर रहा है। IGIMS के प्रिंसिपल डॉ. रंजीत गुहा ने खुद को जांच प्रक्रिया से बाहर रखे जाने पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि यह मामला सीधे तौर पर एमबीबीएस और पीजी छात्रों से जुड़ा है, जो उनके अधिकार क्षेत्र में आता है, इसके बावजूद उन्हें न तो किसी बैठक में बुलाया गया और न ही जांच समिति में शामिल किया गया।

डॉ. गुहा ने यह भी दावा किया कि 13 मार्च से अब तक इस मुद्दे पर कई बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें किसी भी बैठक की जानकारी नहीं दी गई। यहां तक कि आंतरिक स्तर पर हुई चर्चाओं से भी उन्हें दूर रखा गया, जिससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।

पेपर लीक और कॉपी में हेरफेर के गंभीर आरोप

सूत्रों के अनुसार, इस मामले का सबसे गंभीर पहलू परीक्षा में धांधली के लिए कथित रूप से पैसों का लेन-देन है। आरोप है कि एमबीबीएस अंतिम वर्ष की परीक्षा में पेपर लीक कराने और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर के लिए लाखों रुपये की डील की गई।

यह भी आरोप सामने आया है कि कुछ छात्रों की कॉपियां बाहर से लिखवाई गईं और बाद में उन्हें सिस्टम में समायोजित किया गया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा, बल्कि मेडिकल पेशे की साख पर भी गहरा आघात पहुंचेगा।

सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियों के संकेत

मामले से जुड़े सूत्रों का दावा है कि परीक्षा शाखा में लगे सीसीटीवी कैमरों में कुछ संदिग्ध गतिविधियां भी कैद हुई हैं। फुटेज में कुछ परीक्षार्थियों का असामान्य समय पर आना-जाना देखा गया है, जिससे संदेह और गहरा गया है। हालांकि, इन दावों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन जांच समिति इन पहलुओं की भी पड़ताल कर रही है।

पहले भी मिली थीं अनियमितताओं के संकेत

जानकारी के अनुसार, इस मामले में पहले भी एक प्रारंभिक जांच की गई थी, जिसमें कुछ अनियमितताओं के संकेत मिले थे। इसके बावजूद उस समय कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। यही वजह है कि अब जब मामला सामने आया है, तो संस्थान की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

छात्रों के भविष्य पर मंडरा रहा खतरा

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ सकता है। यदि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित होती है, तो इससे हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। मेडिकल जैसी संवेदनशील और जिम्मेदार पेशे में इस तरह के आरोप बेहद गंभीर माने जाते हैं।

छात्रों और उनके अभिभावकों के बीच भी इस मामले को लेकर चिंता का माहौल है। कई लोग निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

सात दिन में रिपोर्ट, फिर होगी कार्रवाई

फिलहाल सभी की नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हुई है। समिति को सात कार्य दिवस के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसमें शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई की संभावना है।

मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ IGIMS तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों को सजा मिल सके।

सरकार और प्रशासन के लिए भी यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, जहां उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों। मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और भरोसे को बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा होता है।

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