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लैंड फॉर जॉब्स केस में लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, ट्रायल में धारा 17A पर उठेगा सवाल

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सुप्रीम कोर्ट ने लैंड फॉर जॉब्स मामले में लालू यादव को बड़ी राहत दी है। उन्हें धारा 17A पर ट्रायल में सवाल उठाने की अनुमति और व्यक्तिगत पेशी से छूट मिल गई है।

नई दिल्ली/आलम की खबर:राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख Lalu Prasad Yadav को ‘लैंड फॉर जॉब्स’ मामले में सुप्रीम कोर्ट से अहम राहत मिली है, जिसने इस बहुचर्चित केस की दिशा को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। सर्वोच्च अदालत ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A की वैधता को ट्रायल कोर्ट में चुनौती देने की अनुमति देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि इस कानूनी प्रश्न पर अंतिम निर्णय निचली अदालत ही करेगी। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने से भी छूट प्रदान कर दी है, जिससे इस लंबे कानूनी संघर्ष में उन्हें आंशिक राहत मिलती दिखाई दे रही है और आगे की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार हो गया है।

यह फैसला Supreme Court of India की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति M. M. Sundresh और न्यायमूर्ति N. Kotiswar Singh शामिल थे, ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि वह इस समय इस बात पर कोई अंतिम राय नहीं दे रही है कि धारा 17A इस मामले में लागू होती है या नहीं, बल्कि यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर विस्तृत सुनवाई और तथ्यों के परीक्षण के बाद ट्रायल कोर्ट को ही निर्णय लेना होगा। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने न केवल इस मुद्दे को खुला रखा, बल्कि लालू यादव को अपनी कानूनी दलीलों को पूरी मजबूती से रखने का अवसर भी प्रदान किया है।

इस मामले का मूल विवाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A को लेकर है, जो किसी भी लोकसेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति को अनिवार्य बनाती है, यदि आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े हों। लालू यादव की ओर से यह तर्क दिया गया है कि जब उन पर लगे आरोप उनके मंत्री पद के दौरान लिए गए निर्णयों से जुड़े हैं, तो जांच एजेंसी को पहले अनुमति लेनी चाहिए थी। यदि यह तर्क ट्रायल कोर्ट में स्वीकार कर लिया जाता है, तो इससे पूरे मामले की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं और जांच की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।

इससे पहले Delhi High Court ने लालू यादव की इसी आधार पर दायर याचिका को खारिज कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि हाई कोर्ट का आदेश ट्रायल कोर्ट में इस मुद्दे को उठाने में बाधा नहीं बनेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब ट्रायल के दौरान इस कानूनी पहलू पर विस्तार से बहस होगी और अदालत इस बात का परीक्षण करेगी कि धारा 17A का इस मामले में क्या प्रभाव पड़ता है।

‘लैंड फॉर जॉब्स’ मामला वर्ष 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री के पद पर थे। Central Bureau of Investigation (सीबीआई) का आरोप है कि उस दौरान रेलवे में ग्रुप-डी की भर्तियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिवारों से जमीन ली गई और बाद में वह जमीन लालू यादव के परिवार या उनसे जुड़ी संस्थाओं के नाम पर ट्रांसफर कर दी गई। जांच एजेंसी का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई और बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं, जिसके चलते यह मामला देश के चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में शामिल हो गया।

सीबीआई द्वारा 10 अक्टूबर 2022 को दाखिल चार्जशीट में Rabri Devi और Misa Bharti समेत कुल 16 लोगों को आरोपी बनाया गया है। यह मामला फिलहाल ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन है और अब सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद इसकी सुनवाई एक नए कानूनी आयाम के साथ आगे बढ़ेगी।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने यह दलील दी कि धारा 17A उन मामलों में लागू होती है, जहां संबंधित व्यक्ति सीधे निर्णय लेने की स्थिति में हो। उनका कहना था कि लालू यादव के मामले में यह शर्त पूरी तरह लागू नहीं होती। वहीं बचाव पक्ष ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि यदि आरोप उनके आधिकारिक कार्यकाल से जुड़े हैं, तो बिना अनुमति जांच शुरू करना कानून के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर कोई अंतिम निर्णय दिए बिना यह स्पष्ट कर दिया कि इन सभी पहलुओं पर ट्रायल कोर्ट ही विस्तार से विचार करेगा।

अदालत द्वारा व्यक्तिगत पेशी से छूट दिया जाना भी इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। इसका अर्थ है कि अब लालू यादव को हर सुनवाई में शारीरिक रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी और उनके वकील उनकी ओर से अदालत में पेश होकर पक्ष रख सकेंगे। इससे उन्हें स्वास्थ्य और उम्र के मद्देनजर बड़ी राहत मिली है और कानूनी प्रक्रिया कुछ हद तक आसान हो गई है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लालू यादव के लिए अंतरिम राहत जरूर लेकर आया है, लेकिन इससे केस खत्म नहीं हुआ है। अब असली लड़ाई ट्रायल कोर्ट में होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि धारा 17A इस मामले पर लागू होती है या नहीं और इसका प्रभाव पूरे मुकदमे पर किस तरह पड़ता है। आने वाले दिनों में इस केस की सुनवाई न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसका असर बिहार की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

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