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मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल में अमरनाथ यात्रा सर्टिफिकेट घोटाला, ₹1000 में बिना जांच फिटनेस प्रमाणपत्र देने का खुलासा

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मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल में अमरनाथ यात्रा के मेडिकल सर्टिफिकेट के नाम पर ₹1000 लेकर बिना जांच फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने का गंभीर मामला सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग ने जांच के आदेश दिए हैं।

मुजफ्फरपुर/आलम की खबर:मुजफ्फरपुर जिले के सदर अस्पताल से एक ऐसा गंभीर मामला सामने आया है, जिसने पूरे स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमरनाथ यात्रा के लिए अनिवार्य हेल्थ सर्टिफिकेट (CHS) जारी करने के नाम पर खुलेआम अनियमितता और अवैध वसूली का बड़ा खेल चल रहा है। आरोप है कि अस्पताल परिसर में सक्रिय कुछ कर्मी और बिचौलिए श्रद्धालुओं से ₹1000 लेकर बिना किसी शारीरिक जांच के फिटनेस सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं। यह खुलासा सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

अमरनाथ यात्रा जैसी कठिन और ऊंचाई वाली धार्मिक यात्रा के लिए स्वास्थ्य प्रमाणपत्र बेहद जरूरी होता है, क्योंकि इस यात्रा में ऑक्सीजन की कमी, ठंड और कठिन चढ़ाई के कारण कई बार श्रद्धालुओं की जान पर खतरा बन जाता है। ऐसे में मेडिकल जांच के बाद ही किसी व्यक्ति को फिट घोषित किया जाता है। लेकिन मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल में इस प्रक्रिया को मजाक बना दिया गया है।

बिना जांच के जारी हो रहे सर्टिफिकेट, सिस्टम पर गंभीर सवाल

जांच के दौरान सामने आया है कि अस्पताल में आने वाले श्रद्धालुओं को कई दिनों तक चक्कर कटवाया जाता है। लंबी कतारों, कागजी प्रक्रिया और डॉक्टरों की अनुपलब्धता के कारण लोग परेशान हो जाते हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर कुछ बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं और ₹1000 की मांग करते हैं।

जैसे ही पैसा दिया जाता है, बिना किसी ब्लड प्रेशर जांच, बिना ECG और बिना किसी फिजिकल स्क्रीनिंग के फिटनेस सर्टिफिकेट तैयार कर दिया जाता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया कभी-कभी अस्पताल के बरामदे या कैंटीन में ही पूरी कर दी जाती है।

डॉक्टरों की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में एक मेडिकल ऑफिसर डॉ. नवीन चन्द्र नयन का बयान सामने आया है, जिसने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि कई बार कार्यभार अधिक होने के कारण वे मरीजों की व्यक्तिगत जांच किए बिना ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं।

उनके अनुसार, “अस्पताल में काम का दबाव बहुत ज्यादा रहता है, इसलिए कई बार सभी मरीजों की जांच संभव नहीं हो पाती और कागजात पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं।”

यह बयान न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करता है कि बिना जांच के प्रमाणपत्र जारी होना एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

सिविल सर्जन ने दिए जांच के आदेश

मामला सामने आने के बाद मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन डॉ. सुधीर कुमार ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

उन्होंने आदेश दिया है कि हाल के दिनों में जारी सभी सर्टिफिकेट की दोबारा जांच की जाएगी। साथ ही एक विशेष जांच टीम गठित की गई है, जो यह पता लगाएगी कि इस अवैध वसूली और फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने में कौन-कौन लोग शामिल हैं।

प्रारंभिक जांच के बाद दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों और डॉक्टरों को अमरनाथ यात्रा मेडिकल पैनल से हटाने की कार्रवाई भी की जाएगी।

श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर बड़ा खतरा

इस पूरे घोटाले ने सबसे बड़ा सवाल श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर खड़ा कर दिया है। अमरनाथ यात्रा में हर साल कई लोग स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं। ऐसे में बिना जांच के फिटनेस सर्टिफिकेट देना सीधे-सीधे जान जोखिम में डालने जैसा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जो लोग पैसे नहीं दे पाते, उन्हें कई दिनों तक दौड़ाया जाता है, जबकि पैसे देने वालों को तुरंत सर्टिफिकेट मिल जाता है। इससे गरीब और ईमानदार श्रद्धालु सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।

सिस्टम पर गहराता अविश्वास

यह मामला सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल उठा रहा है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित और स्वस्थ यात्रा के लिए प्रमाणित करना है, वही व्यवस्था अब भ्रष्टाचार का केंद्र बनती दिख रही है।

लोगों में इस बात को लेकर गुस्सा है कि आखिर कैसे एक गंभीर मेडिकल प्रक्रिया को पैसे के खेल में बदल दिया गया। अगर किसी अस्वस्थ व्यक्ति को गलत तरीके से फिट घोषित किया गया और यात्रा के दौरान कोई दुर्घटना होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, यह बड़ा सवाल है।

आगे क्या?

फिलहाल स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू कर दी है, लेकिन स्थानीय लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या वाकई दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर मामला सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

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