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आस्था बनाम सुरक्षा: बाढ़ के साए में छठ, रोसड़ा प्रशासन की बड़ी चुनौती

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मोहम्मद आलम

रोसड़ा/समस्तीपुर:लोक आस्था का सबसे पवित्र पर्व छठ ,अब बस कुछ ही दिन दूर है। पर इस बार रोसड़ा में श्रद्धा की धार के साथ खतरे की भी धार बह रही है। बूढ़ी गंडक नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है और घाटों की पवित्र सीढ़ियाँ अब पानी में समा चुकी हैं। आस्था का रंग भले गाढ़ा हो, पर हालात इतने गंभीर हैं कि खुद प्रशासन भी कह रहा है। “इस बार घाट नहीं, घर ही सुरक्षित घाट है।नगर परिषद की टीम जब सीढ़ी घाट, बालू घाट, गोलाघाट और पत्थर घाट का निरीक्षण करने पहुँची, तो हर जगह वही तस्वीर मिली, जलमग्न घाट, तेज बहाव और कीचड़ में डूबे रास्ते। नगर परिषद के लेखापाल संजीत कुमार यादव ने साफ कहा इस स्थिति में नदी किनारे पूजा करना खतरे से खाली नहीं है। सभी व्रती अपने घरों पर ही अर्घ्य दें।मुख्य पार्षद मीरा सिंह और पूर्व पार्षद श्याम बाबू सिंह ने भी सुरक्षा को सर्वोपरि बताया। दोनों ने मिलकर आदेश दिया है कि सभी प्रमुख घाटों को बांस-बल्ला और लाल निशान लगाकर बंद किया जाए, ताकि कोई श्रद्धालु गलती से भी वहां न जाए।फिर भी, प्रशासन की कोशिश है कि श्रद्धालुओं की भावना को ठेस न पहुंचे। इसीलिए भंवरा सुलिस गेट के पास एक अस्थायी, सुरक्षित घाट बनाने की योजना पर विचार हो रहा है। सफाई निरीक्षक श्याम सुंदर झा के मुताबिक, घाटों की सफाई और सुरक्षा टीमों की तैनाती शुरू हो चुकी है,लेकिन नदी की तेज धार अब भी सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है।स्थानीय निवासी अनिल महतो कहते हैं।पानी घटा जरूर है, पर धार अब भी डराने वाली है। प्रशासन को जल्द सुरक्षा इंतज़ाम करने चाहिए। वहीं लक्ष्मण पासवान ने प्रकाश व्यवस्था, निगरानी दल और गोताखोरों की तैनाती की माँग की है। कई व्रती महिलाओं ने भी कहा कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो वे इस बार घर पर ही भगवान सूर्य को अर्घ्य देंगी।स्पष्ट है कि रोसड़ा में इस बार छठ पर्व की लय बदली हुई है। परंपरा और सुरक्षा के बीच संघर्ष है, और प्रशासन ने साफ संदेश दिया है।आस्था ज़रूरी है, मगर जान उससे भी ज़्यादा कीमती।इस बार का छठ शायद घाटों की रौनक से दूर रहेगा,पर यदि इससे एक भी जान बचती है तो यही होगा असली ‘सूर्य को अर्घ्य’जीवन का, विवेक का, और सुरक्षा का।

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