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मधुबनी में मुकेश सहनी का बड़ा बयान, कहा—समाज के बिना ‘मलाई’ नहीं चाहिए, निषाद आरक्षण पर फिर उठी मांग

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मधुबनी में मुकेश सहनी ने समाज की एकता और निषाद आरक्षण की मांग को लेकर बड़ा बयान दिया। कहा—समाज के हित के बिना सत्ता की मलाई नहीं चाहिए।

मधुबनी/आलम की खबर:मुकेश सहनी एक बार फिर अपने पुराने तेवर में नजर आए हैं। मधुबनी जिले के अरेड़ स्थित बलाइन में आयोजित माँ कमला मेला के मंच से उन्होंने समाज की एकता, अधिकार और निषाद आरक्षण को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी ‘मलाई’ या सत्ता का लाभ नहीं चाहिए, जिसमें उनके समाज का भला न हो सके।

कार्यक्रम में पहुंचकर उन्होंने माँ कमला की पूजा-अर्चना की और देश व प्रदेश के लोगों के सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद आयोजित जनसभा में उन्होंने अपने संबोधन के दौरान सामाजिक न्याय, शिक्षा और एकजुटता को लेकर लोगों को प्रेरित किया।

‘सन ऑफ मल्लाह’ की पहचान के साथ दिया संदेश

‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से पहचान बनाने वाले मुकेश सहनी ने अपने भाषण में कहा कि वर्षों के संघर्ष का ही परिणाम है कि आज निषाद समाज की चर्चा मुख्यधारा की राजनीति में हो रही है। उन्होंने कहा कि अब राजनीतिक दलों को भी यह समझ में आ गया है कि यदि निषाद समाज को सम्मान नहीं दिया गया, तो इसका असर चुनावी परिणामों पर पड़ेगा।

उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि समाज की ताकत ही उनकी असली पूंजी है और इसी ताकत के बल पर वे अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना था कि अब समय आ गया है कि निषाद समाज अपने हक के लिए एकजुट होकर खड़ा हो।

निषाद आरक्षण को लेकर दो टूक

अपने भाषण में उन्होंने निषाद आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सवाल किया कि जब देश के अन्य राज्यों में निषाद समुदाय को आरक्षण का लाभ मिल सकता है, तो बिहार में यह व्यवस्था क्यों नहीं लागू की जा सकती। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि जब तक समाज को उसका अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के वास्तविक विकास और सम्मान से जुड़ी हुई है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी सत्ता या लाभ नहीं चाहिए, जिससे समाज का भला न हो।

“जात है तो भात है” का दिया संदेश

अपने संबोधन में मुकेश सहनी ने पारंपरिक कहावत का जिक्र करते हुए कहा, “अगर जात है तो भात है, और जब जात ही नहीं होगा तो भात भी नहीं मिलेगा।” इस बयान के जरिए उन्होंने समाज की पहचान और एकजुटता के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने समाज और पहचान को मजबूत करें, क्योंकि यही उनकी ताकत है। उन्होंने यह भी कहा कि बिना संगठन और एकता के कोई भी समाज अपने अधिकारों को हासिल नहीं कर सकता।

शिक्षा और अगली पीढ़ी पर जोर

मुकेश सहनी ने अपने भाषण में शिक्षा के महत्व पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि आज की पीढ़ी मेहनत करेगी और अपने बच्चों को शिक्षित बनाएगी, तो आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करें और उन्हें बेहतर भविष्य देने के लिए हर संभव प्रयास करें। उनका मानना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज का वास्तविक विकास संभव है।

आयोजन की सराहना और लोगों से संवाद

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने माँ कमला मेला के आयोजन की सराहना की और इसे सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया। उन्होंने आयोजन समिति के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज को जोड़ने का काम करते हैं।

इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे और उन्होंने ध्यानपूर्वक मुकेश सहनी के विचारों को सुना। कार्यक्रम में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की भी सक्रिय भागीदारी रही।

राजनीतिक संदेश के साथ सामाजिक संकेत

मधुबनी के इस मंच से दिया गया मुकेश सहनी का यह बयान केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने साफ तौर पर यह संकेत दिया कि उनकी प्राथमिकता समाज का उत्थान है, न कि केवल राजनीतिक लाभ।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में निषाद आरक्षण का मुद्दा बिहार की राजनीति में एक बड़ा विषय बन सकता है और इस पर विभिन्न दलों की रणनीति भी तय हो सकती है।

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