पटना/समस्तीपुर/दिल्ली से विशेष रिपोर्ट:
छठ और दीपावली के पावन पर्व पर जब पूरा बिहार उमंग और आस्था में डूबा हुआ था, तब बाहर कमाने-खाने गए लाखों बिहारी अपने घर लौटने के संघर्ष में रेल की उपेक्षा का शिकार बन गए। रेल मंत्री के “त्योहार स्पेशल ट्रेन” और “यात्रियों की सुविधा” के बड़े-बड़े दावे ज़मीन पर ढह गए।देश के विभिन्न शहरों — दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, और पुणे से घर लौटने वाले यात्रियों ने कहा कि इस बार घर पहुंचना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं था। रेल टिकट मिलना तो मानो सपना बन गया। महीनों पहले से रेलवे स्टेशन के काउंटरों पर ‘No Tickets Available’ का बोर्ड टंगा रहा।
दलालों का साम्राज्य और रेलवे की चुप्पी
रेल प्रशासन की आंखों के सामने दलालों का साम्राज्य फला-फूला। ₹600 के साधारण टिकट पर ₹1400 वसूले गए, और ₹1700 के एसी टिकट के लिए यात्रियों से ₹3500 तक ऐंठे गए। टिकटें खुलेआम ब्लैक में बिकीं, पर रेल अधिकारियों ने अनदेखी की।यात्री कहते हैं, “रेल मंत्री भले ही नई ट्रेनें चलाने की घोषणा करें, लेकिन दलालों के सिंडिकेट पर किसी की लगाम नहीं।”यह स्थिति तब और शर्मनाक हो गई जब कई “स्पेशल ट्रेनें” खुद रद्द या घंटों लेट चलीं। जो चलीं भी, उनमें ठसाठस भीड़, लटकते यात्री और प्रशासन की खामोशी ने रेल मंत्री की “यात्रा सुगम बनाने” की बातों को मज़ाक बना दिया।
वैशाली सुपरफास्ट एक्सप्रेस बनी धीमी गाड़ी, स्पेशल ट्रेन बनी सिरदर्द
वैशाली सुपरफास्ट एक्सप्रेस, जो बिहार लौटने वाले हजारों यात्रियों की पहली पसंद होती है, इस बार “सुपरफास्ट” कम और “सुपरलेट” ज़्यादा रही। घंटों देरी, ओवरलोडेड डिब्बे और नाराज यात्रियों के शोर से प्लेटफॉर्म गूंज उठे।स्पेशल ट्रेन” के नाम पर भी यात्रियों को धोखा मिला। डिब्बों में ठसाठस भीड़, यात्रियों का फर्श पर बैठना, और लोग शौचालय के मुहाने पर जगह बनाते दिखे। महिलाओं और बच्चों की हालत सबसे दयनीय रही।एक यात्री ने तंज कसते हुए कहा,रेल मंत्री जी, आपने स्पेशल ट्रेन चलाई नहीं हमने स्पेशल तकलीफें झेली हैं!”
त्योहार की खुशियों पर भारी रेल मंत्रालय की संवेदनहीनता
छठ, बिहार की पहचान है, लोक आस्था, मातृत्व और त्याग का पर्व। लेकिन इस बार यह आस्था यात्रियों की पीड़ा में डूब गई। जो लोग सालभर मेहनत के बाद घर लौटना चाहते थे,उन्हें मजबूरी में भीड़भाड़, लूटखसोट और अव्यवस्था के बीच सफर करना पड़ा।रेल मंत्री की बार-बार की घोषणाएं यात्रियों के लिए अतिरिक्त ट्रेनें,त्योहारों पर कोई परेशानी नहीं होगी,सिर्फ टीवी कैमरों तक सीमित रह गईं।धरातल पर न व्यवस्था दिखी, न ईमानदारी।
सवाल जो जवाब मांगते हैं:
क्या रेल मंत्रालय के लिए छठ और दीपावली केवल “कैलेंडर की तारीखें” रह गई हैं?क्यों हर साल बिहारी प्रवासी टिकट और ट्रेन दोनों के लिए संघर्ष करते हैं?और कब तक दलालों के सहारे ही बिहार लौटने की मजबूरी बनी रहेगी?
जनता का संदेश – अब भाषण नहीं, व्यवस्था चाहिए
रेल मंत्री जी, अब वक्त है “कथनी” से “करनी” की पटरी पर उतरने का।
बिहारी जनता भाषण नहीं, सुविधा चाहती है।त्योहार पर रेल के डिब्बों में बैठा हर यात्री सिर्फ सफर नहीं कर रहा,वह अपने घर, अपने संस्कार, अपनी मिट्टी की ओर लौट रहा है।
इस आस्था की यात्रा को अपमान में न बदलने दें।वरना आने वाले समय में जनता यह जरूर कहेगी,रेल पटरी पर नहीं, सिस्टम की नीयत पटरी से उतर चुकी है।”