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समस्तीपुर में ‘डिजिटल विरासत’ मिशन ने पकड़ी रफ्तार, 77 पांडुलिपियां हुईं संरक्षित, डीएम की खास अपील

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समस्तीपुर में ‘डिजिटल विरासत’ अभियान के तहत अब तक 77 प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन किया गया है। डीएम रोशन कुशवाहा ने लोगों से घरों में रखी पुरानी धरोहर सामने लाने की अपील की है।

समस्तीपुर/आलम की खबर:समस्तीपुर में सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की दिशा में एक अनूठी और सराहनीय पहल तेजी से आकार ले रही है। ‘डिजिटल विरासत’ के रूप में पहचाने जा रहे इस अभियान के तहत जिले में अब तक 77 प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा चुका है। यह पहल न केवल इतिहास को संरक्षित करने का प्रयास है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और परंपरा को सुरक्षित रखने की दिशा में एक मजबूत कदम भी मानी जा रही है।

जिला पदाधिकारी रोशन कुशवाहा के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान अब आम लोगों के बीच भी जागरूकता पैदा कर रहा है। प्रशासन की कोशिश है कि घरों, मंदिरों और मठों में वर्षों से सुरक्षित पड़ी ऐसी पांडुलिपियों को खोजकर डिजिटल माध्यम में संरक्षित किया जाए, ताकि वे समय के साथ नष्ट न हो जाएं।

इस अभियान के तहत दलसिंहसराय क्षेत्र में एक विशेष सर्वेक्षण चलाया गया, जहां स्थानीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई। वार्ड संख्या 12 के निवासी जितेंद्र राउत ने अपने प्रयासों से 25 दुर्लभ और प्राचीन पांडुलिपियों को खोज निकाला। इन पांडुलिपियों में धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी सामग्री होने की संभावना जताई जा रही है, जो स्थानीय इतिहास को समझने में अहम भूमिका निभा सकती है।

इन दुर्लभ दस्तावेजों को प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रभात रंजन के समन्वय में विधिवत स्कैन कर ‘ज्ञान भारतम्’ पोर्टल पर अपलोड किया गया। इस प्रक्रिया के तहत पांडुलिपियों को सुरक्षित तरीके से डिजिटल फॉर्मेट में परिवर्तित किया गया, जिससे वे लंबे समय तक संरक्षित रह सकें और शोधकर्ताओं के लिए भी उपलब्ध हो सकें।

सिर्फ व्यक्तिगत प्रयास ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्थलों से भी इस अभियान को बड़ी सफलता मिली है। दलसिंहसराय स्थित पांडव मंदिर सहित अन्य मंदिरों और मठों से भी 30 से अधिक पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं। इन पांडुलिपियों में पुराने ग्रंथ, धार्मिक श्लोक और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी सामग्री शामिल है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाती है।

इस तरह जिले में कुल 77 पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन पूरा हो चुका है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। प्रशासन इसे एक शुरुआत मान रहा है और उम्मीद है कि आने वाले समय में यह संख्या और तेजी से बढ़ेगी।

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में जिला पदाधिकारी ने इस पहल में योगदान देने वालों की सराहना की। जितेंद्र राउत और दलसिंहसराय के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में कला संस्कृति पदाधिकारी जूही कुमारी की भी सक्रिय भागीदारी रही, जिन्होंने पूरे अभियान के संचालन और समन्वय में अहम भूमिका निभाई।

जिला पदाधिकारी ने स्पष्ट कहा कि हमारे घरों में रखी पुरानी पांडुलिपियां केवल कागज नहीं, बल्कि हमारी पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने घरों में मौजूद 75 वर्ष या उससे अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों को सामने लाएं, ताकि उन्हें डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा सके।

उन्होंने यह भी बताया कि कई बार जानकारी के अभाव में लोग इन पांडुलिपियों के महत्व को नहीं समझ पाते और वे समय के साथ नष्ट हो जाती हैं। ऐसे में यह अभियान लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ उनकी सहभागिता को भी बढ़ा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है ‘डिजिटल विरासत’ अभियान?

आज के डिजिटल युग में जहां हर चीज तेजी से ऑनलाइन हो रही है, वहीं हमारी पारंपरिक धरोहरें धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर हैं। कागज पर लिखी पांडुलिपियां समय, नमी और कीड़ों के कारण खराब हो जाती हैं। ऐसे में उनका डिजिटाइजेशन ही उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।

यह अभियान न केवल संरक्षण का कार्य कर रहा है, बल्कि शोध और शिक्षा के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खोल रहा है। डिजिटल रूप में उपलब्ध पांडुलिपियां देश-विदेश के शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं और भारतीय संस्कृति के अध्ययन को नई दिशा दे सकती हैं।

लोगों की भागीदारी से बढ़ेगा अभियान

प्रशासन का मानना है कि इस अभियान की असली सफलता तभी संभव है, जब आम लोग इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। गांव-गांव और घर-घर में छिपी ऐसी धरोहरें अभी भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जिन्हें पहचानने और सुरक्षित करने की जरूरत है।

इस पहल के जरिए समस्तीपुर को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास किया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह अभियान जिले के अन्य प्रखंडों में भी तेज किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जा सके।

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