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रोसड़ा की उम्मीदों पर फिर पानी" अमित शाह आए, भीड़ जुटी, भाषण गूंजा, पर विकास की बात गुम

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रोसड़ा (समस्तीपुर)।गृह मंत्री अमित शाह का आगमन रोसड़ा के लोगों के लिए उम्मीदों का मेला था।
लोग सोच रहे थे — इस बार कुछ नया सुनने को मिलेगा, शायद रोसड़ा को जिला बनाने की घोषणा हो जाएगी, या पॉलिटेक्निक कॉलेज का तोहफ़ा मिलेगा।
लेकिन अफसोस! उम्मीदों की थाली फिर खाली रह गई।मंच सजा, भीड़ उमड़ी, तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी, पर भाषण में वही पुराना राग
“जय श्री राम, सीता मैया के जयकारे, लालू परिवार पर प्रहार”,
और वही चुनावी पुराण“एनडीए को दस में से दस सीट दिला दो,लोग सोचते रह गए।क्या अब भी राम मंदिर और लालू यादव ही बिहार के असली मुद्दे हैं?क्या रोसड़ा की ज़रूरतें, सड़क, अस्पताल, कॉलेज, जिला का दर्जा, सब पीछे छूट गए?

अमित शाह ने जोश से कहा।

यह जीत विधायक या मुख्यमंत्री के लिए नहीं, जंगलराज के सफाये के लिए होगी।पर शायद उन्हें यह याद नहीं रहा कि बीते 20 साल से सत्ता भी उनकी ही सहयोगी सरकार की रही है।भीड़ हँसी भी, तालियाँ भी बजीं, मगर भीतर एक चुभन रह गई।
रोसड़ा फिर खाली हाथ रह गया।
नेता आए, नारे गूंजे, उम्मीदें टूटीं  और जनता फिर मायूस लौटी।रोसड़ा के लोगों की सबसे बड़ी चाहत थी।जिला दर्जा।वर्षों से यह मांग धूल खा रही है।यहां के युवा रोज़गार की तलाश में बाहर भटक रहे हैं, किसान सिंचाई के लिए तरस रहे हैं, सड़कें टूटी हैं, अस्पताल जर्जर हैं,
और हर चुनाव में वही भाषण सुनाई देता है।आप हमें जिताइए, बिहार बदलेगा।लेकिन जनता अब पूछती है साहब, बीस साल से सत्ता भी तो आप ही के हाथ में है, फिर बदला क्या?”
ज़मीन पर सवाल, हवा में जवाब

रोसड़ा के लोगों ने भारी भीड़ जुटाई।घाटों की तरह मैदान सजाया,
पर मंच से न तो नया अस्पताल मिला,न कॉलेज की घोषणा,
न जिला दर्जा।सिर्फ नारे, भाषण और आरोपों की बरसात।भीड़ लौटी, पर मायूस।एक बुजुर्ग ने जाते-जाते कहा,साहब, राम का नाम हमारी आस्था है,पर पेट की भूख और बच्चों की पढ़ाई का भी कोई मंदिर बनाइए। गौरतलब है कि, क्या 
बिहार की राजनीति अब भाषणों और जयकारों में उलझ गई है।
विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार — सब पोस्टर पर रह गए हैं।
रोसड़ा की मिट्टी बार-बार अपने नेताओं से यही सवाल पूछती है।हम कब तक सिर्फ तालियां बजाते रहेंगे?हर बार वादा नया, नतीजा वही पुराना,रोसड़ा की हालत अब भाषण से नहीं, बदलाव से बदलेगी।”

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