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पटना में बड़ा घोटाला उजागर: विधायकों-अफसरों के फ्लैट रिनोवेशन मामले में इंजीनियर पर कार्रवाई, पेंशन से कटौती का आदेश

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पटना में विधायकों और अफसरों के फ्लैट में काम के नाम पर गड़बड़ी मामले में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता उमेश कुमार मंडल दोषी पाए गए। पेंशन से 5% कटौती का दंड लगाया गया।

पटना/आलम की खबर:राजधानी पटना में भवन निर्माण विभाग से जुड़ा एक बड़ा प्रशासनिक मामला सामने आया है, जिसने सरकारी कार्य प्रणाली और प्रोजेक्ट अनुमोदन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों के आवासीय फ्लैटों में काम के नाम पर कथित अनियमितताओं के मामले में तत्कालीन अधीक्षण अभियंता उमेश कुमार मंडल को दोषी पाया गया है। जांच के बाद विभाग ने उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए पेंशन से पांच प्रतिशत राशि की कटौती का आदेश जारी किया है।यह पूरा मामला Patna के बेली रोड स्थित 96 ऑफिसर्स फ्लैट और अन्य सरकारी आवासीय परिसरों से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि इन फ्लैटों में मरम्मत और निर्माण कार्यों के नाम पर तैयार किए गए प्राक्कलन (estimate) में गंभीर अनियमितताएं की गईं। जांच में यह पाया गया कि तत्कालीन अधीक्षण अभियंता उमेश कुमार मंडल ने बिना उचित जांच के प्राक्कलन को प्रशासनिक स्वीकृति के लिए आगे बढ़ा दिया, जिससे नियमों की अनदेखी हुई।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह सामने आया कि प्राक्कलन में “रिनोवेशन” शब्द का उपयोग किया गया था, जबकि उसमें शामिल कार्यों की प्रकृति मूल निर्माण (new work) जैसी थी। इसके अलावा एक ही कार्य को कई हिस्सों में बांटकर अलग-अलग प्राक्कलन तैयार किए गए, जिससे वरिष्ठ अधिकारियों को भ्रमित करने की स्थिति बनी।

विभागीय जांच में यह भी सामने आया कि एक ही परिसर में होने वाले कार्यों को अलग-अलग भागों में विभाजित कर प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी की गई। लोक निर्माण लेखा संहिता के नियमों के अनुसार, ऐसे कार्यों के लिए तकनीकी स्वीकृति और उचित नक्शा अनुमोदन आवश्यक होता है, लेकिन इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

तकनीकी समिति की जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि विधान सभा सदस्यों द्वारा पुराने और जर्जर Visitor और Staff Quarter के नवीनीकरण की मांग की गई थी, लेकिन प्राक्कलन में शामिल कार्यों से यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल मरम्मत नहीं बल्कि पुनर्निर्माण जैसा कार्य था। इसके बावजूद आवश्यक तकनीकी मंजूरी नहीं ली गई।

विभाग ने पहले भी सभी कार्यपालक और अधीक्षण अभियंताओं को निर्देश जारी किए थे कि एक ही परिसर में होने वाले सभी कार्यों के लिए समेकित प्राक्कलन और तकनीकी स्वीकृति अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इसी आधार पर उमेश कुमार मंडल को लापरवाही और नियमों की अवहेलना का दोषी पाया गया।

जांच रिपोर्ट के बाद विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला कि संबंधित अधिकारी ने कार्य में शिथिलता और प्रशासनिक नियमों की अनदेखी की, जिससे पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसके बाद भवन निर्माण विभाग ने 29 अप्रैल को आदेश जारी कर कड़ी कार्रवाई की।

इस मामले में सबसे बड़ा निर्णय यह रहा कि उमेश कुमार मंडल, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनकी पेंशन से एक वर्ष तक पांच प्रतिशत राशि की कटौती करने का दंड पारित किया गया है। यह कार्रवाई बिहार पेंशन नियमावली के तहत की गई है, जिसे प्रशासनिक अनुशासन के रूप में एक सख्त संदेश माना जा रहा है।

यह मामला केवल एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि सरकारी निर्माण प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर सही तकनीकी जांच होती, तो इस तरह की स्थिति से बचा जा सकता था।

सरकारी विभागों में अक्सर इस तरह के आरोप सामने आते रहते हैं, जहां प्राक्कलन और निर्माण कार्यों में पारदर्शिता की कमी देखी जाती है। ऐसे मामलों में छोटी चूक भी बड़े प्रशासनिक विवाद का कारण बन सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी निर्माण कार्यों में नियमों का पालन न केवल जरूरी है बल्कि अनिवार्य भी है, क्योंकि इसमें जनता के पैसे का उपयोग होता है।

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