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“बिहार 2025: जब समाजवाद चुप हुआ और बाहुबल बोल पड़ा — टिकटों की विरासत अब बंदूक वालों के नाम!”

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पटना, 30 अक्टूबर:बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में इस बार राजनीति की ‘विरासत’ का रंग पूरी तरह बदल गया है। समाजवाद की गढ़ मानी जाने वाली इस धरती पर इस बार बात विचारधारा की नहीं, बाहुबली विरासत की हो रही है।
जहां समाजवादी नेताओं के बेटे-बेटियां टिकट के लिए नेताओं के दरवाज़े खटखटाते रह गए, वहीं बाहुबलियों के वारिसों को पार्टियों ने हाथोंहाथ उठा लिया।

 समाजवाद की विरासत फीकी पड़ी

कभी बिहार समाजवाद का प्रतीक था, मगर इस बार शरद यादव, बीपी मंडल और वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे दिग्गजों के परिवार टिकट की दौड़ में पीछे छूट गए।शरद यादव की बेटी सुभासिनी और पुत्र शांतनु यादव दोनों को इस बार किसी दल ने मैदान में उतरने का मौका नहीं दिया।
बीपी मंडल के पोते निखिल मंडल, जिन्होंने पिछली बार जदयू से मधेपुरा में किस्मत आज़माई थी, इस बार सूची से बाहर हैं।वशिष्ठ नारायण सिंह के बेटे प्रशांत सोनू और कई अन्य समाजवादी घराने के वारिस भी टिकट पाने में नाकाम रहे,राजनीतिक गलियारों में अब एक ही बात चल रही है“बिहार में समाजवाद की नहीं, बाहुबल की विरासत बिकती है।”

 बाहुबलियों की विरासत हुई और मजबूत

इस बार हर पार्टी में बाहुबलियों के परिवारों का बोलबाला है।राजद ने शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को सीवान से टिकट दिया।मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला लालगंज से मैदान में हैं।वीणा देवी, बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी, मोकामा से राजद प्रत्याशी हैं, जबकि अनंत सिंह उसी सीट से जदयू के उम्मीदवार हैं।राजबल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी को नवादा से, और आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को नवीनगर से जदयू ने टिकट दिया है।
प्रभुनाथ सिंह के बेटे रणधीर सिंह मांझी से और भाई केदार सिंह बनियापुर से भाजपा के उम्मीदवार हैं।


 सभी दलों को बाहुबल पर भरोसा

राजद, जदयू, भाजपा, कांग्रेस — सभी ने एक बात साफ कर दी है कि अब चुनाव जीतने का गणित ‘छवि’ नहीं, ‘छत्रबल’ से बनता है।कई बाहुबलियों ने इस बार दल बदले हैं कोई सत्ता के करीब रहने के लिए, तो कोई सुरक्षा की गारंटी के लिए।

 अब विचार नहीं, ‘वजन’ चलता है

बिहार की राजनीति का यह चेहरा बताता है कि अब यहां आंदोलन की नहीं, असर की राजनीति है।
समाजवादी आदर्श अब भाषणों में हैं, जबकि असली टिकट उन लोगों के पास है जिनके पास ‘नाम’ के साथ ‘नाली’ और ‘नालिश’ भी है।
बिहार की सियासत अब एक नए नारे पर टिकी लगती है“जिसके पास ताकत है, उसी के पास टिकट है

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