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कटिहार में सिस्टम फेल! बीमार युवक को चारपाई पर ढोकर सड़क तक ले गए ग्रामीण, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

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कटिहार के प्राणपुर प्रखंड के कहूनिया पंचायत में खराब सड़क और एम्बुलेंस सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को बीमार युवक को चारपाई पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ा। घटना ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था और ग्रामीण विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कटिहार/आलम की खबर:कटिहार जिले के प्राणपुर प्रखंड से सामने आई एक तस्वीर ने एक बार फिर बिहार के ग्रामीण इलाकों की बदहाल व्यवस्था की परतें खोल दी हैं। विकास, स्वास्थ्य सुविधा और सड़क निर्माण के बड़े-बड़े दावों के बीच कहूनिया पंचायत के ग्रामीण उस समय बेबस नजर आए, जब एक बीमार युवक को इलाज के लिए चारपाई पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ा। यह दृश्य सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की सच्चाई है जहां आज भी गांवों तक सड़क और एम्बुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं।

बताया जा रहा है कि प्राणपुर प्रखंड के कहूनिया पंचायत वार्ड संख्या-12 निवासी मो. रॉबी की अचानक तबीयत बिगड़ गई। परिजनों ने तत्काल एम्बुलेंस सेवा से संपर्क किया, लेकिन गांव तक पहुंचने वाली सड़क इतनी खराब और जर्जर थी कि वाहन अंदर नहीं जा सका। हालत गंभीर होने पर परिवार और ग्रामीणों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। इसके बाद गांव के लोगों ने चारपाई का सहारा लिया और मरीज को उसी पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाने का फैसला किया।

ग्रामीणों ने बीमार युवक को खाट पर उठाया और कच्चे, कीचड़ भरे रास्तों से गुजरते हुए कई किलोमीटर पैदल चले। इस दौरान गांव की महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी परेशान दिखे। घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद इलाके में लोगों का गुस्सा और बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। गांव में जब भी कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तो लोगों को इसी तरह जान जोखिम में डालकर मरीज को बाहर निकालना पड़ता है।

वर्षों से बदहाल है सड़क

स्थानीय लोगों के अनुसार चिकनी टोला से बिसारे मुख्य सड़क तक का संपर्क मार्ग वर्षों से जर्जर पड़ा हुआ है। बरसात के मौसम में यह रास्ता पूरी तरह दलदल में तब्दील हो जाता है। कई जगहों पर पानी भर जाने से पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय सड़क निर्माण का वादा किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही नेता और अधिकारी गांव की तरफ देखना तक बंद कर देते हैं।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित एवं मौखिक शिकायत दी गई, लेकिन आज तक स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। गांव के लोगों का कहना है कि सड़क नहीं होने का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती और मरीजों की जान खतरे में पड़ जाती है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

इस घटना ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और एम्बुलेंस नेटवर्क को मजबूत करने का दावा करती रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। ग्रामीण इलाकों में यदि सड़क ही नहीं होगी, तो एम्बुलेंस सेवा कैसे पहुंचेगी? यही सवाल अब लोग पूछ रहे हैं।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई बार गर्भवती महिलाओं को भी इसी तरह खाट पर ले जाना पड़ा है। समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण कई मरीजों की हालत बिगड़ जाती है। लोगों का आरोप है कि प्रशासन सिर्फ कागजों में योजनाएं चला रहा है, जबकि गांवों में बुनियादी सुविधाएं आज भी सपना बनी हुई हैं।

“गांव की सड़क अब सामाजिक अभिशाप बन गई”

ग्रामीणों ने बताया कि खराब सड़क अब केवल आवागमन की समस्या नहीं रही, बल्कि सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है। गांव में रिश्तेदारी करने से लोग कतराने लगे हैं। कई परिवारों की बेटियों की शादी सिर्फ इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि लोग गांव की बदहाल स्थिति देखकर रिश्ता करने से पीछे हट जाते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि जब कोई बाहरी व्यक्ति गांव में आता है और सड़क की हालत देखता है, तो वह दोबारा यहां आने से बचता है। युवाओं का कहना है कि विकास के नाम पर गांव को सिर्फ आश्वासन मिला, जबकि असल सुविधाएं आज तक नहीं पहुंचीं।

जनप्रतिनिधियों पर ग्रामीणों का गुस्सा

घटना के बाद ग्रामीणों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लेकर नाराजगी साफ दिखाई दी। लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर केवाला, कहूनिया और सहजा पंचायतों की लगातार अनदेखी क्यों की जा रही है। ग्रामीणों ने कहा कि हर चुनाव में सड़क, स्वास्थ्य और विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में गांव की तस्वीर नहीं बदलती।

मुखिया प्रत्याशी मो. एजाज ने भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आजादी के दशकों बाद भी गांव को पक्की सड़क नहीं मिल पाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को चारपाई पर ढोना पड़े, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।

ग्रामीणों ने की सड़क और स्वास्थ्य सुविधा की मांग

घटना के बाद ग्रामीणों ने सरकार और जिला प्रशासन से तत्काल सड़क निर्माण कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर जल्द सड़क नहीं बनी, तो आने वाले बरसात के मौसम में हालात और भयावह हो जाएंगे। ग्रामीणों ने गांव तक एम्बुलेंस पहुंचाने लायक सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी मांग उठाई है।

ग्रामीणों का कहना है कि विकास का असली मतलब तभी होगा, जब गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचें। सिर्फ भाषण और घोषणाओं से ग्रामीणों की जिंदगी नहीं बदल सकती। कटिहार के प्राणपुर की यह घटना अब सरकार और प्रशासन के लिए एक बड़ा सवाल बन चुकी है कि आखिर ग्रामीण इलाकों में विकास की योजनाएं जमीन पर कब उतरेंगी। गौरतलब है कि,कटिहार के प्राणपुर से सामने आई यह तस्वीर केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उस सिस्टम की हकीकत है जहां आज भी सड़क और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं लोगों तक नहीं पहुंच पाई हैं। जब किसी मरीज को इलाज के लिए चारपाई पर ढोना पड़े, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीन व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है। सरकारें विकास के दावे जरूर करती हैं, लेकिन असली विकास वही होगा जहां गांव की आखिरी गली तक सड़क पहुंचे और जरूरत पड़ने पर एम्बुलेंस समय पर मरीज तक पहुंच सके। प्राणपुर की घटना ने यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण बिहार में अभी भी बुनियादी ढांचा सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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