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Bihar News: पूर्वी चंपारण में सरकारी दवाइयां जलाने का वीडियो वायरल, स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल

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 चंपारण के चिरैया प्रखंड स्थित हरिहर स्वास्थ्य केंद्र में सरकारी दवाइयां जलाने का वीडियो वायरल होने के बाद स्वास्थ्य विभाग सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों ने डॉक्टरों और कर्मियों पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है।

मोतिहारी/आलम की खबर:बिहार के पूर्वी चंपारण जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। चिरैया प्रखंड के हरिहर गांव स्थित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में सरकारी दवाइयों को जलाए जाने का वीडियो वायरल होने के बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया है। वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में लंबे समय से लापरवाही का माहौल है, डॉक्टर नियमित रूप से नहीं आते और मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इसी लापरवाही के कारण लाखों रुपये की सरकारी दवाइयां खराब हो गईं।

स्थानीय लोगों के अनुसार अस्पताल में काफी समय से दवाइयों का सही तरीके से वितरण नहीं किया जा रहा था। बड़ी मात्रा में दवाइयां गोदाम और कमरों में बोरियों में बंद पड़ी रहीं। धीरे-धीरे नमी, धूल और गंदगी के कारण दवाइयां खराब होने लगीं। कई दवाओं के पैकेट और बोतलों में दीमक तक लग गई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इन दवाइयों को मरीजों के बीच बांट दिया जाता तो गरीब और जरूरतमंद लोगों को काफी राहत मिल सकती थी।

बताया जा रहा है कि जब खराब दवाइयों का मामला बढ़ने लगा तो अस्पताल कर्मियों ने उन्हें चुपचाप नष्ट करने की कोशिश शुरू कर दी। आरोप है कि अस्पताल परिसर के पीछे सरकारी दवाइयों को जलाया जा रहा था ताकि मामला सामने न आ सके। इसी दौरान कुछ ग्रामीणों की नजर वहां उठ रहे धुएं और आग पर पड़ी। लोगों ने मौके पर पहुंचकर वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। बाद में यही वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

वायरल वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि बड़ी संख्या में दवाइयों की बोतलें, पैकेट और मेडिकल सामग्री आग में फेंकी जा रही हैं। कई पैकेटों पर “Bihar Govt. Supply – Not For Sale” लिखा हुआ दिखाई दे रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि ये दवाइयां सरकारी सप्लाई की थीं, जिन्हें गरीब मरीजों के इलाज के लिए भेजा गया था। वीडियो वायरल होते ही इलाके में लोगों का गुस्सा बढ़ गया और स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आने लगी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि जिन दवाइयों को जलाया गया, उनमें से कई की एक्सपायरी डेट अभी बाकी थी। कुछ दवाइयों पर जुलाई 2026 तक उपयोग की अवधि लिखी हुई बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब दवाइयां इस्तेमाल के योग्य थीं तो उन्हें मरीजों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि गरीबों के अधिकारों के साथ सीधा खिलवाड़ है।

गांव के लोगों ने अस्पताल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अस्पताल में अक्सर डॉक्टर समय पर नहीं पहुंचते। कई बार मरीज इलाज के लिए घंटों इंतजार करते रहते हैं, लेकिन उन्हें बिना इलाज लौटना पड़ता है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ कागजों पर चल रहा है जबकि जमीन पर वहां की स्थिति बेहद खराब है। लोगों का कहना है कि अस्पताल में दवाइयां होने के बावजूद मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की सलाह दी जाती है।

इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ गया है। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में भी इसी तरह सरकारी संसाधनों की बर्बादी होती रहेगी। लोगों ने दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

स्वास्थ्य विभाग के लिए यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सरकार लगातार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का दावा करती रही है। गांव-गांव तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और गरीबों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएं सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में दवा प्रबंधन की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। कई बार उचित निगरानी नहीं होने के कारण दवाइयां समय पर मरीजों तक नहीं पहुंच पातीं और बाद में खराब हो जाती हैं। इससे सरकारी धन की बर्बादी होती है और जरूरतमंद मरीज इलाज से वंचित रह जाते हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों के मुताबिक दवाइयों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष स्टोरेज व्यवस्था जरूरी होती है। यदि तापमान, नमी और साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाए तो दवाइयां जल्दी खराब हो सकती हैं। ऐसे मामलों में संबंधित कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

वायरल वीडियो के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई है। स्थानीय अधिकारियों ने मामले की जानकारी उच्च अधिकारियों को भेज दी है। संभावना जताई जा रही है कि पूरे मामले की जांच के लिए टीम गठित की जा सकती है। यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव के गरीब लोग सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि अस्पतालों में दवाइयां होने के बावजूद मरीजों तक नहीं पहुंचतीं तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। लोगों ने मांग की है कि अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जाए और दवा वितरण व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए।

इस घटना ने एक बार फिर बिहार की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है। सोशल Media पर भी लोग इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कई लोगों ने इसे सरकारी संसाधनों की बर्बादी और स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता बताया है।

फिलहाल पूरा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और लोगों की नजर अब स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर टिकी हुई है। ग्रामीण उम्मीद कर रहे हैं कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे ताकि भविष्य में गरीबों के हक की दवाइयां इस तरह बर्बाद न हों।

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