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बिहार उत्पाद विभाग में अफसर-सिपाही गठजोड़ पर सवाल, करोड़ों की संपत्ति और वसूली नेटवर्क की चर्चा तेज

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बिहार उत्पाद विभाग के एक सहायक आयुक्त और उनके सिपाही पर वसूली और करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने के आरोपों को लेकर चर्चा तेज है। जांच एजेंसियां भी सक्रिय हैं।

पटना/आलम की खबर: बिहार में सरकारी तंत्र के भीतर भ्रष्टाचार और संपत्ति अर्जन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच उत्पाद विभाग एक बार फिर सुर्खियों में है। विभाग के एक सहायक आयुक्त और उनके कथित करीबी सिपाही को लेकर अंदरूनी स्तर पर गंभीर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आरोपों और चर्चाओं के बीच करोड़ों की संपत्ति, राजधानी में फ्लैट खरीद और कथित वसूली नेटवर्क को लेकर विभागीय गलियारों में हलचल मची हुई है।

राज्य में जहां सरकार बेलगाम नौकरशाहों और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर विभागीय स्तर पर कुछ अधिकारियों और कर्मियों की भूमिका को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्पाद विभाग, जो शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन की अहम जिम्मेदारी संभालता है, वहीं से जुड़ी इन चर्चाओं ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी बहस छेड़ दी है।

सूत्रों और विभागीय चर्चाओं के अनुसार, एक सहायक आयुक्त, जो सीमावर्ती और अत्यंत संवेदनशील जिले में पदस्थापित हैं, उनके कार्यकाल और गतिविधियों को लेकर कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि उनके साथ लंबे समय से एक सिपाही जुड़ा हुआ है, जिसे विभाग के भीतर कुछ लोग “कमाऊ पूत” के रूप में संदर्भित करते हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा नहीं की गई है, लेकिन विभाग के भीतर इस जोड़ी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि राजधानी पटना में हाल के महीनों में कुछ संपत्ति खरीद और निवेश गतिविधियां सामने आई हैं। इनमें दानापुर क्षेत्र में एक फ्लैट खरीद की बात भी शामिल बताई जा रही है, जिसकी कीमत को लेकर अलग-अलग अनुमान लगाए जा रहे हैं। हालांकि यह भी स्पष्ट किया जाता है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी द्वारा वैध आय से संपत्ति अर्जित करना कानूनन अपराध नहीं है, लेकिन आय के स्रोतों को लेकर संदेह की स्थिति में जांच एजेंसियों को कार्रवाई का अधिकार होता है।

विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि संबंधित सिपाही पर कई स्थानों पर वसूली और अनियमित गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। कुछ लोग यह दावा भी करते हैं कि उसकी पहुंच और प्रभाव के कारण कई मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया प्रभावित होती रही है। हालांकि ये सभी बातें फिलहाल आरोप और चर्चाओं के दायरे में ही हैं।

पिछले वर्षों में भी उत्पाद विभाग से जुड़े कुछ मामलों में विवाद सामने आते रहे हैं, जिनमें जांच और कार्रवाई की प्रक्रियाएं भी शुरू हुई थीं। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के बाद आर्थिक अपराध इकाई, विशेष निगरानी इकाई और निगरानी ब्यूरो जैसी एजेंसियां सक्रिय हुई हैं। अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में जांच प्रक्रिया जारी है और दर्जनों सरकारी कर्मी रडार पर हैं।

विभाग के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह जोड़ी कई वर्षों से एक साथ विभिन्न जिलों में कार्यरत रही है। बताया जाता है कि जहां भी सहायक आयुक्त की पोस्टिंग हुई, वहां उनके साथ जुड़े सिपाही की मौजूदगी भी बनी रही। इसी कारण विभाग में इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं।

सूत्र यह भी दावा करते हैं कि सीमावर्ती जिलों में, जहां शराबबंदी कानून का पालन कराना चुनौतीपूर्ण माना जाता है, वहां वसूली और अवैध गतिविधियों को लेकर सबसे अधिक शिकायतें मिलती हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

इसी बीच विभागीय कार्यक्रमों और निजी आयोजनों को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं, जिनमें बड़े स्तर पर खर्च और भव्य आयोजन की बात कही जा रही है। इन आयोजनों में विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

फिलहाल इस पूरे मामले में किसी भी स्तर पर आधिकारिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन विभागीय हलकों में इस चर्चा ने एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और विभागीय समीक्षा इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

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