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मोकामा तनाव: ललन के ‘वोट न निकलने’ वाले बयान पर प्राथमिकी आचार संहिता को चुनौती, राजद आगबबूला

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पटना — मोकामा विधानसभा में चुनाव प्रचार के दौरान जनता दल (यू) के नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के एक विवादित संबोधन ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। प्रशासन के वीडियो फुटेज की जांच के बाद चुनाव और आचार संहिता के संभावित उल्लंघन के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। विपक्षी दलों ने बयान को चुनावी असभ्यतापूर्ण और भय पैदा करने वाला बताया है।

खबर की अहम बातें:

पटना जिला प्रशासन ने वीडियो निगरानी की फुटेज खंगाली; जांच के बाद मामला चुनाव नियामक के पास पहुंचा और प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

सोशल मीडिया (X) पर प्रशासन के हवाले से बताया गया कि जांच में मिली विडियो सामग्री के आधार पर ललन सिंह के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत कार्यवाही की गई है।

विवादास्पद अंश: सभा में कथित तौर पर कहा गया, वोटिंग के दिन “उन लोगों को घर से बाहर न निकलने दें जो दूसरे प्रत्याशी को वोट करें” और विरोध करने वालों को “अपने साथ लेकर वोट गिरवाने” जैसा संदर्भ।

इस पूरा घटनाक्रम उस समय गरमा गया जब मोकामा सीट के नामजद आरोपी प्रत्याशी अनंत सिंह की गिरफ्तारी और 14 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद ललन सिंह प्रचार में झपटे थे।

RJD (राष्ट्रीय जनता दल) ने सरकारी बरताव और मंत्री के बयानों पर कड़ी निंदा की; पार्टी ने इसे लोकतंत्र और चुनावी मूल्य पर हमला बताया और सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर तीखे शब्दों में विरोध जताया। गौरतलब है कि,
यह कोई साधारण भाषा-भंग नहीं — जब सत्ता में बैठे या प्रभावशाली नेता चुनाव के दौरान खुलेआम मतदाता को डराने-धमकाने जैसा इशारा करें, तो यह सिर्फ़ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियादी इज्ज़त पर हमला है।
चुनाव केवल मतगणना का खेल नहीं; यह नागरिकों के स्वतंत्र चुनाव का अधिकार है।जिसे कोई भी बयान या दबाव कम नहीं कर सकता। प्रशासन ने वीडियो फुटेज के आधार पर FIR दर्ज कर सही कदम उठाया है।अब ज़रूरी है कि जांच निष्पक्ष और तेजी से हो ताकि अगले चरणों में किसी तरह का भय-स्तर चुनावी हिस्सेदारी को प्रभावित न कर पाए। अब देखने वाली बात होगी कि,जांच में मिले वीडियोज़ के क्लियर फुटेज सार्वजनिक होने चाहिए ताकि वाक्य-विन्यास स्पष्ट रहे।
चुनाव आयोग और न्यायिक प्रक्रिया क्या कदम उठाते हैं।केवल प्राथमिकी से मामला कितना आगे बढ़ता है, यह अब मायने रखेगा।

राजनीतिक रुख: क्या गठबंधन और विपक्ष और तेज़ी से मोर्चा बनाएंगे या मामला कानूनी दायरे तक सीमित रहकर शांत हो जाएगा। बताते चलें कि,मोकामा का यह घटनाक्रम याद दिलाता है कि चुनावी रैलियों में बोली गई हर बात का सार्वजनिक और संवैधानिक परिणाम हो सकता है — और जब बयान लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर सवाल उठाएं, तो जवाब भी कड़वा और कानूनी होना चाहिए।

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