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PMCH विवाद में नया मोड़, डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह की बहाली और 100 करोड़ मुआवजे की मांग को लेकर शिकायत दर्ज

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पीएमसीएच के प्रभारी प्राचार्य पद से हटाए गए डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह मामले में नई शिकायत दर्ज हुई है। शिकायत में बहाली, माफी और मुआवजे की मांग की गई है।

पटना/आलम की खबर:पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) के प्रभारी प्राचार्य पद से डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को हटाए जाने का मामला अब लगातार चर्चा में बना हुआ है। शुरुआत में इसे प्रशासनिक कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन अब यह विवाद गंभीर आरोपों, शिकायतों और कथित साजिश के दावों के बीच नया मोड़ ले चुका है।

डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को पद से हटाने के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार के आधिकारिक शिकायत पोर्टल पर एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई गई है। इस शिकायत में कार्रवाई को अनुचित बताते हुए डॉक्टर की तत्काल बहाली की मांग की गई है। साथ ही शिकायतकर्ता की ओर से 100 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग भी रखी गई है।

पटना के बुद्ध कॉलोनी निवासी विधिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रभाष चंद्र शर्मा ने 25 जून 2026 को इस मामले को लेकर शिकायत भेजी है। शिकायत में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC), प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री, बिहार के मुख्यमंत्री और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अध्यक्ष को भी पत्र भेजे जाने का दावा किया गया है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने जनवरी 2026 में पीएमसीएच का कार्यभार संभालने के बाद अस्पताल की सुपर स्पेशियलिटी बिल्डिंग में रखे गए महंगे चिकित्सा उपकरणों से जुड़े मामलों को उठाया था। शिकायतकर्ता का दावा है कि डॉ. सिंह ने करोड़ों रुपये के उपकरणों की कथित अनियमितताओं को सामने लाने की कोशिश की थी।

शिकायत में आगे आरोप लगाया गया है कि इसी वजह से कुछ लोगों को परेशानी हुई और डॉ. सिंह को पद से हटाने की कार्रवाई की गई। हालांकि, यह सभी आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

शिकायतकर्ता ने स्वास्थ्य मंत्री के पीएमसीएच दौरे को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पूरा घटनाक्रम पहले से तय रणनीति का हिस्सा था और बिना किसी विस्तृत जांच या कारण बताओ नोटिस के जल्दबाजी में कार्रवाई की गई।

शिकायत में कहा गया है कि डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा यह भी दावा किया गया है कि लंबे समय से वह विभागीय स्तर पर परेशानियों का सामना कर रहे थे।

वहीं, पूरे मामले की शुरुआत 23 जून 2026 को हुई थी, जब स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार पीएमसीएच पहुंचे थे। मंत्री अस्पताल में रेडियोलॉजी विभाग से जुड़ी नई सुविधाओं के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे।

निरीक्षण के दौरान तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह अपने कार्यालय में मौजूद नहीं मिले। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया था कि उन्होंने फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी। इसके बाद उनकी अनुपस्थिति को गंभीरता से लेते हुए विभागीय कार्रवाई की गई और उन्हें प्रभारी प्राचार्य पद से हटा दिया गया।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से कार्रवाई का आधार प्रशासनिक अनुशासन और ड्यूटी में लापरवाही बताया गया था। विभाग का मानना है कि सरकारी संस्थानों में जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी के प्रति पूरी तरह सजग रहना चाहिए।

दूसरी ओर, पद से हटाए जाने के बाद डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और उनके खिलाफ फैसला एकतरफा तरीके से लिया गया।

डॉ. सिंह ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा था कि अनुभवी चिकित्सकों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने पीएमसीएच की व्यवस्था सुधारने के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम किया।

इस पूरे विवाद में अब दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। एक तरफ स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि कार्रवाई प्रशासनिक कारणों से की गई, जबकि दूसरी तरफ शिकायतकर्ता और डॉ. सिंह समर्थक इसे अन्याय और गलत प्रक्रिया बता रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि पीएमसीएच जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान में प्रशासनिक पदों पर होने वाले बदलाव का असर अस्पताल की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और सभी पक्षों को सुनना जरूरी होता है ताकि किसी भी तरह के विवाद को समाप्त किया जा सके।

फिलहाल शिकायत में लगाए गए भ्रष्टाचार, साजिश और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई जैसे आरोपों पर संबंधित विभाग या स्वास्थ्य मंत्री की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए इन आरोपों की पुष्टि जांच और आधिकारिक जवाब के बाद ही हो सकेगी।

अब सभी की नजर आगे की कार्रवाई पर है। यदि मामले की जांच होती है तो शिकायत में लगाए गए आरोपों की वास्तविकता सामने आ सकती है। वहीं स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट किए जाने की संभावना है।

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पीएमसीएच जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रशासनिक विवाद केवल एक व्यक्ति या पद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर अस्पताल की व्यवस्था और जनता के भरोसे पर भी पड़ता है।

किसी भी अधिकारी पर कार्रवाई जरूरी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए और आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं सरकारी संस्थानों में अनुशासन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पारदर्शी जांच और तथ्यों के आधार पर लिया गया निर्णय ही ऐसे विवादों का स्थायी समाधान दे सकता है।

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