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Katihar News: DCLR शशांक बर्णवाल पर भूमि विवादों में रिश्वत और नियमों की अनदेखी के आरोप, PMO तक पहुंची शिकायत

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Katihar News | भूमि विवादों की सुनवाई को लेकर कटिहार DCLR शशांक बर्णवाल पर रिश्वत, नियमों की अनदेखी और पक्षपातपूर्ण आदेश के आरोप लगाए गए हैं। शिकायत PMO तक पहुंचने का दावा।

कटिहार, 8 अगस्त। कटिहार जिले में भूमि विवादों से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर भूमि सुधार उप समाहर्ता (DCLR) शशांक बर्णवाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि DCLR कार्यालय में कुछ मामलों की सुनवाई के दौरान निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और पक्षकारों पर कथित तौर पर अनुचित दबाव बनाया गया। शिकायतों में रिश्वत मांगने, पैसे नहीं देने पर प्रतिकूल आदेश पारित करने और एक ही मामले में दोबारा आदेश दिए जाने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने मामले को विभिन्न प्रशासनिक स्तरों तक पहुंचाया है। उनके मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक भी शिकायत भेजी गई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी का पक्ष भी सामने नहीं आया है। ऐसे में लगाए गए आरोपों को फिलहाल शिकायतकर्ताओं के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

एक ही प्रकरण में बार-बार आदेश का आरोप

शिकायत में भूमि विवाद से जुड़े कुछ मामलों की सुनवाई और आदेश प्रक्रिया पर विशेष आपत्ति जताई गई है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कुछ मामलों में एक ही प्रकरण को लेकर एक से अधिक बार आदेश पारित किए गए। उनका कहना है कि भूमि विवाद जैसे मामलों में हर आदेश का सीधा प्रभाव संबंधित पक्षों के कब्जे, अधिकार और संपत्ति पर पड़ सकता है, इसलिए दस्तावेजों की जांच और दोनों पक्षों को सुनने की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है।

शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ मामलों में इस प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने पूरे रिकॉर्ड की जांच किसी स्वतंत्र या उच्चस्तरीय स्तर से कराने की मांग की है।

केस नंबर 1075/2024-25 में रिश्वत मांगने का दावा

शिकायत में केस संख्या 1075/2024-25 का भी उल्लेख किया गया है। यह मामला बासगीत पर्चा से जुड़ी जमीन का बताया गया है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, मामले से संबंधित पक्ष ने अपने और अपने पिता के नाम जारी बंदोबस्ती पर्चे से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए थे।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि दस्तावेजों और दावों की निष्पक्ष जांच किए बिना मामले में फैसला दिया गया। इसी प्रकरण में करीब एक लाख रुपये की कथित मांग किए जाने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि रकम नहीं देने के बाद उसके खिलाफ आदेश पारित किया गया।

शिकायत में यह सवाल भी उठाया गया है कि जिस पक्ष के पक्ष में आदेश हुआ, वह कथित तौर पर 20 नवंबर 2025 से सुनवाई की प्रक्रिया में उपस्थित नहीं था। शिकायतकर्ताओं ने इसी आधार पर आदेश की प्रक्रिया और उसके पीछे के तथ्यों की जांच की मांग की है।

हालांकि, रिश्वत की कथित मांग और आदेश से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी जांच एजेंसी या सक्षम न्यायिक प्राधिकारी के निष्कर्ष के बिना इन्हें आरोप के स्तर पर ही माना जाना चाहिए।

कुरसेला के मामले में भी प्रक्रिया पर सवाल

केस संख्या 447/2024-25, जो कुरसेला से संबंधित बताया गया है, को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने आपत्ति दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि मामले में एक बार बहस होने के बाद अंतिम आदेश पारित कर दिया गया।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आदेश में संबंधित साक्ष्यों और दस्तावेजों का पर्याप्त एवं स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। उनका दावा है कि भूमि विवाद जैसे मामलों में रिकॉर्ड की समग्र समीक्षा और दोनों पक्षों को उचित अवसर दिए जाने के बाद ही अंतिम निर्णय होना चाहिए।

इसी आधार पर उन्होंने इस मामले के दस्तावेजों और सुनवाई की पूरी प्रक्रिया की भी जांच कराने की मांग की है।

कोढ़ा के केस में जमीन और आवास का मुद्दा

शिकायत में केस संख्या 1099/2024-25 को भी प्रमुखता से उठाया गया है। यह मामला कोढ़ा प्रखंड से जुड़ा बताया गया है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, संबंधित जमीन पर आदिवासी समाज के कुछ परिवार लंबे समय से रह रहे हैं।

शिकायत में दावा किया गया है कि इन परिवारों के कुछ मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी बनाए गए हैं। आरोप है कि जमीन विवाद के दौरान कथित तौर पर रिश्वत की मांग की गई और मांग पूरी नहीं होने के बाद स्थानीय अंचल अधिकारी (CO) की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया गया।

शिकायतकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि इसके बाद संबंधित परिवारों को जमीन से हटाने की कार्रवाई की स्थिति पैदा हुई। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय से रह रहे परिवारों के आवास और भूमि अधिकार से भी जुड़ जाएगा।

PMO तक शिकायत पहुंचने का दावा

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने मामले को स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रखा और इसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक भी भेजी। उनका दावा है कि PMO स्तर से संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्राचार किया गया। इसके बावजूद अब तक DCLR के खिलाफ किसी स्पष्ट दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।

शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और राज्य सरकार से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

रिकॉर्ड की जांच से ही साफ होगी तस्वीर

भूमि विवादों में प्रशासनिक आदेश का प्रभाव सीधे लोगों के स्वामित्व, कब्जे और आवास पर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी शिकायत की स्थिति में संबंधित केस फाइल, सुनवाई की तारीखों, पक्षकारों की उपस्थिति, प्रस्तुत दस्तावेजों, अधिकारियों की रिपोर्ट और अंतिम आदेश की पूरी प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

कटिहार DCLR शशांक बर्णवाल पर लगाए गए रिश्वत, पक्षपात और नियमों की अनदेखी के आरोप फिलहाल शिकायतकर्ताओं के दावों पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी या जिला प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही आरोपों पर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि शिकायतों की जांच निष्पक्ष तरीके से हो और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय की जाए। वहीं, यदि आरोप तथ्यों से परे पाए जाते हैं तो जांच के निष्कर्ष से संबंधित अधिकारी की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। भूमि विवाद जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शी प्रक्रिया ही प्रशासन और आम लोगों के बीच भरोसा बनाए रखने का सबसे मजबूत आधार है।

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प्रशासन से अपेक्षा

भूमि विवादों से संबंधित शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए संबंधित रिकॉर्ड की निष्पक्ष समीक्षा, शिकायतकर्ताओं और अन्य पक्षकारों का पक्ष सुनना तथा उपलब्ध दस्तावेजों की जांच करना आवश्यक है। जांच के निष्कर्ष के आधार पर ही किसी अधिकारी या पक्षकार की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

भूमि विवाद से प्रशासनिक जवाबदेही तक

भूमि का विवाद आम व्यक्ति के लिए केवल कागज और आदेश का मामला नहीं होता। जमीन पर घर बना हो, वर्षों से कब्जा हो या किसी सरकारी योजना के तहत मकान मिला हो, ऐसे मामलों में प्रशासनिक आदेश का असर सीधे परिवार की जिंदगी पर पड़ता है। यही वजह है कि राजस्व और भूमि विवादों की सुनवाई में पारदर्शिता और निष्पक्षता का महत्व और बढ़ जाता है।

कटिहार DCLR के खिलाफ सामने आई शिकायतों में रिश्वत से लेकर सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल तक कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि किसी भी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। खासकर तब, जब शिकायतकर्ताओं का दावा हो कि मामला उच्च प्रशासनिक स्तर और PMO तक पहुंच चुका है।

ऐसे मामलों में सबसे बेहतर रास्ता निष्पक्ष जांच है। संबंधित केस फाइलों की जांच हो, सुनवाई की तारीखों का रिकॉर्ड देखा जाए, पक्षकारों की उपस्थिति और दस्तावेजों की समीक्षा की जाए तथा अधिकारियों की रिपोर्ट और अंतिम आदेश के बीच तथ्यात्मक संबंध को परखा जाए।

जांच यदि आरोपों को गलत साबित करती है तो संबंधित अधिकारी पर लगे संदेह दूर होंगे। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय करना प्रशासनिक व्यवस्था में जनता के भरोसे को मजबूत करेगा। भूमि विवादों में न्याय केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि उस आदेश तक पहुंचने वाली पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता से सुनिश्चित होता है।

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