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Bihar News: शराबबंदी पर NCAER की रिपोर्ट से फिर गरमाई बहस, महिलाओं के खिलाफ अपराध और राजस्व पर उठे सवाल

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | बिहार में शराबबंदी के असर पर NCAER की नई रिपोर्ट ने बहस तेज कर दी है। महिलाओं के खिलाफ अपराध, वैकल्पिक नशे और राजस्व नुकसान को लेकर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

पटना, 12 अगस्त। आलम की खबर: बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। शराब की बिक्री और सेवन पर रोक लगाने के पीछे सरकार ने सामाजिक सुधार, महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा पर अंकुश जैसे कई उद्देश्य सामने रखे थे। अब राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद यानी NCAER के एक हालिया रिसर्च पेपर ने इस नीति के प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराध, शराब के स्थान पर दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और राज्य के राजस्व पर पड़े असर को प्रमुख मुद्दों के रूप में सामने रखा गया है। अध्ययन के मुताबिक शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में अपेक्षित कमी दिखाई नहीं देती। इसके साथ ही अवैध शराब और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़ी चिंता भी सामने आई है।

हालांकि, किसी नीति के असर का आकलन केवल अपराध के आंकड़ों को देखकर करना उचित नहीं होगा। अपराध के मामले दर्ज होने की दर, पुलिस तक शिकायत पहुंचना, सामाजिक जागरूकता और कानून-व्यवस्था की स्थिति जैसे कई दूसरे कारक भी इन आंकड़ों को प्रभावित करते हैं। इसलिए रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े शराबबंदी और अपराध के बीच सीधा कारण-संबंध साबित करने के बजाय नीति के प्रभाव पर सवाल उठाने वाले संकेत के रूप में देखे जाने चाहिए।

2016 में लागू हुई थी पूर्ण शराबबंदी

बिहार में अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। इसके पीछे सबसे प्रमुख तर्क यह था कि शराब के सेवन से परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक और सामाजिक दुष्प्रभाव को कम किया जाए। खासकर महिलाओं की शिकायतों और घरेलू हिंसा से जुड़े मुद्दों को शराबबंदी के समर्थन में प्रमुखता से रखा गया था।

लेकिन करीब एक दशक बाद सामने आए आंकड़े यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या शराबबंदी अपने सभी घोषित उद्देश्यों को हासिल कर पाई है।

NCAER के अध्ययन में 2012 से 2024 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों के आंकड़ों का ट्रेंड सामने रखा गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2012 में ऐसे मामलों की संख्या करीब 11 हजार थी। 2014 में यह बढ़कर करीब 15.5 हजार हो गई। 2015 में लगभग 14 हजार और 2016 में करीब 12 हजार मामले दर्ज हुए।

इसके बाद के वर्षों में फिर वृद्धि का रुझान दिखाई देता है। 2018 में मामले करीब 17 हजार, 2019 में लगभग 15.5 हजार, 2021 में करीब 18 हजार, 2022 में लगभग 20 हजार और 2023 में करीब 23 हजार तक पहुंच गए। 2024 में यह संख्या करीब 28 हजार बताई गई है।

इन आंकड़ों को सामने रखते हुए रिपोर्ट में शराबबंदी के उस उद्देश्य पर सवाल उठाया गया है जिसके तहत महिलाओं को शराब से जुड़े सामाजिक और घरेलू नुकसान से बचाने की बात कही गई थी।

अपराध के आंकड़े क्या पूरी कहानी बताते हैं?

यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने का मतलब यह जरूरी नहीं कि अपराध का हर हिस्सा उसी अनुपात में बढ़ा हो। किसी राज्य में शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति बढ़ना, महिलाओं में जागरूकता आना, पुलिस तक पहुंच आसान होना और कानून लागू करने की प्रक्रिया में बदलाव भी आंकड़ों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए शराबबंदी के बाद दर्ज अपराधों में वृद्धि को सीधे शराबबंदी की विफलता का अंतिम प्रमाण मानना भी सही नहीं होगा। बल्कि इन आंकड़ों से यह सवाल जरूर उठता है कि शराबबंदी के साथ महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा रोकने के लिए अन्य सामाजिक और कानूनी उपाय कितने प्रभावी ढंग से लागू किए गए।

शराब की जगह दूसरे नशे का बढ़ता सवाल

रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा नशे के बदलते स्वरूप से जुड़ा है। शराब की उपलब्धता पर कानूनी रोक लगने के बाद नशे की समस्या पूरी तरह समाप्त हुई या उसने अपना रास्ता बदल लिया, यह अब बड़ी चिंता बनकर सामने आ रही है।

अध्ययन में अवैध शराब के अलावा दूसरे नशीले पदार्थों और वैकल्पिक intoxicants के इस्तेमाल की ओर इशारा किया गया है। खास तौर पर युवाओं में सूखे नशे के बढ़ते चलन को लेकर चिंता जताई गई है।

इसका मतलब यह नहीं कि शराबबंदी के कारण हर तरह के नशे का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन नीति के मूल्यांकन में यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि शराब की मांग को रोकने के साथ नशे की दूसरी प्रवृत्तियों से निपटने के लिए क्या पर्याप्त व्यवस्था तैयार हुई।

यदि शराब की जगह कोई व्यक्ति दूसरे अधिक खतरनाक नशीले पदार्थ की ओर बढ़ता है तो समस्या का स्वरूप बदल सकता है, समाप्त नहीं। ऐसे में नशामुक्ति, काउंसलिंग, युवाओं के लिए जागरूकता अभियान और अवैध नशीले पदार्थों की सप्लाई पर कार्रवाई को भी शराबबंदी की नीति के साथ जोड़कर देखना जरूरी होगा।

सरकारी खजाने पर भी पड़ा असर

शराबबंदी का एक बड़ा आर्थिक पहलू सरकारी राजस्व से जुड़ा है। शराब की बिक्री से मिलने वाला उत्पाद शुल्क बिहार सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत था। शराबबंदी लागू होने के बाद यह स्रोत बंद हो गया।

रिपोर्ट के मुताबिक शराबबंदी से पहले के तीन वर्षों में शराब से मिलने वाला उत्पाद शुल्क राज्य के अपने राजस्व का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा था। शराबबंदी के बाद यह राजस्व स्रोत समाप्त हुआ, जबकि शराबबंदी लागू करने, निगरानी बढ़ाने और अवैध शराब की रोकथाम पर प्रशासनिक खर्च भी जारी रहा।

NCAER के पेपर में यह तर्क रखा गया है कि यदि ऐतिहासिक स्तर के आसपास शराब पर उत्पाद शुल्क दोबारा लागू किया जाए तो राज्य को अपने राजस्व में करीब 14 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी वापस मिलने की संभावना हो सकती है।

यही आर्थिक पहलू शराबबंदी की बहस को और जटिल बनाता है। एक तरफ शराब से होने वाले सामाजिक नुकसान को रोकने की कोशिश है, तो दूसरी तरफ राज्य के सीमित राजस्व संसाधनों और विकास योजनाओं के लिए धन की जरूरत है।

क्या शराबबंदी पर फिर से विचार होगा?

NCAER के निष्कर्षों ने अब यह सवाल तेज कर दिया है कि बिहार की शराबबंदी नीति को उसी स्वरूप में जारी रखा जाए या उसके प्रभाव का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाए।

रिपोर्ट में नीति पर पुनर्विचार का सुझाव दिए जाने के बाद यह बहस केवल शराब की बिक्री शुरू करने या बंद रखने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली सवाल यह है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा, नशे की रोकथाम, अवैध शराब के कारोबार और राज्य के राजस्व—इन सभी चुनौतियों को एक साथ कैसे संबोधित करेगी।

यदि शराबबंदी जारी रहती है तो अवैध शराब की सप्लाई रोकने और दूसरे नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल पर प्रभावी कार्रवाई की जरूरत होगी। वहीं यदि कभी नीति में बदलाव पर विचार होता है तो शराब की बिक्री को नियंत्रित करने, उम्र सीमा, सार्वजनिक स्थानों पर सेवन, नशे में वाहन चलाने और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कड़े नियम जरूरी होंगे।

रिपोर्ट से निकला बड़ा सवाल

बिहार की शराबबंदी को लेकर बहस भावनात्मक भी है और सामाजिक भी। बड़ी संख्या में परिवार शराब से होने वाले नुकसान से बचना चाहते हैं, जबकि नीति के आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव पर भी लगातार चर्चा होती रही है।

ऐसे में NCAER की रिपोर्ट को केवल शराबबंदी हटाने के समर्थन या विरोध में इस्तेमाल करने के बजाय एक व्यापक नीति समीक्षा के आधार के रूप में देखना ज्यादा उपयोगी होगा।

महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े, नशे के बदलते पैटर्न और राजस्व के नुकसान—इन तीनों को अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ देखकर सरकार को आगे की रणनीति तय करनी होगी।

बिहार में शराबबंदी लागू हुए करीब एक दशक हो चुका है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शराबबंदी सफल रही या असफल। बड़ा सवाल यह है कि इस नीति से हासिल हुए सामाजिक लाभ, सामने आई नई चुनौतियां और राज्य की आर्थिक जरूरतें—इन तीनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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शराबबंदी की बहस में आंकड़ों से आगे देखने की जरूरत

बिहार की शराबबंदी को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर समझना जरूरी है। शराब पर रोक लगाने का मूल उद्देश्य परिवारों को इसके दुष्प्रभाव से बचाना और महिलाओं की स्थिति बेहतर करना था। इसलिए किसी भी समीक्षा का पहला पैमाना यही होना चाहिए कि इन उद्देश्यों पर कितना असर पड़ा।

NCAER की रिपोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ अपराध और नशे के बदलते स्वरूप को लेकर सवाल उठाए हैं। लेकिन अपराध के आंकड़ों को समझते समय यह भी देखना होगा कि रिपोर्टिंग व्यवस्था और सामाजिक जागरूकता में कितना बदलाव आया है। दूसरी ओर, यदि शराब की जगह दूसरे नशीले पदार्थ युवाओं के बीच अपनी जगह बना रहे हैं तो इसे भी गंभीरता से लेना होगा।

आर्थिक मोर्चे पर स्थिति और स्पष्ट है। शराब से मिलने वाला उत्पाद शुल्क बंद होने से राज्य ने एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत खोया। लेकिन केवल राजस्व हासिल करने के लिए नीति में बदलाव करना भी पर्याप्त तर्क नहीं हो सकता। किसी भी बदलाव के साथ सामाजिक सुरक्षा और नशे की रोकथाम की मजबूत व्यवस्था जरूरी होगी।

इसलिए शराबबंदी पर आगे की बहस 'रहे या हटे' के दो विकल्पों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जरूरत एक ऐसी नीति की है जो महिलाओं की सुरक्षा, नशामुक्ति, अवैध कारोबार पर नियंत्रण और सरकारी राजस्व—सभी पहलुओं को संतुलित करे। NCAER की रिपोर्ट ने कम से कम इतना जरूर किया है कि बिहार में करीब एक दशक पुरानी शराबबंदी नीति के परिणामों पर नए सिरे से गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

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