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Bihar News: गांवों की बदलती जरूरतों के बीच विधायक निधि के नियमों पर सवाल, 4 से 8 करोड़ तक बढ़ाने की मांग

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Alam Ki Khabar | Bihar News | बिहार में विधायक निधि से विकास कार्यों के लिए तय नियमों में बदलाव की मांग तेज, गांवों की नई जरूरतों के मुताबिक योजनाओं की सूची और राशि बढ़ाने की मांग।

पटना, 12 अगस्त। आलम की खबर: बिहार के गांवों की तस्वीर बदल रही है और इसके साथ ग्रामीण इलाकों की जरूरतें भी पहले जैसी नहीं रह गई हैं। अब विकास की मांग सिर्फ पक्की सड़क, नाला और सामुदायिक भवन तक सीमित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में हाईमास्ट लाइट, सीसीटीवी कैमरा, कंप्यूटर, ओपन जिम, खेल सामग्री, बेहतर पेयजल, सोलर लाइट और कब्रिस्तान-श्मशान की घेराबंदी जैसी सुविधाओं की मांग भी सामने आने लगी है।

यहीं से मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत मिलने वाली विधायक निधि के मौजूदा नियमों को लेकर बहस तेज हो गई है। सवाल यह है कि जब गांवों की जरूरतें लगातार बदल रही हैं, तो क्या विकास योजनाओं की सूची भी उसी रफ्तार से बदलेगी?

बिहार में विधानसभा के 243 विधायक और विधान परिषद के 75 सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए निर्धारित राशि का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस राशि से काम कराने के लिए योजनाओं की एक तय सूची है। वर्तमान व्यवस्था में विधायक निधि से केवल निर्धारित 45 प्रकार के कार्य ही कराए जा सकते हैं। स्थानीय स्तर पर किसी नई जरूरत के सामने आने पर विधायक चाहकर भी हर तरह की योजना को इस राशि से पूरा नहीं करा सकते।

खर्च की रफ्तार में लगातार आई गिरावट

विधायक निधि के इस्तेमाल को लेकर उपलब्ध आंकड़े भी इस बहस को मजबूती देते हैं। वर्ष 2023-24 में मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत उपलब्ध राशि का 90.62 प्रतिशत हिस्सा खर्च हुआ था। अगले वित्तीय वर्ष 2024-25 में खर्च का अनुपात घटकर 85.69 प्रतिशत रह गया।

इसके बाद 2025-26 में यह आंकड़ा और नीचे चला गया और करीब 81.61 प्रतिशत राशि ही खर्च हो सकी। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में शुरुआती तीन महीनों के दौरान अब तक करीब 20 प्रतिशत राशि खर्च होने की जानकारी सामने आई है।

इन आंकड़ों की वजह केवल नियमों की पाबंदी ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। योजनाओं की स्वीकृति, तकनीकी प्रक्रिया, जमीन की उपलब्धता और निर्माण से जुड़ी दूसरी प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी खर्च की गति को प्रभावित करती हैं। लेकिन विधायकों का तर्क है कि योजनाओं की सीमित सूची भी स्थानीय स्तर पर राशि के इस्तेमाल को मुश्किल बनाती है।

सालाना करीब 1272 करोड़ रुपये की राशि

मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत राज्य में हर साल करीब 1272 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध होती है। इतनी बड़ी रकम सीधे स्थानीय विकास से जुड़ी होने के कारण इसका अधिकतम और समयबद्ध उपयोग महत्वपूर्ण माना जाता है।

विधायकों की शिकायत है कि कई बार उनके क्षेत्र के लोग ऐसी सुविधाओं की मांग करते हैं, जो मौजूदा विधायक निधि की सूची में शामिल नहीं हैं। ऐसे में जरूरत मौजूद होने के बावजूद उस काम के लिए विधायक निधि का इस्तेमाल संभव नहीं हो पाता।

मिसाल के तौर पर किसी गांव में ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए आरओ प्लांट की जरूरत हो सकती है। किसी सरकारी स्कूल में कंप्यूटर और आईटी उपकरणों की कमी हो सकती है। किसी बाजार या महत्वपूर्ण चौक पर सुरक्षा के लिए सीसीटीवी की जरूरत हो सकती है। युवाओं के लिए ओपन जिम या खेल सामग्री की मांग हो सकती है।

ग्रामीण इलाकों में सोलर लाइट, वर्षा जल संचयन, छोटे तालाबों का जीर्णोद्धार और सार्वजनिक शौचालय जैसी जरूरतें भी सामने आती हैं। लेकिन इनमें से कई काम मौजूदा विधायक निधि के दायरे में नहीं आते।

एमपी फंड की तर्ज पर व्यवस्था की मांग

इसी वजह से विधायकों के बीच मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के नियमों में बदलाव की मांग जोर पकड़ रही है। उनका कहना है कि सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना यानी एमपी फंड में अपेक्षाकृत व्यापक तरीके से विकास कार्यों का चयन किया जा सकता है।

विधायकों का तर्क है कि अगर सांसद निधि में स्थानीय जरूरत के मुताबिक अलग-अलग प्रकार की सामुदायिक परिसंपत्तियां बनाई जा सकती हैं, तो विधायकों के लिए भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए।

मॉनसून सत्र के दौरान विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार की ओर से भी सरकार से इस विषय पर सवाल किया गया था कि राज्य में एमपी फंड की तर्ज पर व्यवस्था लागू करने में क्या कठिनाई है। इससे यह मुद्दा विधानसभा के स्तर पर भी चर्चा में आने का संकेत मिला है।

चार करोड़ से बढ़ाकर छह से आठ करोड़ करने की मांग

सिर्फ योजनाओं की सूची में बदलाव ही नहीं, विधायक निधि की राशि बढ़ाने की मांग भी सामने आई है। दो दर्जन से अधिक विधायक मौजूदा चार करोड़ रुपये की राशि को बढ़ाकर छह से आठ करोड़ रुपये करने की मांग कर चुके हैं।

विधायकों का कहना है कि निर्माण सामग्री, मजदूरी और दूसरी लागत में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में कई वर्षों पहले तय राशि से अब बड़े स्तर के विकास कार्य कराना पहले की तुलना में कठिन हो गया है।

हालांकि राशि बढ़ाने के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल किस तरह और कितनी तेजी से किया जाएगा। अगर योजनाओं की स्वीकृति और क्रियान्वयन की प्रक्रिया धीमी रही तो राशि बढ़ने के बावजूद विकास कार्यों की गति में अपेक्षित बदलाव नहीं आ सकता।

गांवों की जरूरत अब सिर्फ सड़क-नाली तक सीमित नहीं

बिहार के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे के साथ सामुदायिक सुविधाओं की मांग तेजी से बढ़ी है। गांवों के युवा खेल सुविधाएं चाहते हैं। स्कूलों को डिजिटल संसाधनों की जरूरत है। ग्रामीण बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था की मांग बढ़ रही है।

इसी तरह पेयजल को लेकर भी सिर्फ चापाकल या पाइपलाइन पर्याप्त नहीं मानी जा रही। कई जगहों पर पानी की गुणवत्ता को लेकर आरओ प्लांट और अन्य शुद्धिकरण व्यवस्था की जरूरत बताई जाती है।

बिजली की उपलब्धता के बावजूद सोलर लाइट और सोलर आधारित सुविधाओं की मांग भी ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी है। बरसात के पानी को बचाने, छोटे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और सार्वजनिक स्थलों को बेहतर बनाने की जरूरत भी स्थानीय प्रतिनिधियों के सामने रखी जा रही है।

श्मशान और कब्रिस्तान की घेराबंदी भी कई क्षेत्रों में लंबे समय से स्थानीय मांग का हिस्सा रही है। लेकिन यदि ऐसी योजनाएं विधायक निधि की निर्धारित सूची में नहीं आतीं तो विधायक दूसरी योजनाओं की तरह इन्हें भी उसी निधि से पूरा नहीं करा सकते।

नियमों में लचीलापन आया तो बढ़ेगी स्थानीय भागीदारी

विधायक निधि के नियमों में बदलाव की मांग के पीछे मूल तर्क स्थानीय जरूरत और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का है। अगर योजनाओं की सूची को व्यापक बनाया जाता है और विधायकों को तय सीमा के भीतर स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार परियोजनाएं चुनने की अनुमति मिलती है, तो क्षेत्र विशेष की जरूरत के मुताबिक विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जा सकती है।

हालांकि इसके साथ पारदर्शिता और निगरानी का मजबूत तंत्र भी जरूरी होगा। विधायक निधि सार्वजनिक धन है, इसलिए प्रत्येक योजना की उपयोगिता, लागत, गुणवत्ता और पूर्ण होने की स्थिति की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

अब सरकार के फैसले पर नजर

बिहार में विधायक निधि को लेकर उठ रही मांग केवल राशि बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि बदलते ग्रामीण समाज के साथ विकास योजनाओं की परिभाषा भी बदलेगी या नहीं।

एक तरफ गांवों में आधुनिक सुविधाओं की मांग बढ़ रही है, दूसरी तरफ विधायक निधि की योजनाओं की सूची सीमित है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती यह है कि स्थानीय जरूरतों को जगह देने के साथ-साथ सरकारी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही भी कायम रखी जाए।

अगर नियमों में व्यावहारिक बदलाव किया जाता है, तो विधायक अपने क्षेत्रों की वास्तविक जरूरत के अनुसार अधिक उपयोगी सामुदायिक परिसंपत्तियां तैयार करा सकेंगे। लेकिन अगर नियमों में बदलाव नहीं होता है, तो बड़ी संख्या में स्थानीय मांगें दूसरी योजनाओं या विभागीय बजट पर निर्भर रहेंगी।

बिहार के गांव अब सिर्फ सड़क और नाली नहीं मांग रहे। वे बेहतर रोशनी, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, डिजिटल शिक्षा, खेल सुविधाएं, स्वच्छ पेयजल और आधुनिक सामुदायिक संसाधन चाहते हैं। अब देखना यह है कि विधायक निधि के नियम इन बदलती जरूरतों के साथ कदम मिलाते हैं या नहीं।

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गांव बदल रहे हैं तो विकास की सोच भी बदलनी होगी

बिहार के गांवों में बदलाव अब केवल सरकारी योजनाओं के आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों की उम्मीदों में भी दिखाई दे रहा है। जिस गांव में कुछ वर्ष पहले सड़क और नाली सबसे बड़ी जरूरत थी, वहां आज युवा खेल मैदान, ओपन जिम और डिजिटल सुविधाएं मांग रहे हैं। स्कूल कंप्यूटर चाहते हैं और ग्रामीण सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के लिए सीसीटीवी की जरूरत महसूस कर रहे हैं।

इस बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विकास योजनाओं की सूची समय के साथ अपडेट होती रहनी चाहिए। विधायक निधि में लचीलापन देने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि सरकारी धन के इस्तेमाल पर नियंत्रण खत्म हो जाए। बल्कि ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें स्थानीय जरूरत के अनुसार काम चुनने की आजादी हो और हर खर्च की मजबूत निगरानी भी हो।

अगर सरकार योजनाओं का दायरा बढ़ाती है, राशि को वास्तविक लागत के अनुरूप करती है और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था कायम रखती है, तो विधायक निधि ग्रामीण विकास का और प्रभावी माध्यम बन सकती है।

आखिर विकास का सबसे अच्छा पैमाना यही है कि सरकारी पैसा उस जगह खर्च हो, जहां उसकी जरूरत सबसे ज्यादा है।

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