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Patna News: बिजली बिल बकाया है तो हर हाल में बिजली चोर नहीं, पटना हाईकोर्ट ने धारा 135 पर दिया अहम फैसला

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ बिजली बिल बकाया रहने से बिजली चोरी का आपराधिक मामला नहीं बनता। धारा 135 के तहत कार्रवाई के लिए चोरी और बेईमान मंशा के कानूनी तत्व साबित करना जरूरी है।

पटना, 16 अगस्त। बिहार के बिजली उपभोक्ताओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिजली बिल का बकाया रह जाना अपने आप में बिजली चोरी का अपराध नहीं है। किसी उपभोक्ता पर बड़ी रकम का बिल लंबित होने या लंबे समय तक भुगतान नहीं करने के आधार पर सीधे बिजली चोरी का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए यह सामने आना जरूरी है कि बिजली का इस्तेमाल चोरी, अनधिकृत तरीके या बेईमान मंशा से किया गया था।

जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने मो. शाहिद इमाम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया। मामला करीब 5.39 लाख रुपये के बिजली बिल बकाये से जुड़ा था। बिजली विभाग की ओर से बकाया राशि के कारण कनेक्शन काट दिया गया था। इसके बाद विभाग की ओर से आरोप लगाया गया कि कनेक्शन कटने के बावजूद बिजली का इस्तेमाल अनधिकृत तरीके से किया गया और इसी आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई।

हाईकोर्ट के आदेश का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि अदालत ने बिजली बिल की देनदारी और बिजली चोरी के आपराधिक अपराध के बीच कानूनी अंतर को रेखांकित किया है। यानी किसी व्यक्ति पर बिजली कंपनी का पैसा बकाया होना एक अलग मामला है, जबकि जानबूझकर बिजली चोरी करना अलग कानूनी अपराध है।

केवल बकाया बिल से नहीं लगेगी बिजली चोरी की धारा

बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 135 बिजली चोरी से संबंधित आपराधिक प्रावधान है। इस धारा के तहत कार्रवाई के लिए सिर्फ यह दिखाना पर्याप्त नहीं है कि उपभोक्ता के ऊपर बिजली का पैसा बकाया है। जांच में बिजली चोरी से जुड़े आवश्यक तथ्यों और परिस्थितियों का सामने आना भी जरूरी है।

अदालत के फैसले का मूल संदेश यही है कि आर्थिक देनदारी को सीधे आपराधिक मंशा के बराबर नहीं माना जा सकता। यदि कोई उपभोक्ता आर्थिक परेशानी, विवाद या अन्य कारणों से बिजली बिल का भुगतान नहीं कर पा रहा है, तो सिर्फ बकाये की वजह से उसे बिजली चोर नहीं कहा जा सकता।

हालांकि इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि बिजली बिल जमा नहीं करने वाले उपभोक्ता से विभाग बकाया राशि की वसूली नहीं कर सकता। बिजली कंपनी को कानून के तहत बकाया वसूलने और कनेक्शन काटने जैसी कार्रवाई का अधिकार है। लेकिन सिविल या वित्तीय देनदारी और बिजली चोरी के आपराधिक मामले को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।

धारा 126 और धारा 135 में क्या अंतर?

बिजली कानून में धारा 126 और धारा 135 की भूमिका अलग-अलग है। धारा 126 मुख्य रूप से बिजली के अनधिकृत उपयोग से संबंधित है। यदि किसी मामले में बिजली का उपयोग निर्धारित नियमों के विपरीत या अधिकृत सीमा से अलग तरीके से किया गया है, तो उसके आधार पर आकलन और अतिरिक्त देनदारी तय की जा सकती है।

दूसरी तरफ धारा 135 बिजली चोरी को आपराधिक अपराध के रूप में देखती है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों के आधार पर मीटर से छेड़छाड़, अवैध तरीके से कनेक्शन लेना, मीटर को बायपास करना या बिजली की वास्तविक खपत को जानबूझकर छिपाने जैसे आरोप सामने आ सकते हैं।

यही अंतर उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। हर अनधिकृत उपयोग को स्वतः बिजली चोरी का आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। मामले की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित कानूनी प्रावधान लागू किए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी अंतर स्पष्ट

बिजली कानून से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने भी धारा 126 और धारा 135 के बीच अंतर को अलग-अलग मौकों पर स्पष्ट किया है। अनधिकृत उपयोग और बिजली चोरी की कानूनी प्रकृति एक जैसी नहीं है। धारा 126 के तहत कार्रवाई का आधार सिविल देनदारी हो सकता है, जबकि धारा 135 के तहत आपराधिक कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित चोरी के तत्वों का मौजूद होना आवश्यक है।

इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि बिजली उपभोक्ताओं के मामलों में अक्सर भारी बकाया बिल, कनेक्शन काटे जाने और बिजली चोरी के आरोप एक साथ सामने आते हैं। अदालत ने साफ किया है कि इन सभी परिस्थितियों को एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

कनेक्शन कटने के बाद अवैध बिजली इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा?

हाईकोर्ट के फैसले को यह समझना गलत होगा कि कनेक्शन कटने के बाद बिजली का इस्तेमाल करने पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। यदि किसी जांच में यह साबित होता है कि कनेक्शन काटे जाने के बाद उपभोक्ता या किसी अन्य व्यक्ति ने अवैध तरीके से बिजली की आपूर्ति बहाल की, मीटर में छेड़छाड़ की या जानबूझकर बिजली चोरी की, तो परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कार्रवाई का आधार बन सकता है।

यानी अदालत ने बिजली चोरी के मामलों में कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक धारा लगाने के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तथ्यों का होना जरूरी है।

बिजली कंपनी बकाया राशि की वसूली कैसे करेगी?

बिजली बिल बकाया होने की स्थिति में बिजली कंपनी के पास वसूली के लिए कई कानूनी रास्ते मौजूद हैं। कंपनी कनेक्शन काट सकती है, बकाया राशि का आकलन कर सकती है और लागू कानून के तहत वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।

इसलिए उपभोक्ताओं को भी हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि बकाया बिजली बिल का भुगतान नहीं करना कोई समस्या नहीं है। बकाया राशि की देनदारी बनी रहती है और बिजली कंपनी कानून के तहत उसकी वसूली कर सकती है।

फैसले का महत्व इस बात में है कि केवल बकाया राशि के आधार पर किसी व्यक्ति पर बिजली चोरी का आपराधिक आरोप नहीं लगाया जा सकता। बिजली चोरी का मामला बनाने के लिए उससे जुड़े वास्तविक तथ्य और आवश्यक कानूनी तत्व सामने आने चाहिए।

उपभोक्ताओं के लिए क्या है इस फैसले का संदेश?

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले से बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट होती है। बिजली का बिल बकाया होना और बिजली चोरी करना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

यदि किसी उपभोक्ता के ऊपर बड़ी रकम बकाया है, तो वह बिजली कंपनी की देनदारी हो सकती है। लेकिन जब तक चोरी के आवश्यक तत्व और संबंधित परिस्थितियां स्थापित नहीं होतीं, केवल बकाये के आधार पर उसे धारा 135 के तहत बिजली चोरी का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

हालांकि जिन मामलों में मीटर से छेड़छाड़, अवैध कनेक्शन या जानबूझकर बिजली चोरी के प्रमाण मिलते हैं, वहां कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुला रहता है।

इस तरह हाईकोर्ट के फैसले ने एक अहम कानूनी सीमा स्पष्ट कर दी है—बिजली का कर्जदार होना और बिजली चोर होना एक ही बात नहीं है। बिजली कंपनियां बकाया वसूल सकती हैं, लेकिन बिजली चोरी का आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए कानून में निर्धारित आधार और आवश्यक साक्ष्य का होना जरूरी है।

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बकाया बिल और बिजली चोरी के बीच अंतर समझना जरूरी

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक उपभोक्ता के मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली उपभोक्ताओं के लिए कानून की एक महत्वपूर्ण समझ सामने रखता है। बिजली बिल जमा नहीं कर पाना आर्थिक या विवाद से जुड़ा विषय हो सकता है, जबकि बिजली चोरी एक आपराधिक आरोप है। दोनों के लिए कानून में अलग-अलग प्रावधान हैं।

बिजली कंपनियों को बकाया राशि वसूलने का अधिकार है और उपभोक्ताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे वैध बिल का भुगतान करें या गलत बिल होने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपत्ति दर्ज कराएं। लेकिन किसी उपभोक्ता को केवल इसलिए बिजली चोर कहना उचित नहीं होगा कि उसके ऊपर बड़ी रकम बकाया है।

दूसरी ओर, यदि जांच में वास्तविक बिजली चोरी सामने आती है तो कानून का पालन करते हुए कार्रवाई जरूरी है। इससे बिजली व्यवस्था में अनुशासन भी बना रहता है और ईमानदारी से बिल भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं के हितों की भी रक्षा होती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिजली चोरी के आपराधिक आरोप को ठोस तथ्यों और कानूनी आधार से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए। यही इस फैसले का व्यापक संदेश है।

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