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Bihar News | ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता कवि सत्यनारायण का निधन, 92 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस; राजकीय सम्मान से होगा अंतिम संस्कार

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता वरिष्ठ कवि-गीतकार सत्यनारायण का 92 वर्ष की उम्र में निधन, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शोक जताया।

समाचार: पटना, 28 अगस्त। बिहार की साहित्यिक और सांस्कृतिक दुनिया ने अपने एक महत्वपूर्ण रचनाकार को खो दिया है। वरिष्ठ कवि एवं गीतकार सत्यनारायण का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 27 अगस्त की देर रात पटना के कदमकुआं स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों के बीच शोक की लहर है।

सत्यनारायण का नाम बिहार के सांस्कृतिक जीवन में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता रहा है। उनकी रचनात्मक पहचान केवल कविताओं और गीतों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से बिहार की मिट्टी, उसकी परंपराओं, सामाजिक चेतना और जनभावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य और विशेष रूप से बिहार की गीत-कविता परंपरा को एक बड़ा झटका लगा है।

उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ प्रमुख है। बिहार के शताब्दी वर्ष 2012 के अवसर पर रचा गया यह गीत समय के साथ प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ता चला गया। गीत में बिहार के गौरव, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक चेतना को शब्दों के माध्यम से सामने रखा गया। यही वजह है कि सत्यनारायण को बिहार गीत के रचयिता के रूप में व्यापक पहचान मिली।

सत्यनारायण ने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की रचना भी की थी। इससे उनके साहित्यिक सरोकारों का दायरा समझा जा सकता है। गीत, नवगीत और कविता के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी अलग रचनात्मक आवाज दी।

जेपी आंदोलन से भी रहा गहरा जुड़ाव

सत्यनारायण के साहित्यिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन रहा। आंदोलन के दौर में उन्होंने नुक्कड़ कविता पाठ को जनसंवाद का माध्यम बनाया। चौक-चौराहों और सार्वजनिक जगहों पर कविता के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाने वाले रचनाकारों में उनका नाम प्रमुखता से सामने आया।

उस दौर में उनकी कविताओं में सामाजिक बेचैनी, आम लोगों की परेशानियां और व्यवस्था को लेकर उठते सवाल दिखाई देते थे। उन्होंने कविता को केवल साहित्यिक मंच तक सीमित रखने के बजाय उसे सीधे जनता के बीच ले जाने का काम किया। इसी वजह से जेपी आंदोलन के दौरान उनकी अलग पहचान बनी।

उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकार लगातार दिखाई देते रहे। आम आदमी के जीवन से जुड़े विषयों को उन्होंने सरल लेकिन प्रभावशाली अंदाज में अपनी कविताओं और गीतों में स्थान दिया। यही जनपक्षधरता उनकी साहित्यिक पहचान की महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती रही।

साहित्यिक संस्थाओं में भी निभाई जिम्मेदारी

सत्यनारायण साहित्य लेखन के साथ साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे। वे बिहार हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष रहे। इसके अलावा बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। साहित्यिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी के रचनाकारों को मंच उपलब्ध कराने में भी उनकी भूमिका रही।

संझाबाती पत्रिका के संपादक कवि-कथाकार हेमंत कुमार ने सत्यनारायण के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उनके जाने से हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है। हेमंत कुमार ने उन्हें संवेदना के स्वर का विशिष्ट रचनाकार बताते हुए कहा कि सत्यनारायण ने गीत, नवगीत और कविता के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई।

सरकार ने भी साहित्यिक योगदान को दिया सम्मान

सत्यनारायण की साहित्यिक साधना को विभिन्न स्तरों पर सम्मान मिला। बिहार सरकार ने उन्हें वर्ष 2020-21 के लिए नागार्जुन सम्मान से सम्मानित किया था। इसके बाद भारत सरकार की ओर से वर्ष 2023 में उन्हें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार प्रदान किया गया।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उनके निधन पर गहरी संवेदना जताई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘बिहार-गीत’ के रचनाकार और बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के पूर्व उपाध्यक्ष सत्यनारायण का निधन अत्यंत दुखद है। उन्होंने उनके साहित्यिक योगदान को याद करते हुए कहा कि सत्यनारायण ने अपनी रचनाओं के माध्यम से बिहार की संस्कृति, मिट्टी और गौरव को शब्द और स्वर दिया।

मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की कि सत्यनारायण का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिवार तथा उनके प्रशंसकों को इस कठिन समय में शक्ति देने की प्रार्थना की।

बिहार गीत के जरिए हमेशा याद किए जाएंगे

सत्यनारायण का निधन भले ही एक वरिष्ठ साहित्यकार के जीवन का अंत है, लेकिन उनकी रचनात्मक विरासत लंबे समय तक जीवित रहने वाली है। जेपी आंदोलन के दौरान नुक्कड़ पर कविता के जरिए लोगों से संवाद करने वाले इस कवि की पहचान बाद के वर्षों में बिहार की सांस्कृतिक आवाज से भी जुड़ी।

‘मेरे भारत के कंठहार’ जैसे गीत ने उन्हें बिहार के घर-घर तक पहुंचाया। नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत सहित उनकी अन्य रचनाएं भी उनकी साहित्यिक विरासत का हिस्सा हैं। साहित्य जगत में उनके योगदान को मिले सम्मान इस बात के प्रमाण हैं कि उनकी रचनाधर्मिता को व्यापक स्तर पर मान्यता मिली।

सत्यनारायण का जाना ऐसे समय में हुआ है जब उनकी कई रचनाएं नई पीढ़ी तक पहुंच रही हैं। उनका जीवन यह बताता है कि कविता केवल किताबों में दर्ज शब्द नहीं, बल्कि समाज और समय की आवाज भी बन सकती है। बिहार के साहित्यिक इतिहास में उनकी यह भूमिका उन्हें लंबे समय तक स्मरणीय बनाए रखेगी।

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टिप्पणी: किसी भी प्रदेश की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमा से नहीं बनती, बल्कि उसकी भाषा, साहित्य, गीत और सांस्कृतिक स्मृतियां उसे अलग पहचान देती हैं। सत्यनारायण का रचनात्मक जीवन इसी विरासत का उदाहरण रहा। उन्होंने कविता को मंच से बाहर निकालकर जनता के बीच पहुंचाया और बिहार की मिट्टी से जुड़े भावों को अपनी रचनाओं में जगह दी।

‘मेरे भारत के कंठहार’ जैसे गीत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह किसी व्यक्ति की निजी रचना भर नहीं रह गया, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ गया। ऐसे रचनाकारों का निधन केवल साहित्य जगत की क्षति नहीं होता, बल्कि समाज अपनी सांस्कृतिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो देता है।

जरूरत इस बात की है कि सत्यनारायण जैसे साहित्यकारों की रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उनकी कविताओं, गीतों और साहित्यिक योगदान को पाठ्यक्रम, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और डिजिटल माध्यमों में अधिक जगह मिलनी चाहिए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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