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Patna High Court: आय से अधिक संपत्ति मामले में DSP रणजीत कुमार रजक को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने केस किया रद्द

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पटना हाईकोर्ट ने DSP रणजीत कुमार रजक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले को रद्द कर दिया। करीब चार साल की जांच और आय-व्यय की गणना में खामियों पर अदालत ने सवाल उठाए।

पटना, 30 अगस्त। बिहार के पुलिस उपाधीक्षक रणजीत कुमार रजक को आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने मामले की जांच में हुई देरी और जांच एजेंसी की ओर से आय-व्यय के आकलन में सामने आई खामियों को गंभीरता से लेते हुए उनके खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि लंबे समय तक जांच चलने के बावजूद मामले में चार्जशीट दाखिल क्यों नहीं की गई।

मामला बिहार आर्थिक अपराध इकाई यानी EOU की ओर से वर्ष 2022 में दर्ज की गई प्राथमिकी से संबंधित था। रणजीत कुमार रजक पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों की तुलना में अधिक संपत्ति अर्जित की। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद आर्थिक अपराध इकाई ने मामले की जांच शुरू की थी।

लेकिन जांच करीब चार साल तक चलने के बाद भी अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंच सकी। न तो जांच पूरी हुई और न ही अदालत के समक्ष आरोपपत्र यानी चार्जशीट दाखिल की गई। इसी अवधि और जांच की प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए।

चार साल की जांच, फिर भी चार्जशीट नहीं

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि आर्थिक अपराध जैसे गंभीर आरोप से जुड़े मामले में जांच लंबे समय तक लंबित रही, लेकिन जांच एजेंसी की ओर से इस देरी का संतोषजनक कारण सामने नहीं रखा गया।

अदालत के अनुसार केवल जांच को लंबे समय तक जारी रखना पर्याप्त नहीं है। जांच के दौरान आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस तथ्य और विश्वसनीय गणना भी जरूरी है। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि जांच की प्रक्रिया और आय-व्यय के आकलन में ऐसी कमियां थीं, जिनका असर पूरे मामले पर पड़ सकता था।

आय की गणना पर भी उठे सवाल

मामले में आरोपी की संपत्ति, आय और खर्च का आकलन एक निर्धारित अवधि के आधार पर किया गया था। अदालत के समक्ष बताया गया कि 10 फरवरी 2015 से 5 सितंबर 2022 तक की अवधि को ध्यान में रखते हुए आय और संपत्ति की गणना की गई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस गणना को परखने के दौरान कई विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया। अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी ने आय के सभी संभावित वैध स्रोतों को उचित तरीके से शामिल नहीं किया था।

सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक कृषि से प्राप्त आय का था। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि करीब 34 लाख रुपये की कृषि आय को जांच के दौरान आरोपी की आय में शामिल नहीं किया गया था।

यानी जिस व्यक्ति की कुल आय और संपत्ति का आकलन कर आय से अधिक संपत्ति का आरोप तैयार किया गया, उसकी कृषि से होने वाली कथित वैध आय को गणना में शामिल नहीं किया गया। अदालत ने माना कि आय के सभी वैध स्रोतों को जोड़ने के बाद संपत्ति और आय के बीच का अंतर अलग हो सकता था।

गणना में गलती का असर पूरे केस पर

आय से अधिक संपत्ति के मामलों में आय, खर्च और संपत्ति का सही आकलन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसी गणना के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि किसी व्यक्ति के पास उसकी वैध आय की तुलना में कितनी अतिरिक्त संपत्ति है।

पटना हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में गणना की प्रक्रिया में ही गंभीर कमियां मौजूद थीं। अदालत के मुताबिक यदि आरोपी की वैध आय के सभी स्रोतों को शामिल किया जाता और गणना में मौजूद त्रुटियों को दूर किया जाता, तो जांच का अंतिम निष्कर्ष अलग हो सकता था।

इसी वजह से अदालत ने जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत सामग्री को आरोप को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

जांच में देरी भी बनी अहम वजह

इस मामले में सिर्फ आय की गणना ही सवालों के घेरे में नहीं रही। हाईकोर्ट ने जांच में हुई असाधारण देरी को भी गंभीरता से लिया।

वर्ष 2022 में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद लगभग चार साल का समय बीत गया, लेकिन जांच एजेंसी चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। अदालत ने इस देरी को सामान्य नहीं माना और पूछा कि आखिर इतनी लंबी अवधि के बाद भी जांच पूरी क्यों नहीं हो पाई।

न्यायालय ने जांच की गुणवत्ता और उसकी गति, दोनों पहलुओं को ध्यान में रखा। अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण था कि लंबे समय तक जांच लंबित रहने के बावजूद आरोपी के खिलाफ आरोपों को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके।

हाईकोर्ट ने खत्म किया मामला

जांच में देरी, चार्जशीट दाखिल नहीं होने और आय-व्यय की गणना में सामने आई कमियों को देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने रणजीत कुमार रजक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले को रद्द कर दिया।

इस फैसले से रणजीत कुमार रजक को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत की टिप्पणी से यह भी स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार या आय से अधिक संपत्ति जैसे मामलों में केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। जांच एजेंसी को आय के सभी वैध स्रोतों का निष्पक्ष आकलन करने के साथ-साथ संपत्ति और खर्च की गणना को भी तथ्यात्मक रूप से सही रखना होता है।

इस मामले में कृषि आय को गणना से बाहर रखने और आय-व्यय के आकलन में सामने आई विसंगतियों ने जांच की विश्वसनीयता पर असर डाला। इसके साथ ही करीब चार वर्षों तक जांच लंबित रहने और चार्जशीट दाखिल नहीं किए जाने ने भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि, हाईकोर्ट का यह आदेश इस विशेष मामले की जांच और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। अदालत द्वारा मामले को रद्द किए जाने का अर्थ यह है कि मौजूदा मामले में आरोपी को राहत मिली है।

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कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश

आय से अधिक संपत्ति जैसे मामलों में जांच की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण होती है। किसी अधिकारी की संपत्ति का मूल्यांकन करते समय वेतन के अलावा कृषि, पैतृक संपत्ति, निवेश या अन्य वैध स्रोतों से होने वाली आय को भी नियमों के अनुसार जांच में शामिल करना जरूरी है। यदि आय का कोई महत्वपूर्ण स्रोत गणना से बाहर रह जाए तो संपत्ति और आय के बीच का कथित अंतर वास्तविक स्थिति से अलग दिखाई दे सकता है।

पटना हाईकोर्ट के इस आदेश में जांच की समयसीमा और उसकी गुणवत्ता दोनों पर ध्यान गया है। लंबे समय तक जांच लंबित रखना और फिर भी आरोपों को पुष्ट करने वाली पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर पाना जांच एजेंसी के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए इस मायने में महत्वपूर्ण है कि आर्थिक अपराध से जुड़े मामलों में जल्दबाजी के बजाय सटीक, पारदर्शी और पूर्ण वित्तीय आकलन जरूरी है।

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