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Women Success Story: दिहाड़ी मजदूरी से स्वरोजगार तक पहुंचीं बक्सर की कुसुम देवी, 20 हजार की मदद से शुरू किया किराना कारोबार

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | Buxar News: बक्सर की कुसुम देवी ने जीविका समूह से जुड़कर सतत जीविकोपार्जन योजना के तहत 20 हजार रुपये की सहायता से किराना दुकान शुरू की। अब करीब 4 हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही हैं।

बक्सर, 3 सितंबर। Alam Ki Khabar। आर्थिक परेशानियों के बीच अपने परिवार को संभालने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने वाली बक्सर की एक महिला ने अब अपने लिए रोजगार का स्थायी रास्ता तैयार कर लिया है। डुमरांव प्रखंड के कसिया गांव की रहने वाली कुसुम देवी ने जीविका समूह से जुड़ने के बाद किराना दुकान शुरू की और धीरे-धीरे मजदूरी पर निर्भरता कम करने में सफलता हासिल की। आज उनकी दुकान से करीब 4 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी हो रही है।

कुसुम देवी की कहानी सिर्फ एक छोटी दुकान शुरू करने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की तस्वीर है, जिसमें ग्रामीण परिवेश की महिलाएं आर्थिक मुश्किलों के बीच अपने लिए रोजगार का रास्ता तैयार कर रही हैं। जीविका समूह से मिली जानकारी, सहयोग और आर्थिक सहायता ने कुसुम देवी को अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर दिया।

कभी पति के साथ मजदूरी कर चलाती थीं परिवार

कसिया गांव में रहने वाली कुसुम देवी के परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय तक बेहद चुनौतीपूर्ण रही। परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी हैं। बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घर की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी के बीच आय का कोई स्थायी साधन नहीं था।

परिवार की आमदनी के लिए कुसुम देवी और उनके पति दोनों दिहाड़ी मजदूरी करते थे। मजदूरी मिलने पर ही घर का खर्च चलता था। काम की नियमितता नहीं होने के कारण महीने की आमदनी भी तय नहीं रहती थी। इसके चलते परिवार को कई तरह की आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

स्थिति इतनी कठिन थी कि परिवार के पास अपना मकान भी नहीं था। दूसरे के घर में रहकर परिवार को जीवन गुजारना पड़ता था। ऐसे हालात में बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य के लिए कुछ बचा पाना भी मुश्किल था।

जीविका समूह से जुड़ना बना बदलाव की शुरुआत

लगातार आर्थिक संघर्ष के बीच कुसुम देवी ने अपनी स्थिति बदलने के लिए नया रास्ता तलाशना शुरू किया। इसी क्रम में वह जीविका से जुड़ीं और दुर्गा स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनीं।

स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके सामने केवल बचत का रास्ता नहीं खुला, बल्कि आर्थिक गतिविधियों और स्वरोजगार से जुड़े विकल्पों की जानकारी भी मिली। समूह की गतिविधियों ने उन्हें पैसे के प्रबंधन और नियमित बचत के महत्व को समझने का अवसर दिया।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उनके आत्मविश्वास में आया। पहले जहां परिवार की आय के लिए मजदूरी ही मुख्य सहारा थी, वहीं समूह से जुड़ने के बाद कुसुम देवी ने खुद कोई काम शुरू करने के बारे में सोचना शुरू किया।

20 हजार रुपये की सहायता से खुली किराना दुकान

कुसुम देवी को सतत जीविकोपार्जन योजना (SJY) के तहत 20 हजार रुपये की वित्तीय सहायता मिली। यह राशि उनके लिए कारोबार शुरू करने की पूंजी बनी।

कुसुम देवी ने सहायता की रकम को घरेलू खर्च में समाप्त करने के बजाय उससे आय का साधन तैयार करने का फैसला लिया। उन्होंने गांव में ही छोटी किराना दुकान शुरू कर दी। दुकान में रोजमर्रा की जरूरत का सामान उपलब्ध कराया जाने लगा, जिससे आसपास के लोगों को स्थानीय स्तर पर सामान मिलने लगा।

शुरुआत भले ही छोटे स्तर से हुई, लेकिन कुसुम देवी के लिए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण था। अब उनकी आमदनी किसी दूसरे के यहां मिलने वाले काम पर पूरी तरह निर्भर नहीं थी। उन्होंने अपने हाथों में अपना रोजगार खड़ा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया था।

अब हर महीने करीब 4 हजार रुपये की कमाई

कुसुम देवी वर्तमान में खुद अपनी किराना दुकान संभाल रही हैं। दुकान से उन्हें करीब 4 हजार रुपये प्रति माह की आय प्राप्त हो रही है। यह आमदनी परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

दिहाड़ी मजदूरी में जहां काम मिलने और आमदनी होने की कोई निश्चितता नहीं रहती थी, वहीं दुकान ने कुसुम देवी को रोजाना अपने कारोबार पर काम करने का अवसर दिया है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद मजबूत हुई है।

कुसुम देवी के लिए यह दुकान केवल सामान बेचने की जगह नहीं है। यह उनके संघर्ष से निकली वह पहल है, जिसने उन्हें आर्थिक फैसलों में अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका दिया है।

परिवार की आर्थिक स्थिति में आया बदलाव

छोटे कारोबार की आमदनी ने परिवार को रोजमर्रा के खर्चों को संभालने में सहारा दिया है। बच्चों की जरूरतों से लेकर घर के अन्य खर्चों तक, कुसुम देवी अब अपनी कमाई के जरिए परिवार में योगदान दे रही हैं।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्तर पर शुरू किया गया कारोबार परिवार की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए बड़ी पूंजी के बजाय सही अवसर, मार्गदर्शन और मेहनत की जरूरत होती है।

कुसुम देवी ने मिली आर्थिक सहायता का इस्तेमाल रोजगार तैयार करने के लिए किया। इससे उनके भीतर यह भरोसा भी बढ़ा कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में वह स्वयं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

दूसरी महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

कुसुम देवी की यात्रा उन ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है, जो आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण अपना काम शुरू करने के बारे में सोच भी नहीं पातीं। उनकी कहानी बताती है कि स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के साथ-साथ उनमें निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी पैदा कर सकते हैं।

एक समय दिहाड़ी मजदूरी परिवार की आय का प्रमुख सहारा थी। आज कुसुम देवी अपने गांव में खुद का छोटा कारोबार चला रही हैं। भले ही उनकी मासिक आमदनी अभी करीब 4 हजार रुपये है, लेकिन इस आमदनी का महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि यह उनके अपने प्रयास से तैयार हुआ रोजगार है।

बक्सर की कुसुम देवी की कहानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिला भागीदारी की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखती है। जब महिलाओं को समूह, मार्गदर्शन और शुरुआती आर्थिक सहयोग मिलता है, तो वे अपनी जरूरत के मुताबिक छोटे कारोबार खड़े कर सकती हैं। ऐसे प्रयास परिवार की आय बढ़ाने के साथ महिलाओं के आत्मविश्वास और सामाजिक भूमिका को भी मजबूत करते हैं।

कुसुम देवी ने 20 हजार रुपये की सहायता से शुरुआत की और उसे किराना कारोबार में लगाया। आज वही छोटी दुकान उनके परिवार के लिए आय का साधन बनी हुई है। उनकी यह यात्रा बताती है कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत हमेशा बड़े निवेश से नहीं होती, कई बार छोटे अवसर को सही दिशा देने से भी बदलाव की शुरुआत हो जाती है।

ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक ताकत बन रही छोटी पूंजी

कुसुम देवी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता तभी ज्यादा प्रभावी होती है, जब उसके साथ रोजगार का अवसर और सही मार्गदर्शन भी मिले। 20 हजार रुपये की राशि अपने आप में बहुत बड़ी पूंजी नहीं है, लेकिन कुसुम देवी ने इसी राशि को कारोबार शुरू करने का आधार बनाया।

ग्रामीण परिवारों में महिलाओं की मेहनत अक्सर घर और परिवार तक सीमित रह जाती है। जब वही महिला अपनी आमदनी का साधन तैयार करती है, तो उसका असर केवल उसकी व्यक्तिगत स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक सोच बदलने लगती है। बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है और परिवार को आय के अतिरिक्त स्रोत का सहारा मिलता है।

जीविका जैसे स्वयं सहायता समूहों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे महिलाओं को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ आर्थिक गतिविधियों की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। कुसुम देवी का उदाहरण दिखाता है कि छोटे कारोबार को भी गंभीरता से आगे बढ़ाया जाए तो वह परिवार के लिए नियमित आय का आधार बन सकता है।

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