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Patna High Court: रजिस्ट्री के बाद मनमाने अतिरिक्त स्टांप शुल्क पर हाईकोर्ट की रोक, निबंधन विभाग का आदेश रद्द

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पटना हाईकोर्ट ने जमीन रजिस्ट्री मामले में निबंधन विभाग का आदेश रद्द करते हुए कहा कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर दिए बिना अतिरिक्त स्टांप शुल्क व जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।

पटना, 05 सितंबर। जमीन की रजिस्ट्री और स्टांप शुल्क से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पटना हाईकोर्ट ने नागरिकों के कानूनी अधिकारों और निर्धारित प्रक्रिया को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि जब किसी दस्तावेज के निबंधन के समय निर्धारित स्टांप शुल्क और अन्य शुल्क जमा कर दस्तावेज स्वीकार कर लिया गया हो, तो बाद में कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अतिरिक्त स्टांप शुल्क और जुर्माना थोपना उचित नहीं है।

जस्टिस राजकुमार की एकलपीठ ने शशि भूषण सिंह की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सहायक महानिरीक्षक, निबंधन, तिरहुत प्रमंडल, मुजफ्फरपुर द्वारा 14 जुलाई 2015 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। उक्त आदेश के तहत याचिकाकर्ता पर 10,13,400 रुपये अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और 1,01,340 रुपये जुर्माना लगाया गया था।

14 कट्ठा जमीन की रजिस्ट्री से शुरू हुआ विवाद

पूरा मामला मुजफ्फरपुर में करीब 14 कट्ठा जमीन के बिक्री विलेख के निबंधन से जुड़ा था। यह बिक्री विलेख सिविल कोर्ट की डिक्री के अनुपालन में तैयार किया गया था।

रजिस्ट्री की प्रक्रिया के दौरान जिला अवर निबंधक के समक्ष उपलब्ध दस्तावेज और जमीन की प्रकृति के आधार पर शुल्क निर्धारित किया गया। याचिकाकर्ता ने निर्धारित राशि जमा कर दी और 12 दिसंबर 2014 को बिक्री विलेख स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद संबंधित रसीद और टोकन भी जारी कर दिया गया।

मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। दस्तावेज स्वीकार किए जाने के बाद उसे याचिकाकर्ता को सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बजाय जमीन की प्रकृति को लेकर बाद में सवाल उठाया गया।

महीनों बाद जमीन को बताया गया व्यावसायिक

अदालत के समक्ष रखे गए मामले के अनुसार, दस्तावेज स्वीकार होने के लगभग साढ़े चार महीने बाद एक अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट के आधार पर जमीन को व्यावसायिक प्रकृति का माना गया।

रिपोर्ट में जमीन पर मौजूद एक झोपड़ी में व्यावसायिक गतिविधि होने का उल्लेख किया गया था। इसी आधार पर निबंधन विभाग ने स्टांप शुल्क से संबंधित धारा 47-A के तहत अतिरिक्त शुल्क की कार्रवाई शुरू की।

इसके बाद याचिकाकर्ता पर लाखों रुपये का अतिरिक्त स्टांप शुल्क और जुर्माना निर्धारित किया गया। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई।

रजिस्ट्री के समय जांच का अवसर था: हाईकोर्ट

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि जब बिक्री विलेख निबंधन के लिए प्रस्तुत किया गया था, उसी समय जमीन की प्रकृति और उसके बाजार मूल्य का परीक्षण करने का अवसर संबंधित निबंधन अधिकारी के पास मौजूद था।

अदालत के अनुसार, यदि जमीन की प्रकृति अथवा मूल्य को लेकर कोई संदेह था तो उसी समय आवश्यक जांच कराई जा सकती थी। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अंचल अधिकारी से भी रिपोर्ट ली जा सकती थी।

बाद में एक ऐसे अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर जमीन की प्रकृति बदलकर अतिरिक्त शुल्क की कार्रवाई किए जाने पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया।

अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि जिस अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट को आधार बनाकर जमीन की प्रकृति व्यावसायिक बताई गई, वह जमीन की प्रकृति निर्धारित करने के लिए नियमों के तहत सक्षम लोक प्राधिकारी नहीं था।

अदालत के इस निष्कर्ष का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी जमीन की प्रकृति और उसके आधार पर स्टांप शुल्क तय करने की प्रक्रिया संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुरूप होनी चाहिए।

सिर्फ किसी कर्मचारी की रिपोर्ट के आधार पर किसी नागरिक पर अतिरिक्त वित्तीय देनदारी डालने से पहले वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

सुनवाई का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया

मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा। अदालत ने धारा 47-A(2) के तहत संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस मामले में 6 जुलाई 2015 को नोटिस जारी कर याचिकाकर्ता को 14 जुलाई को उपस्थित होने के लिए कहा गया था। इसके बाद 14 जुलाई को ही अंतिम आदेश पारित कर दिया गया।

यानी नोटिस और अंतिम आदेश के बीच पर्याप्त समय नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को कानून में निर्धारित सुनवाई के अधिकार के अनुरूप नहीं माना।

सिर्फ अपील का विकल्प बताकर नहीं बच सकता प्रशासन

राज्य सरकार की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि संबंधित आदेश के खिलाफ वैकल्पिक अपील का रास्ता उपलब्ध था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मूल स्तर पर ही कानून के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, तो केवल बाद में उपलब्ध अपीलीय व्यवस्था उस मूल कमी को स्वतः ठीक नहीं कर सकती।

यह टिप्पणी प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि किसी आदेश को पारित करते समय प्रारंभिक स्तर पर ही वैधानिक प्रक्रिया और सुनवाई के अधिकार का पालन करना जरूरी है।

2015 का आदेश और रिपोर्ट दोनों रद्द

हाईकोर्ट ने मामले में 14 जुलाई 2015 के आदेश के साथ-साथ 7 फरवरी 2015 की रिपोर्ट को भी निरस्त कर दिया।

अदालत के आदेश के बाद जिला अवर निबंधक, मुजफ्फरपुर को बिक्री विलेख का अंतिम निबंधन करने और उसे याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया गया। इसके लिए अदालत ने चार सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की।

जमीन मालिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?

यह फैसला केवल एक जमीन की रजिस्ट्री तक सीमित नहीं है। जमीन के निबंधन और स्टांप शुल्क से जुड़े मामलों में दस्तावेज की प्रकृति, जमीन का मूल्यांकन और लागू शुल्क महत्वपूर्ण विषय होते हैं।

अदालत के फैसले से यह संदेश निकलता है कि यदि किसी दस्तावेज के संबंध में अतिरिक्त शुल्क निर्धारित करना है तो संबंधित अधिकारी को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। नागरिक को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी देना होगा।

इस मामले में अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि प्रशासनिक निर्णय केवल अनुमान या ऐसी रिपोर्ट के आधार पर नहीं लिया जा सकता, जिसे तैयार करने वाला अधिकारी उस विषय पर निर्णय लेने के लिए सक्षम ही न हो।

प्रशासनिक कार्रवाई में प्रक्रिया सबसे अहम

हाईकोर्ट का फैसला इस व्यापक सिद्धांत को भी रेखांकित करता है कि सरकारी अधिकारियों को अधिकार मिलने के साथ उस अधिकार का इस्तेमाल कानून के मुताबिक करने की जिम्मेदारी भी होती है।

जमीन की रजिस्ट्री के समय अगर किसी तथ्य की जांच जरूरी थी तो उसे उसी चरण में किया जाना चाहिए था। बाद में अतिरिक्त शुल्क लगाने की कार्रवाई की जाती है तो उसके लिए भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, नोटिस और सुनवाई के अधिकार का पालन जरूरी है।

इस मामले में अदालत ने इसी प्रक्रिया को केंद्र में रखते हुए निबंधन विभाग की कार्रवाई को खारिज किया।

नागरिकों के अधिकार पर हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

फैसले का सबसे अहम संदेश यही है कि सरकारी विभाग किसी नागरिक पर वित्तीय बोझ डालने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

रजिस्ट्री के समय शुल्क निर्धारित करने, दस्तावेज स्वीकार करने और बाद में किसी तरह की अतिरिक्त देनदारी तय करने के बीच कानून की प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि किसी स्तर पर नागरिक को सुनवाई का उचित अवसर नहीं मिलता या सक्षम अधिकारी के बजाय किसी अन्य स्तर की रिपोर्ट को निर्णायक आधार बनाया जाता है, तो ऐसी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती है।

मुजफ्फरपुर की इस जमीन रजिस्ट्री से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट का फैसला इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने न केवल अतिरिक्त स्टांप शुल्क और जुर्माने वाले आदेश को रद्द किया, बल्कि संबंधित बिक्री विलेख का अंतिम निबंधन कर उसे चार सप्ताह में याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश भी दिया।

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