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Bihar Politics: बिहार-झारखंड विभाजन पर सम्राट चौधरी ने साझा की पुरानी यादें, बोले- दुखी मन से की थी वोटिंग

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार-झारखंड विभाजन के दौर को याद करते हुए आर्थिक स्थिति, राजस्व और बिहार के बजट में हुए बदलाव का उल्लेख किया।

पटना, 23 सितंबर 2026। Alam Ki Khabar: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार और झारखंड के अलग होने के दौर को याद करते हुए अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्ष 2000 में बिहार के विभाजन के समय वह और श्रवण कुमार इस फैसले से भावनात्मक रूप से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने सदन में दुखी मन से वोटिंग की थी। मुख्यमंत्री ने इस दौरान बिहार के पुराने आर्थिक ढांचे और विभाजन के बाद राज्य के सामने आई वित्तीय चुनौतियों का भी उल्लेख किया।

सम्राट चौधरी ने कहा कि बिहार और झारखंड का विभाजन केवल प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव नहीं था। उनके मुताबिक, इसके साथ राज्य की आर्थिक संरचना पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा। उन्होंने पुराने बिहार में मौजूद औद्योगिक क्षेत्रों और खनिज संपदा का जिक्र करते हुए कहा कि टाटा और बोकारो जैसे औद्योगिक क्षेत्र उस समय बिहार का हिस्सा थे।

राजस्व में झारखंड क्षेत्र की हिस्सेदारी का किया उल्लेख

मुख्यमंत्री ने अपने शुरुआती राजनीतिक दौर की आर्थिक तस्वीर सामने रखते हुए कहा कि जब वह पहली बार विधायक बने थे, तब बिहार की आय में झारखंड क्षेत्र का हिस्सा बहुत बड़ा था। उन्होंने अपने हालिया संबोधन में 87 प्रतिशत राजस्व और 13 प्रतिशत हिस्सेदारी का आंकड़ा बताते हुए विभाजन के बाद बिहार की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव की चर्चा की।

सम्राट चौधरी के मुताबिक, उस समय बिहार का बजट आज की तुलना में काफी छोटा था। उन्होंने पुराने बजट के आंकड़ों को याद करते हुए कहा कि पहली बार सदन में पहुंचने के समय राज्य का बजट करीब 6 हजार करोड़ रुपये के आसपास था। उनके बयान का मुख्य जोर इस बात पर था कि बिहार के पास औद्योगिक और खनिज संसाधनों का बड़ा हिस्सा विभाजन के बाद झारखंड में चला गया।

अटल बिहारी वाजपेयी की सोच का भी किया जिक्र

बिहार-झारखंड विभाजन की चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सोच का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अलग झारखंड राज्य बनाने के पीछे आदिवासी समाज के लिए अलग राज्य की अवधारणा और वहां विकास की संभावनाओं को बढ़ाने की सोच थी।

सम्राट चौधरी ने कहा कि उस समय अलग राज्य के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी और वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड अस्तित्व में आया। उन्होंने इस दौर को अपने राजनीतिक जीवन की पुरानी स्मृतियों से जोड़ते हुए बताया कि वह और श्रवण कुमार विभाजन के पक्ष में सहज नहीं थे और सदन में वोटिंग के दौरान उन्हें भावनात्मक रूप से कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा था।

विभाजन के बाद बदली बिहार की आर्थिक तस्वीर

मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार के सामने विभाजन के बाद सबसे बड़ी चुनौती उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विकास की नई दिशा तैयार करने की थी। उन्होंने पुराने बिहार में उद्योग, खनिज और राजस्व के वितरण का जिक्र करते हुए कहा कि विभाजन के बाद राज्य को सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

उनके अनुसार, बिहार के सामने उस समय बुनियादी ढांचे, निवेश और आर्थिक संसाधनों से जुड़ी कई चुनौतियां थीं। हालांकि, उनका कहना है कि बाद के वर्षों में राज्य ने अपनी आर्थिक क्षमता को बढ़ाने की दिशा में लगातार काम किया।

2005 के बाद के बदलावों का भी किया उल्लेख

सम्राट चौधरी ने वर्ष 2005 के बाद बिहार में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए नीतीश कुमार के कार्यकाल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय राज्य के सामने सीमित संसाधनों के साथ विकास की बड़ी चुनौती थी और धीरे-धीरे बजट का आकार बढ़ा।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तब बिहार का बजट करीब 23 हजार करोड़ रुपये के स्तर पर था। उन्होंने केंद्र की ओर से बिहार को दिए गए आर्थिक सहयोग और विशेष सहायता का भी जिक्र किया।

सम्राट चौधरी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दौरान बिहार के लिए घोषित विशेष आर्थिक सहायता की चर्चा करते हुए कहा कि उस दौर में राज्य के लिए 16 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की बात हुई थी। हालांकि, इस दावे के अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भ और पैकेज की गणना को संबंधित सरकारी दस्तावेजों के आधार पर अलग से देखना जरूरी है।

वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश करने का अनुभव बताया

मुख्यमंत्री ने अपने वित्त मंत्री के कार्यकाल को याद करते हुए वर्ष 2024 के बजट का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर बजट पेश किया, तब उन्होंने बिहार और झारखंड के बजट की तुलना करते हुए राज्य की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव को देखा।

सम्राट चौधरी ने कहा कि जिस झारखंड क्षेत्र से कभी बिहार के राजस्व में बड़ी हिस्सेदारी आती थी, वहां का बजट उस समय करीब 1 लाख 39 हजार करोड़ रुपये था। इसके मुकाबले बिहार का बजट 3 लाख 17 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। यह आंकड़ा उनके हालिया संबोधन में बताए गए आंकड़ों के अनुरूप है।

'बदला हुआ बिहार' बताकर विकास यात्रा का किया उल्लेख

मुख्यमंत्री ने बिहार के मौजूदा आर्थिक आकार को राज्य की लंबी विकास यात्रा से जोड़ते हुए कहा कि विभाजन के बाद सामने आई चुनौतियों के बावजूद बिहार ने अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया।

उन्होंने अपने संबोधन में इस बदलाव को 'बदला हुआ बिहार' के रूप में पेश किया और कहा कि आज राज्य का बजट उस दौर की तुलना में कई गुना बड़ा है। उपलब्ध बजट दस्तावेजों के अनुसार भी बिहार का बजट पिछले वर्षों में लगातार बढ़ा है और 2025-26 में कुल बजट आकार करीब 3.17 लाख करोड़ रुपये रहा था।

बिहार के आर्थिक सफर पर फिर केंद्रित हुई चर्चा

सम्राट चौधरी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार के विकास, उद्योग, निवेश और आर्थिक संसाधनों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। बिहार-झारखंड विभाजन को 26 साल से अधिक समय हो चुका है और दोनों राज्यों की आर्थिक यात्रा अलग-अलग परिस्थितियों में आगे बढ़ी है।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में पुराने बिहार की स्थिति से लेकर वर्तमान बजट आकार तक का उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि राज्य ने विभाजन के बाद उपलब्ध संसाधनों के साथ अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाई है। उनके द्वारा बताए गए आंकड़े और ऐतिहासिक दावे उनके संबोधन के संदर्भ में हैं; अलग-अलग आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित बजट और सरकारी अभिलेखों से की जा सकती है।

विभाजन की विरासत और भविष्य की चुनौती

बिहार और झारखंड का विभाजन केवल अतीत की राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव आज भी दोनों राज्यों की चर्चा में दिखाई देते हैं। बिहार के सामने प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता, रोजगार, औद्योगिक निवेश और बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

वहीं, राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ सरकार के सामने यह चुनौती भी है कि बजट में बढ़ोतरी का लाभ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और ग्रामीण विकास तक किस तरह पहुंचे। सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में बिहार की पिछली स्थिति और वर्तमान आर्थिक आकार के बीच अंतर को इसी व्यापक संदर्भ में सामने रखा।

अतीत की याद से विकास की बहस तक

सम्राट चौधरी द्वारा बिहार-झारखंड विभाजन के समय की अपनी राजनीतिक स्मृतियां साझा करने से एक बार फिर राज्य के आर्थिक इतिहास पर चर्चा शुरू हुई है। उन्होंने जहां उस दौर में अपनी और श्रवण कुमार की भावनात्मक स्थिति का जिक्र किया, वहीं बाद के वर्षों में बिहार के बजट और आर्थिक क्षमता में हुए विस्तार को भी रेखांकित किया।

इस बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्यमंत्री ने बिहार के विकास को केवल वर्तमान योजनाओं के संदर्भ में नहीं, बल्कि वर्ष 2000 के विभाजन के बाद बदली आर्थिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया। अब इस बहस का अगला महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बिहार आने वाले वर्षों में अपने बजट आकार को किस तरह वास्तविक आर्थिक अवसरों, रोजगार और औद्योगिक विकास में बदलता है।

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बिहार के आर्थिक इतिहास को आंकड़ों के साथ समझना जरूरी

बिहार-झारखंड विभाजन की चर्चा में भावनात्मक और राजनीतिक पहलुओं के साथ आर्थिक आंकड़ों को भी अलग-अलग समयखंड के संदर्भ में देखना जरूरी है। विभाजन से पहले का बिहार और वर्ष 2000 के बाद का बिहार प्रशासनिक, भौगोलिक और आर्थिक रूप से अलग परिस्थितियों में काम करता रहा है।

इसलिए किसी एक आंकड़े के आधार पर पूरे आर्थिक इतिहास का निष्कर्ष निकालने के बजाय राजस्व, बजट, उद्योग, खनिज संसाधन, केंद्रीय सहायता और विकास व्यय को साथ रखकर स्थिति को समझना अधिक उपयोगी होगा। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में पुराने आंकड़ों और वर्तमान बजट का उदाहरण देकर बिहार की आर्थिक यात्रा का अपना पक्ष रखा है। इन दावों के साथ आधिकारिक बजट दस्तावेजों और ऐतिहासिक अभिलेखों को देखना तथ्यात्मक तस्वीर को और स्पष्ट करता है।

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