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Patna News: बिहार बोर्ड के तीन कर्मचारियों पर कथित फर्जी प्रमाणपत्र से नौकरी का आरोप, FIR दर्ज

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार बोर्ड के तीन कर्मचारियों के खिलाफ कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप में FIR दर्ज हुई है। कोतवाली पुलिस मामले की जांच कर रही है।

पटना, 27 सितंबर, आलम की खबर: बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तीन कर्मचारियों के खिलाफ कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई है। मामला सामने आने के बाद कोतवाली थाना पुलिस ने शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित प्रमाणपत्र वास्तव में कहां से जारी हुए थे और नियुक्ति के समय उनका इस्तेमाल किस तरह किया गया।

जिन तीन कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है, उनमें शिव कुमार यादव, माधव यादव और हरिमोहन यादव के नाम शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक तीनों बिहार बोर्ड में पदचर के पद पर कार्यरत थे। खास बात यह है कि तीनों की नियुक्तियां वर्ष 1994 और 1995 की हैं। यानी जिस नौकरी से जुड़े दस्तावेज अब जांच के घेरे में हैं, उनकी सेवा अवधि करीब तीन दशक से भी अधिक पुरानी है।

1994-95 में हुई थी नियुक्ति

रिकॉर्ड के मुताबिक शिव कुमार यादव की नियुक्ति 1 जुलाई 1995 को हुई थी। वहीं माधव यादव को 1 जुलाई 1994 और हरिमोहन यादव को 1 अप्रैल 1995 को नियुक्त किया गया था।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नियुक्तियों के कई वर्ष बाद इनके शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल सामने आया। अब पुलिस नियुक्ति से लेकर प्रमाणपत्रों के सत्यापन तक की पूरी प्रक्रिया को क्रमवार खंगाल रही है।

सेवा समायोजन के दौरान सामने आया मामला

जानकारी के अनुसार तीनों कर्मचारियों ने वर्ष 2005 में अपने शैक्षणिक प्रमाणपत्र बोर्ड के समक्ष जमा किए थे। बाद में सेवा समायोजन की प्रक्रिया के दौरान इन प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया गया।

वर्ष 2016 में संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से प्रमाणपत्रों की पुष्टि कराने की प्रक्रिया शुरू हुई। सत्यापन के दौरान संस्थानों से यह जानकारी मांगी गई कि संबंधित दस्तावेज उन्हीं के यहां से जारी किए गए हैं या नहीं।

आरोप है कि सत्यापन प्रक्रिया में इन प्रमाणपत्रों के संबंधित संस्थानों से जारी होने की पुष्टि नहीं हो सकी। इसके बाद मामला बोर्ड स्तर पर सामने आया और आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।

बोर्ड के अधिकारी की शिकायत पर FIR

मामले में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के प्रभारी प्रशाखा पदाधिकारी की ओर से पटना के कोतवाली थाने में लिखित शिकायत दी गई। इसी शिकायत के आधार पर तीनों कर्मचारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।

FIR दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। जांच का मुख्य बिंदु यह है कि जिन प्रमाणपत्रों को नौकरी और सेवा से जुड़े रिकॉर्ड में इस्तेमाल किया गया, उनकी वास्तविक स्थिति क्या थी।

नियुक्ति के समय कौन से दस्तावेज दिए गए थे?

पुलिस अब तीनों कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े पुराने रिकॉर्ड खंगाल रही है। इसमें नियुक्ति पत्र, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, सेवा पुस्तिका और सत्यापन से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा रही है।

जांच में यह भी देखा जाएगा कि नियुक्ति के समय कर्मचारियों ने कौन-कौन से शैक्षणिक दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। इसके अलावा प्रमाणपत्रों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और बाद में सेवा समायोजन के दौरान सामने आई आपत्तियों पर क्या प्रक्रिया अपनाई गई, इसकी भी पड़ताल होगी।

प्रमाणपत्र कहां से आए, पुलिस तलाशेगी जवाब

पुलिस के सामने एक अहम सवाल यह भी है कि कथित तौर पर संदिग्ध प्रमाणपत्र कर्मचारियों तक कैसे पहुंचे। यदि जांच में प्रमाणपत्रों के फर्जी होने की पुष्टि होती है, तो उनके इस्तेमाल और नियुक्ति प्रक्रिया में उनकी भूमिका की भी जांच की जाएगी।

इसके लिए पुलिस संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से मिले सत्यापन रिकॉर्ड, बोर्ड के दस्तावेज और कर्मचारियों की सेवा से जुड़े कागजात का मिलान कर सकती है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

करीब 30 साल बाद क्यों उठा मामला?

तीनों कर्मचारियों की नियुक्तियां वर्ष 1994 और 1995 की हैं, जबकि प्रमाणपत्रों का सत्यापन वर्ष 2016 में सेवा समायोजन की प्रक्रिया के दौरान कराया गया था। इस तरह नियुक्ति और बाद के सत्यापन के बीच लंबा अंतराल रहा।

अब प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस पूरे घटनाक्रम की समय-रेखा तैयार कर रही है। इसमें नियुक्ति के समय जमा दस्तावेज से लेकर वर्ष 2005 में प्रमाणपत्र जमा करने और वर्ष 2016 में हुए सत्यापन तक के रिकॉर्ड को देखा जाएगा।

जांच के बाद सामने आएगी पूरी तस्वीर

फिलहाल प्राथमिकी दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत है। प्रमाणपत्रों की वास्तविकता, उनके इस्तेमाल और नियुक्ति प्रक्रिया में उनकी भूमिका से जुड़े अंतिम तथ्य पुलिस की जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।

कोतवाली थाना पुलिस अब उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर मामले की पड़ताल कर रही है। जांच के दौरान यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन या अन्य अनियमितता के तथ्य सामने आते हैं, तो उसी आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई होगी।

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तीन दशक पुराने रिकॉर्ड की जांच से जुड़े कई सवाल

बिहार बोर्ड के तीन कर्मचारियों से जुड़ा यह मामला सरकारी नियुक्तियों में शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े करता है। हालांकि इस मामले में आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

फिलहाल पुलिस के सामने सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां हैं—मूल प्रमाणपत्र, संबंधित संस्थानों का सत्यापन, नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड और सेवा समायोजन के दौरान हुई कार्रवाई। इन सभी दस्तावेजों के आधार पर ही यह स्पष्ट होगा कि कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किस स्तर पर और किस उद्देश्य से किया गया था।

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