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Patna High Court: सुखो सदा हत्याकांड में प्रदीप महतो बरी, गवाहों के बयान और FIR में मिलीं अहम विसंगतियां

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पटना हाईकोर्ट ने सुखो सदा हत्याकांड में प्रदीप महतो की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर उसे बरी कर दिया। अदालत ने गवाहों के बयान, FIR और इनक्वेस्ट रिपोर्ट में मिली विसंगतियों को अहम माना।

पटना, 3 अक्टूबर आलम की खबर: पटना हाईकोर्ट ने सुखो सदा हत्याकांड से जुड़े एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए प्रदीप महतो को बरी कर दिया है। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत हुई दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया। जस्टिस संजय सिंह और जस्टिस अंशुल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की कहानी, गवाहों के बयान, FIR दर्ज होने के समय और इनक्वेस्ट रिपोर्ट सहित रिकॉर्ड पर मौजूद कई परिस्थितियों का विस्तृत परीक्षण किया।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर उठे सवाल

अभियोजन की ओर से आरोप लगाया गया था कि विवाद के बाद प्रदीप महतो ने ताड़ के पेड़ के पास सुखो सदा को गोली मार दी थी। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कई लोगों को प्रत्यक्षदर्शी के रूप में पेश किया।

हालांकि हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और जिरह में सामने आई परिस्थितियों ने अभियोजन के प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे को कमजोर किया। अदालत ने सत्तन सदा, अशोक सदा और एतवारी सदा के बयानों का परीक्षण किया और पाया कि उनके बयान घटना को अपनी आंखों से देखने के दावे को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं करते।

सूचक पवन सदा के प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे की भी अन्य गवाहों के बयान से पर्याप्त पुष्टि नहीं हो सकी। इन परिस्थितियों के कारण अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी गवाही को लेकर अभियोजन के मामले में गंभीर संदेह पाया।

मृतक की पत्नी का बयान भी बना अहम बिंदु

मामले में मृतक की पत्नी खखरी देवी से जुड़ा पहलू भी सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण रहा। रिकॉर्ड से सामने आया कि घटना की जानकारी मिलने के बाद वह घटनास्थल पर पहुंची थीं और पुलिस ने उनका बयान लिया था।

इसके बावजूद उनका औपचारिक बयान रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया और उन्हें अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में अदालत में पेश नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इस पहलू को भी अभियोजन के मामले के आकलन में महत्वपूर्ण माना।

अदालत के सामने सवाल यह भी था कि जब मृतक की पत्नी घटना के बाद मौके पर पहुंची थीं और पुलिस ने उनका बयान लिया था, तो उस बयान को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया और उन्हें गवाह के रूप में क्यों नहीं पेश किया गया।

FIR और इनक्वेस्ट रिपोर्ट के समय में मिली विसंगति

मामले में FIR के समय को लेकर भी हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच की। अदालत के सामने मौजूद रिकॉर्ड के अनुसार औपचारिक FIR रात करीब 11 बजे दर्ज की गई थी, जबकि इनक्वेस्ट रिपोर्ट शाम 5:45 बजे तैयार हो चुकी थी।

इनक्वेस्ट रिपोर्ट में पहले से FIR का केस नंबर दर्ज होने की बात भी रिकॉर्ड में सामने आई। अदालत ने इस स्थिति पर गौर किया क्योंकि सामान्य तौर पर FIR दर्ज होने के बाद ही उसका केस नंबर उपलब्ध होना स्वाभाविक है।

इसी विसंगति को देखते हुए हाईकोर्ट ने FIR के बाद में दर्ज किए जाने को लेकर गंभीर संदेह व्यक्त किया और इसे अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर असर डालने वाली परिस्थिति माना।

पुलिस को घटना की सूचना कैसे मिली, इस पर भी गौर

रिकॉर्ड के मुताबिक घटना का समय शाम करीब चार बजे बताया गया था। पुलिस घटनास्थल पर ऐसी सूचना के आधार पर पहुंची थी, जिसे विवेचक ने अफवाह बताया था।

इसके बाद औपचारिक FIR रात में दर्ज की गई। अदालत ने घटना की सूचना मिलने से लेकर FIR दर्ज होने तक की परिस्थितियों को भी पूरे मामले के साथ जोड़कर देखा।

FIR को 28 मार्च 2007 को मजिस्ट्रेट के पास भेजे जाने की बात भी रिकॉर्ड में थी। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के तहत मजिस्ट्रेट को FIR भेजने में हुई देरी पर भी विचार किया।

सिर्फ देरी नहीं, पूरी परिस्थितियों को देखा

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि FIR को मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में हुई देरी अपने आप में हर मामले में अभियोजन के खिलाफ निर्णायक नहीं होती। लेकिन जब FIR के पंजीकरण के समय, इनक्वेस्ट रिपोर्ट और अन्य परिस्थितियों में भी विसंगतियां दिखाई दें, तो ऐसी देरी का महत्व बढ़ जाता है।

अदालत ने इस मामले में किसी एक परिस्थिति को अलग करके फैसला नहीं किया। बल्कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों में सामने आई कमियों, मृतक की पत्नी के बयान को रिकॉर्ड पर नहीं लाए जाने, FIR के समय को लेकर उठे सवाल, इनक्वेस्ट रिपोर्ट में पहले से केस नंबर दर्ज होने और मजिस्ट्रेट को FIR भेजने में हुई देरी को एक साथ देखा।

संदेह का लाभ मिला, दोषसिद्धि और सजा रद्द

पूरे रिकॉर्ड और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने अभियोजन के मामले में गंभीर संदेह पाया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों के आधार पर निचली अदालत की दोषसिद्धि को कायम रखना उचित नहीं है।

इसके बाद खंडपीठ ने प्रदीप महतो की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया तथा उसे बरी करने का आदेश दिया।

फैसले में सामने आए प्रमुख बिंदुओं में प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों की कमजोरी, महत्वपूर्ण गवाह को अभियोजन की ओर से पेश नहीं किया जाना, FIR के समय से जुड़ी विसंगति और इनक्वेस्ट रिपोर्ट में पहले से केस नंबर दर्ज होने की स्थिति शामिल रही। इन्हीं परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन के बाद हाईकोर्ट ने प्रदीप महतो को राहत दी।

कानूनी मामलों में रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण

यह फैसला यह भी दिखाता है कि आपराधिक मामलों में अदालत अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों को केवल उनकी संख्या के आधार पर स्वीकार नहीं करती, बल्कि गवाहों के बयान, दस्तावेजों और घटनाक्रम के बीच आपसी सामंजस्य को भी देखती है।

सुखो सदा हत्याकांड में हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड की विभिन्न परिस्थितियों को एक साथ परखने के बाद निचली अदालत के फैसले को निरस्त किया और प्रदीप महतो को बरी कर दिया।

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