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स्मार्टफोन जानबूझकर किए जाते हैं स्लो? EU के नए नियम बदल सकते हैं खेल
- Repoter 11
- 23 Apr, 2026
क्या स्मार्टफोन जानबूझकर धीरे किए जाते हैं? प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस पर EU के नए नियम फोन की लाइफ और रिपेयर को आसान बना सकते हैं।
क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपका स्मार्टफोन कुछ समय बाद अचानक धीमा होने लगता है, उसकी बैटरी पहले की तुलना में जल्दी खत्म होने लगती है और बार-बार चार्ज करना पड़ता है? यह अनुभव आज लगभग हर स्मार्टफोन यूजर के साथ जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक इसे तकनीकी सीमाओं या सामान्य घिसावट का परिणाम माना जाता रहा, लेकिन अब इस पर नई बहस छिड़ गई है। विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का मानना है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
इस रणनीति को तकनीकी भाषा में “प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस” कहा जाता है। इसका मतलब है किसी उत्पाद को इस तरह डिजाइन करना कि वह समय के साथ कम उपयोगी होता जाए, ताकि उपभोक्ता नया उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित हो। स्मार्टफोन इंडस्ट्री में यह ट्रेंड खास तौर पर चर्चा में है, क्योंकि यहां हर साल नए मॉडल लॉन्च होते हैं और पुराने डिवाइस धीरे-धीरे पीछे छूट जाते हैं।
प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस का असर सीधे यूजर के अनुभव पर पड़ता है। फोन अचानक बंद नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उसकी परफॉर्मेंस गिरती जाती है। ऐप्स धीमे चलने लगते हैं, बैटरी तेजी से खत्म होती है और सॉफ्टवेयर अपडेट सीमित हो जाते हैं। ऐसे में फोन पूरी तरह खराब नहीं होता, लेकिन उसका इस्तेमाल असुविधाजनक हो जाता है, जिससे यूजर नया फोन खरीदने के बारे में सोचने लगता है।
इसी मुद्दे पर अब यूरोपियन यूनियन ने सख्त रुख अपनाने की तैयारी कर ली है। यूरोप के नीति-निर्माताओं का मानना है कि कंपनियों को उपभोक्ताओं को लंबे समय तक चलने वाले और आसानी से रिपेयर होने वाले डिवाइस उपलब्ध कराने चाहिए। इसके लिए नए नियमों का मसौदा तैयार किया गया है, जो स्मार्टफोन इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव ला सकता है।
स्मार्टफोन की सबसे बड़ी समस्या उसकी बैटरी से जुड़ी होती है। बैटरी एक ऐसा घटक है, जिसकी क्षमता समय के साथ घटती ही है। हालांकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन कई मामलों में इसे लेकर विवाद भी सामने आए हैं। उदाहरण के तौर पर Apple ने कुछ साल पहले यह स्वीकार किया था कि पुराने iPhone मॉडलों की परफॉर्मेंस को सीमित किया गया था, ताकि बैटरी कमजोर होने पर डिवाइस अचानक बंद न हो। कंपनी ने इसे सुरक्षा का उपाय बताया, लेकिन इस घटना ने उपभोक्ताओं के बीच भरोसे को लेकर सवाल खड़े कर दिए।
इसके बाद बैटरी हेल्थ जैसे फीचर्स जरूर आए, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। आज भी कई यूजर्स यह शिकायत करते हैं कि कुछ साल बाद उनका फोन पहले जैसा प्रदर्शन नहीं करता। यही कारण है कि लोग औसतन दो से तीन साल के भीतर नया स्मार्टफोन खरीद लेते हैं।
एक बड़ा बदलाव स्मार्टफोन डिजाइन में भी आया है। पहले के मुकाबले आज के फोन में बैटरी बदलना आसान नहीं रहा। पहले जहां रिमूवेबल बैटरी का विकल्प होता था, वहीं अब अधिकतर डिवाइस सील्ड डिजाइन में आते हैं। कंपनियां इसके पीछे पतला डिजाइन, वॉटरप्रूफिंग और मजबूत बिल्ड का तर्क देती हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसे फोन की मरम्मत करना मुश्किल और महंगा हो जाता है।
उदाहरण के तौर पर Google के कुछ Pixel डिवाइस में बैटरी से जुड़ी शिकायतें सामने आई थीं, जहां यूजर्स को रिपेयर के बजाय पूरा यूनिट बदलने की सलाह दी गई। इस तरह की स्थिति में उपभोक्ता के पास विकल्प सीमित रह जाते हैं।
यूरोपियन यूनियन अब इस पूरे सिस्टम को बदलने की दिशा में काम कर रहा है। प्रस्तावित नियमों के तहत कंपनियों को ऐसे डिवाइस बनाने होंगे, जिनकी बैटरी ज्यादा टिकाऊ हो और जिन्हें आसानी से बदला जा सके। इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता लंबे समय तक सुनिश्चित करनी होगी और सॉफ्टवेयर अपडेट भी ज्यादा समय तक देना होगा।
इन नियमों का एक अहम हिस्सा “राइट टू रिपेयर” से जुड़ा है। इसका मतलब है कि उपभोक्ताओं और थर्ड-पार्टी तकनीशियनों को भी डिवाइस की मरम्मत करने का अधिकार और संसाधन मिलें। इससे कंपनियों पर निर्भरता कम होगी और यूजर्स को ज्यादा विकल्प मिलेंगे।
हालांकि यह नियम फिलहाल यूरोप तक सीमित हैं, लेकिन इनका असर वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है। आमतौर पर बड़ी टेक कंपनियां अलग-अलग बाजारों के लिए पूरी तरह अलग डिजाइन नहीं बनातीं, इसलिए जो बदलाव यूरोप में लागू होंगे, वे दूसरे देशों में भी धीरे-धीरे दिख सकते हैं।
भारत में भी इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार “राइट टू रिपेयर” और रिपेयरबिलिटी इंडेक्स जैसे उपायों पर काम कर रही है। अगर ये पहल सफल होती हैं, तो आने वाले समय में भारतीय उपभोक्ताओं को भी ज्यादा पारदर्शिता और विकल्प मिल सकते हैं।
यह बहस सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों से भी जुड़ी हुई है। सवाल यह है कि किसी उत्पाद की उम्र तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए—कंपनियों के पास या उपभोक्ताओं के पास? अब तक यह नियंत्रण कंपनियों के हाथ में रहा है, लेकिन नए नियम इस संतुलन को बदल सकते हैं।
कुल मिलाकर, स्मार्टफोन की दुनिया एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अगर यूरोपियन यूनियन के ये नियम प्रभावी तरीके से लागू होते हैं, तो आने वाले समय में यूजर्स को लंबे समय तक चलने वाले, आसानी से रिपेयर होने वाले और बेहतर प्रदर्शन वाले डिवाइस मिल सकते हैं। इससे न सिर्फ उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे को कम करने में भी मदद मिलेगी।
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