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Health News: Mobile Addiction: फोन की लत से बढ़ रही सेहत की परेशानी, शकीला के अनुभव के बाद बच्चों के स्क्रीन टाइम पर भी सख्ती

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Alam Ki Khabar | Health News | Mobile Addiction | लंबे समय तक मोबाइल इस्तेमाल से आंखों में तनाव, गर्दन और शरीर में दर्द जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं। जानिए 20-20-20 नियम और बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर जरूरी सावधानियां।

डेस्क, नई दिल्ली, 14 अगस्त। मोबाइल फोन आज जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, काम, मनोरंजन, बैंकिंग से लेकर रिश्तेदारों और दोस्तों से बातचीत तक, हर काम के लिए स्मार्टफोन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। समस्या तब शुरू होती है जब जरूरत का यह उपकरण लगातार इस्तेमाल की आदत में बदल जाता है।

दक्षिण भारतीय अभिनेत्री शकीला के हालिया स्वास्थ्य अनुभव ने इसी मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक शकीला ने बताया कि लंबे समय तक फोन इस्तेमाल करने के बाद उन्हें गर्दन से जुड़ी गंभीर परेशानी हुई और उनकी सर्जरी करनी पड़ी। उन्होंने लोगों को मोबाइल के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह भी दी।

इस घटना को किसी व्यक्ति में फोन के इस्तेमाल और बीमारी के बीच सीधा चिकित्सकीय कारण मानना सही नहीं होगा, लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन देखने और गलत मुद्रा में फोन इस्तेमाल करने से आंखों, गर्दन, कंधे और पीठ पर दबाव बढ़ सकता है।

फोन देखते समय गर्दन क्यों झुकती है?

मोबाइल इस्तेमाल करते समय ज्यादातर लोग स्क्रीन को देखने के लिए सिर नीचे की ओर झुका लेते हैं। अगर यही मुद्रा लंबे समय तक बनी रहे तो गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर लगातार तनाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञ स्वास्थ्य संस्थानों की सलाह के मुताबिक स्क्रीन देखते समय गलत मुद्रा गर्दन, कंधे और पीठ में दर्द या जकड़न जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है।

इसलिए समस्या केवल यह नहीं है कि व्यक्ति दिन में कितने घंटे मोबाइल चलाता है। यह भी मायने रखता है कि फोन किस दूरी पर, किस ऊंचाई पर और किस मुद्रा में इस्तेमाल किया जा रहा है।

आंखों पर भी पड़ता है असर

लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन यानी आंखों में थकान की समस्या हो सकती है। इसके लक्षणों में आंखों में सूखापन, जलन, धुंधला दिखाई देना, सिरदर्द और आंखों के आसपास थकान शामिल हो सकती है।

स्क्रीन देखते समय हमारी पलकें सामान्य से कम झपकती हैं। इससे आंखों की नमी कम हो सकती है और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने पर असहजता बढ़ सकती है।

इसीलिए मोबाइल या कंप्यूटर पर लगातार काम करने वालों के लिए बीच-बीच में स्क्रीन से नजर हटाना महत्वपूर्ण माना जाता है।

क्या है 20-20-20 नियम?

स्क्रीन से होने वाले आंखों के तनाव को कम करने के लिए सबसे आसान आदतों में से एक है 20-20-20 नियम।

इसका मतलब है:

हर 20 मिनट स्क्रीन देखने के बाद कम से कम 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर किसी चीज को देखें।

इससे आंखों को लगातार नजदीक की स्क्रीन पर फोकस करने से छोटा ब्रेक मिलता है। अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन समेत कई स्वास्थ्य संस्थाएं स्क्रीन इस्तेमाल के दौरान इस तरह के नियमित ब्रेक की सलाह देती हैं।

हालांकि यह नियम गर्दन की बीमारी का इलाज नहीं है। गर्दन के दर्द या अन्य लगातार बने रहने वाले लक्षणों के लिए चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।

बच्चों के स्क्रीन टाइम पर प्रशासन का बड़ा फैसला

बढ़ते स्क्रीन टाइम की चिंता केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। बच्चों के बीच डिजिटल डिवाइस और स्मार्ट बोर्ड के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

गौतमबुद्धनगर जिला प्रशासन ने 13 अगस्त 2026 को स्कूलों में बच्चों के स्क्रीन एक्सपोजर को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनके तहत प्राथमिक कक्षाओं में स्क्रीन टाइम को अधिकतम 30 मिनट और उच्च प्राथमिक कक्षाओं में अधिकतम 60 मिनट तक सीमित करने को कहा गया है। स्कूलों में स्क्रीन इस्तेमाल की निगरानी के लिए नोडल अधिकारी की व्यवस्था और PTM में स्क्रीन टाइम पर चर्चा का प्रावधान भी किया गया है।

स्कूलों को डिजिटल साधनों के इस्तेमाल और पारंपरिक ब्लैकबोर्ड आधारित पढ़ाई के बीच संतुलन बनाने की दिशा में भी काम करने को कहा गया है।

बच्चों में क्यों जरूरी है सावधानी?

बच्चों में स्क्रीन का अत्यधिक और लगातार इस्तेमाल आंखों के तनाव के साथ गलत बैठने की मुद्रा को बढ़ा सकता है। लंबे समय तक सिर झुकाकर बैठने से गर्दन और पीठ की मांसपेशियों पर दबाव पड़ सकता है।

बच्चों के लिए स्क्रीन से पूरी तरह दूरी बनाना आज के दौर में व्यावहारिक नहीं है। पढ़ाई में डिजिटल सामग्री की भूमिका बढ़ रही है। इसलिए ज्यादा जरूरी यह है कि बच्चों को स्क्रीन इस्तेमाल करने का सही तरीका और नियमित ब्रेक लेने की आदत सिखाई जाए।

मोबाइल इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखें ध्यान

मोबाइल चलाते समय कोशिश करें कि फोन को बहुत नीचे रखकर गर्दन लगातार न झुकानी पड़े। स्क्रीन को आंखों के अपेक्षाकृत करीब आरामदायक ऊंचाई पर रखें और लगातार एक ही मुद्रा में न बैठें।

लंबे समय तक स्क्रीन देखने के बीच छोटे-छोटे ब्रेक लें। आंखों में लगातार जलन, धुंधलापन या दर्द हो तो इसे नजरअंदाज न करें।

इसी तरह गर्दन या कंधे का दर्द लगातार बना रहे, हाथों में झनझनाहट हो या कमजोरी महसूस हो तो डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।

सोने से पहले फोन की आदत भी बदलें

रात में बिस्तर पर जाने के बाद लंबे समय तक फोन चलाना भी एक खराब आदत बन सकता है। स्क्रीन का इस्तेमाल सोने में देरी से जुड़ा हो सकता है और लगातार फोन देखने की आदत नींद की दिनचर्या को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए सोने से पहले फोन को एक तरफ रखकर शांत वातावरण में आराम करना बेहतर स्क्रीन-हाइजीन का हिस्सा हो सकता है। अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन भी सोने से पहले स्क्रीन इस्तेमाल सीमित करने की सलाह देता है।

फोन छोड़ना नहीं, इस्तेमाल का तरीका बदलना जरूरी

आज के समय में स्मार्टफोन को पूरी तरह छोड़ देना संभव नहीं है। सवाल यह है कि फोन हमारी जरूरत का साधन रहे या हमारी दिनचर्या को नियंत्रित करने लगे।

काम और पढ़ाई के दौरान जरूरी स्क्रीन इस्तेमाल के साथ नियमित ब्रेक, सही मुद्रा, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और स्क्रीन से दूर बिताया गया समय जरूरी है।

शकीला का अनुभव इस बहस को सामने लाता है, लेकिन इसे किसी एक व्यक्ति की बीमारी का सार्वभौमिक प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी समस्याएं व्यक्ति, इस्तेमाल की अवधि, मुद्रा और अन्य स्वास्थ्य कारकों पर निर्भर करती हैं।

इसलिए मोबाइल को दुश्मन मानने के बजाय उसके इस्तेमाल की आदत को संतुलित करना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है।

स्क्रीन हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन जिंदगी की जगह नहीं

स्मार्टफोन ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसकी सुविधा के साथ एक नई चुनौती भी आई है—हमारी स्क्रीन पर निर्भरता। पहले मोबाइल जरूरत के समय हाथ में आता था, अब कई लोगों के लिए यह दिनभर हाथ में रहता है।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि स्क्रीन टाइम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा। पढ़ाई, नौकरी, खरीदारी, बातचीत और यहां तक कि बैंकिंग भी मोबाइल से होने लगी है। इसलिए समाधान मोबाइल को पूरी तरह छोड़ना नहीं, बल्कि इस्तेमाल का स्वस्थ संतुलन बनाना है।

बच्चों के लिए यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। स्कूलों में डिजिटल पढ़ाई जरूरी हो सकती है, लेकिन उसके साथ आंखों को आराम, शारीरिक गतिविधि और ऑफलाइन सीखने का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

हर 20 मिनट में आंखों को छोटा ब्रेक देना, स्क्रीन देखते समय गर्दन न झुकाना और लगातार दर्द या परेशानी को नजरअंदाज न करना छोटी आदतें हैं, लेकिन लंबे समय में इनका फायदा हो सकता है।

मोबाइल हमारे हाथ में रहे, हमारी सेहत पर हावी न हो—यही डिजिटल दौर में सबसे जरूरी संतुलन है।

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