नई दिल्ली। लोकसभा में मंगलवार को बिहार की राजनीति को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जमकर तकरार देखने को मिली। इसी दौरान बीजेपी सांसद डॉ. संजय जायसवाल ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन तेजी से सिकुड़ रही है।
हालांकि उनके तंज भरे टिप्पणी ने सियासी हलकों में यह बहस भी छेड़ दी है कि क्या इस तरह के बयान राजनीतिक मर्यादा के अनुरूप हैं।
“अगली बार राहुल गांधी बिहार आएंगे तो कांग्रेस के विधायक एक ही बोलेरो में आ जाएंगे” – जायसवाल
सत्र के दौरान जायसवाल ने तंज करते हुए कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है और इसी वजह से अगली बार राहुल गांधी को ज्यादा गाड़ियों की आवश्यकता भी नहीं होगी।उनके मुताबिक—
“बिहार में कांग्रेस की हालत ऐसी हो गई है कि सभी विधायक एक बोलेरो में आ जाएंगे।यह बयान उस चुनावी नतीजे की ओर संकेत करता है, जिसमें कांग्रेस ने 61 सीटों पर लड़े जाने के बावजूद सिर्फ 6 सीटें जीती थीं।
राजनीतिक मर्यादा पर सवाल — विरोधी पक्ष ने जताई आपत्ति
जायसवाल का बयान आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि ऐसी टिप्पणी गठबंधन धर्म और संसदीय भाषा की गरिमा से मेल खाती है या नहीं।
विपक्षी दलों ने कहा कि मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विपक्ष के नेताओं पर व्यक्तिगत या व्यंग्यात्मक हमला स्वस्थ राजनीति नहीं कहलाता।
एसआईआर मुद्दे पर विपक्ष पर पलटवार
संजय जायसवाल ने सत्र के दौरान विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे एसआईआर से जुड़े सवालों पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा—
“जिन मुद्दों पर बिहार में विपक्ष को करारी हार मिली, उस पर आत्मसमीक्षा की जगह वे एसआईआर का शोर मचा रहे हैं।”
नेहरू-सावरकर और ऐतिहासिक संदर्भ का जिक्र
जायसवाल ने 1947 की राजनीति का हवाला देते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद “पहला राजनीतिक अन्याय” हुआ था, जब सरदार पटेल की जगह जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया।उन्होंने यह भी दावा किया कि 2026 के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में राजनीतिक संतुलन बदलेगा और एनडीए को मजबूती मिलेगी।
विश्लेषण — बिहार की राजनीति में भाषा और व्यवहार का प्रश्न
विशेषज्ञों का मानना है कि जायसवाल का बयान सिर्फ चुनावी आंकड़ों पर आधारित तंज नहीं है, बल्कि यह बिहार में बदलते राजनीतिक समीकरणों की झलक भी देता है।हालांकि कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि सत्ता पक्ष के नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे विपक्ष को लेकर जिम्मेदार बयान दें, ताकि लोकतांत्रिक परंपरा और राजनीतिक संवाद का स्तर बना रहे।