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वेतन की पीड़ा, जुर्म बनता संवाद: शिक्षकों के निजी संदेशों पर विभागीय शिकंजा

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पटना। “वेतन के लिए किरानी से नहीं, निगरानी से मिलिए”—यह जुमला अब शिक्षकों के बीच व्यंग्य नहीं, बल्कि डर की वजह बनता जा रहा है। प्रधान शिक्षक पद पर योगदान देने के बाद भी महीनों तक वेतन नहीं मिलने से परेशान शिक्षकों ने जब अपनी बात आपस में निजी सोशल मीडिया ग्रुपों में साझा की, तो वही संदेश उनके लिए मुश्किल का कारण बन गया।

सूत्रों के अनुसार, शिक्षा विभाग ने शिक्षकों द्वारा बनाए गए निजी व्हाट्सएप ग्रुपों पर नजर तेज कर दी है। विभागीय व्यवस्था, वेतन भुगतान में देरी या प्रशासनिक उदासीनता पर असंतोष जताने को अनुशासनहीनता माना जा रहा है। बीते एक महीने में केवल पटना जिले में ऐसे पांच शिक्षक हैं, जिन्हें निजी ग्रुप में वेतन विलंब पर चर्चा करने के कारण शो-कॉज नोटिस थमा दिया गया।

इन मामलों में खास बात यह है कि कार्रवाई उन शिक्षकों पर हुई, जिन्होंने संदेश लिखा था। आपसी बातचीत के स्क्रीनशॉट अधिकारियों तक पहुंचते ही विभागीय पत्राचार शुरू हो गया। 10 दिसंबर को बिक्रम प्रखंड के एक प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक को इसी आधार पर नोटिस दिया गया। शिक्षक ने योगदान के बाद वेतन न मिलने की बात ग्रुप में रखी थी, उसी संदेश को प्रमाण बनाकर उनसे जवाब मांगा गया।

इससे पहले 12 नवंबर को खुसरूपुर प्रखंड के चौरा मध्य विद्यालय के एक शिक्षक को भी वेतन भुगतान की मांग उठाने पर नोटिस जारी किया गया था। दोनों ही मामलों में डीपीओ स्थापना की ओर से कार्रवाई की गई। विभाग का पक्ष है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की चर्चाएं विभाग की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।

इन कार्रवाइयों के बाद शिक्षकों के बीच असमंजस और भय का माहौल है। महीनों से वेतन नहीं मिलने की समस्या जस की तस है, लेकिन उस पर सवाल उठाना जोखिम भरा होता जा रहा है। शिक्षक यह सोचने को मजबूर हैं कि यदि अपनी पीड़ा भी आपस में साझा करना अपराध बन जाए, तो समाधान की राह आखिर कहां से निकलेगी।

पूरा मामला शिक्षा व्यवस्था में संवाद के संकट और प्रशासनिक सख्ती की तस्वीर पेश करता है—जहां सवाल उठाना जुर्म और चुप रहना मजबूरी बनता जा रहा है।

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