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नीतीश के बाद कौन? दिल्ली की बैठक से पटना तक, निशांत कुमार के नाम पर सियासी हलचल

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पटना/दिल्ली। बिहार की राजनीति इन दिनों शोर में नहीं, बल्कि संकेतों और खामोशी में अपनी दिशा तलाशती दिख रही है। हाल ही में दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास पर हुई एक सीमित लेकिन बेहद अहम मुलाकात ने सियासी गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। इस बैठक में जेडीयू के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह और पार्टी के कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा की मौजूदगी ने सवालों को और गहरा कर दिया—मुद्दा चुनाव नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के बाद बिहार की कमान था।

सूत्रों की मानें तो बातचीत का केंद्र बिंदु यही रहा कि अगर स्वास्थ्य कारणों से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से पीछे हटते हैं, तो आगे का रास्ता क्या होगा। उत्तराधिकार को लेकर कई नामों पर चर्चा हुई, लेकिन सबसे ज्यादा फोकस निशांत कुमार पर रहा। क्या उन्हें राजनीतिक जिम्मेदारी दी जा सकती है? क्या सरकार में भूमिका या उपमुख्यमंत्री पद की संभावना बन सकती है? भले ही इस बैठक को लेकर दोनों दलों ने आधिकारिक तौर पर कुछ न कहा हो, लेकिन राजनीति में चुप्पी अक्सर सबसे मजबूत संकेत मानी जाती है।

दिल्ली की इस चर्चा के कुछ ही दिनों बाद पटना एयरपोर्ट पर संजय झा और निशांत कुमार का साथ नजर आना भी महज संयोग नहीं माना जा रहा। संजय झा का यह कहना कि “पार्टी के लोग, शुभचिंतक और समर्थक निशांत को राजनीति में देखना चाहते हैं”, अपने आप में बड़ा बयान माना जा रहा है। सियासी हलकों में चर्चा है कि 14 जनवरी के बाद, यानी खरमास समाप्त होते ही, निशांत की जेडीयू में औपचारिक एंट्री हो सकती है।

हालांकि जेडीयू के भीतर इस मुद्दे पर दो धाराएं साफ दिखाई देती हैं। एक वर्ग चाहता है कि निशांत सीधे सरकार में भूमिका निभाएं, जबकि दूसरा मानता है कि पहले संगठन में जिम्मेदारी देकर उन्हें जमीन से जोड़ा जाए। खुद निशांत कुमार अब तक किसी भी सवाल पर खुलकर नहीं बोले हैं—पत्रकारों के सामने उनकी खामोश मुस्कान ही फिलहाल उनका सबसे बड़ा सियासी बयान बन गई है।

बीजेपी की चिंता भी इससे जुड़ी है। नीतीश कुमार के बाद अति पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक कहीं बिखर न जाए, इसलिए एनडीए चाहता है कि नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नीतीश के रहते ही साफ हो जाए। जेडीयू के कोर समर्थकों में भी यह भावना पनप रही है कि नीतीश की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए निशांत एक स्वाभाविक विकल्प हो सकते हैं। शायद यही वजह है कि पटना में उनके समर्थन में पोस्टर और बैनर दिखने लगे हैं।

इस पूरी पटकथा में मनीष वर्मा जैसे चेहरे भी अहम माने जा रहे हैं, जिन्होंने आईएएस छोड़कर जेडीयू की राजनीति चुनी। चर्चाएं हैं कि उन्होंने निशांत को बिहार की सियासत की बारीकियां समझाने में अहम भूमिका निभाई है। फिलहाल निशांत विवादों से दूर, शांत और सादा छवि के साथ सामने हैं—और संभव है कि यही सादगी उन्हें राजनीति में स्वीकार्य चेहरा बना दे।

बिहार की राजनीति अब सवालों के मोड़ पर खड़ी है। जवाब शायद जल्द मिलें, लेकिन फिलहाल खामोशी ही सबसे बड़ा संकेत बनी हुई है।

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