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मनरेगा से ‘विकसित भारत रोजगार मिशन’ तक: 11 साल में योजनाओं के नाम बदलने पर सियासत गरम

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नई दिल्ली।संसद के शीतकालीन सत्र में जैसे ही केंद्र सरकार ने मनरेगा से जुड़े नए विधेयक को लोकसभा में पेश किया, सियासी हलकों में बहस तेज हो गई। ग्रामीण रोजगार की गारंटी देने वाली देश की सबसे बड़ी योजना के नाम और ढांचे में प्रस्तावित बदलाव ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का नया मौका दे दिया है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि बीते 11 वर्षों में मोदी सरकार ने यूपीए दौर की 25 से अधिक प्रमुख योजनाओं और परियोजनाओं के नाम बदल दिए, या उन्हें नए ब्रांड के साथ पेश किया। विपक्ष इसे सीधे तौर पर सरकार की “नाम बदलो नीति” करार दे रहा है।

सरकार बनाम विपक्ष—नाम या नीति?

विपक्ष का कहना है कि योजनाओं के नाम बदलना सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत को खत्म करने की कोशिश है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जिन योजनाओं की नींव यूपीए सरकार ने रखी थी, उन्हें नए नाम देकर जनता के सामने अलग तरीके से पेश किया जा रहा है।

वहीं केंद्र सरकार इस आरोप को खारिज करती है। सरकार का कहना है कि नाम के साथ-साथ योजनाओं का स्वरूप, लक्ष्य और कार्यप्रणाली भी बदली गई है, इसलिए नया नाम देना स्वाभाविक और जरूरी है। सरकार इसे ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से जोड़कर देख रही है।

मनरेगा का नया रूप

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की शुरुआत 2005 में हुई थी, जिसके तहत ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी मिलती है।अब सरकार ने इसे ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन’ (VBG-RAM-G) के रूप में पेश किया है। दावा किया जा रहा है कि इसके तहत 125 दिनों तक काम मिलेगा और फोकस सिर्फ मजदूरी नहीं, बल्कि ग्रामीण बुनियादी ढांचा, जल संरक्षण और आजीविका विकास पर भी होगा।

28 योजनाएं, बदले नाम—क्या बदली पहचान?

विपक्ष का आरोप है कि पिछले एक दशक से अधिक समय में करीब 28 बड़ी योजनाओं के नाम बदले गए। इनमें आवास, बिजली, स्वच्छता, कृषि, कौशल विकास, बीमा और रोजगार से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं।

कुछ प्रमुख उदाहरण—

इंदिरा आवास योजना → प्रधानमंत्री आवास योजना

निर्मल भारत अभियान → स्वच्छ भारत मिशन

राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना → दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

जेएनएनयूआरएम → अमृत मिशन

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत मुफ्त अनाज → प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना


सरकार का दावा है कि इन बदलावों के साथ योजनाओं की पहुंच, बजट और निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।

सिर्फ योजनाएं ही नहीं, नामों की राजनीति

योजनाओं के अलावा, केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्यों ने सड़कों, इमारतों, संस्थानों और कानूनों के नाम भी बदले हैं।
राजपथ का नाम कर्तव्य पथ, रेसकोर्स रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग, और औपनिवेशिक कानूनों की जगह भारतीय न्याय संहिता जैसे नाम इसी कड़ी के उदाहरण हैं।

बड़ा सवाल

असल सवाल यही है कि क्या नाम बदलने से नीतियों का असर भी बदलता है, या यह सिर्फ राजनीतिक पहचान गढ़ने का तरीका है?
विपक्ष इसे इतिहास मिटाने की कोशिश बता रहा है, जबकि सरकार इसे नए भारत की सोच और प्रशासनिक सुधार का हिस्सा मानती है।

मनरेगा के नए अवतार के साथ यह बहस और तेज होने के आसार हैं, क्योंकि मामला अब सिर्फ योजनाओं का नहीं, बल्कि विचारधारा और विरासत का बन चुका है

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