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वर्दी, विवाह और विवाद: बहाली के बाद बदला रिश्ता, सिपाही पर पति ने लगाए गंभीर आरोप

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आरा।बिहार पुलिस की वर्दी एक बार फिर कानून से ज़्यादा निजी विवादों की वजह से सुर्खियों में है। मामला एक महिला सिपाही और उसके कथित पति के रिश्ते से जुड़ा है, जहां प्यार, भरोसा और शादी अब आरोप–प्रत्यारोप में बदल चुके हैं। शिकायतकर्ता युवक का कहना है कि उसकी फरियाद पुलिस और प्रशासन के दफ्तरों में भटक रही है, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हो रही।

आरा जिले के रहने वाले देव भारती ने दावा किया है कि वर्ष 2022 में उसने एक महिला से शादी की थी, जो उस समय बिहार पुलिस की सिपाही थी और पहले से विधवा थी। देव के मुताबिक, महिला उस वक्त नौकरी से बर्खास्त थी और आर्थिक व मानसिक संकट से गुजर रही थी। ऐसे में उसने सहारा बनने के इरादे से विवाह किया और दोनों ने साथ रहना शुरू किया।

नौकरी बहाली के बाद बदला व्यवहार

देव का आरोप है कि शुरुआत में दांपत्य जीवन सामान्य रहा, लेकिन 2023 में जैसे ही महिला सिपाही की नौकरी दोबारा बहाल हुई, उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया। देव का कहना है कि वह दिन में मजदूरी के लिए बाहर रहता था और इसी दौरान महिला की किसी अन्य व्यक्ति से लगातार फोन पर बातचीत होती थी।

आरोप यह भी है कि एक दिन वह युवक सीधे उनके कमरे तक पहुंच गया, जिसके बाद विवाद इतना बढ़ा कि हाथापाई की नौबत आ गई। देव का दावा है कि झगड़े के दौरान उसके सिर पर वार किया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज उसने खुद अपने खर्चे पर कराया और इसके बाद दोनों अलग रहने लगे।

पति मानने से इनकार, प्रशासन से गुहार

फिलहाल महिला सिपाही सीटीएस नाथनगर में प्रशिक्षण ले रही है। देव का आरोप है कि अब वह उसे अपना पति मानने से साफ इनकार कर रही है। न्याय की उम्मीद में देव ने सीटीएस प्रशासन से लेकर एसएसपी कार्यालय तक गुहार लगाई, लेकिन हर जगह से उसे अदालत जाने की सलाह दी गई।

देव ने निकाह की तस्वीरें और एक वीडियो जारी कर अपनी पीड़ा सार्वजनिक की है। वहीं दूसरी ओर महिला सिपाही ने फोन पर भी अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया है।

सवाल सिस्टम पर

यह मामला अब सिर्फ एक निजी विवाद नहीं रह गया है, बल्कि सवाल खड़ा कर रहा है कि जब वर्दीधारी पर आरोप हों और फरियादी दर-दर भटके, तो इंसाफ का दरवाज़ा आखिर खुलेगा कहां? क्या ऐसे मामलों में प्रशासनिक चुप्पी भरोसे को और कमजोर नहीं करती?

फिलहाल मामला आरोपों के स्तर पर है और सच्चाई की जांच अदालत या सक्षम प्राधिकार के स्तर पर ही सामने आ सकेगी, लेकिन यह प्रकरण एक बार फिर सिस्टम की संवेदनशीलता पर सवाल जरूर खड़े करता है।

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