मोहम्मद आलम प्रधान संपादक
Alam ki khabar
समस्तीपुर | विशेष रिपोर्ट:कभी उत्तर भारत की औद्योगिक पहचान मानी जाने वाली कामेश्वर जूट मिल आज बदहाली, ताले और सन्नाटे की प्रतीक बनकर रह गई है। वर्ष 1922 ईस्वी में दरभंगा महाराज धीरिराज द्वारा स्थापित यह मिल न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे उत्तर भारत की एकमात्र जूट मिल के रूप में जानी जाती थी। औद्योगिक विकास के क्षेत्र में यह मिल बिहार के लिए गर्व का विषय रही है, लेकिन आज इसके भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है।
गौरवशाली इतिहास से बदहाली तक
कामेश्वर जूट मिल को वर्ष 1935 में ‘रामेश्वर जूट मिल लिमिटेड’ का दर्जा मिला और इसके बाद 1956 से उत्पादन कार्य विधिवत रूप से शुरू हुआ। समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर प्रखंड अंतर्गत मुक्तापुर में स्थित यह मिल जिला मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और करीब 84 एकड़ में फैली हुई है।
एक समय था जब इस मिल का वार्षिक कारोबार लगभग 125 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। देश के विभिन्न हिस्सों में यहां बने जूट उत्पादों की मांग थी। हजारों परिवारों की रोजी-रोटी इस मिल से जुड़ी हुई थी। यह मिल न केवल रोजगार का साधन थी, बल्कि पूरे इलाके की आर्थिक रीढ़ भी मानी जाती थी।
गिरावट के कारण
लेकिन समय के साथ हालात बदलते चले गए।लगातार आगजनी की घटनाएं,कच्चे माल (जूट) की भारी कमी,वित्तीय संकट,प्रबंधन की कमजोर नीतियां,और श्रमिक विवाद
ने इस ऐतिहासिक मिल को अंदर ही अंदर खोखला कर दिया। उत्पादन लगातार घटता गया, मजदूरों को समय पर वेतन मिलना बंद हो गया और मिल धीरे-धीरे घाटे में चली गई।
नवंबर से पूरी तरह बंद
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि 1 नवंबर से कामेश्वर जूट मिल पूरी तरह बंद हो गई। मिल के गेट पर ताले लटक गए और अंदर मशीनें जंग खा रही हैं। इसके साथ ही सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों मजदूर अचानक बेरोजगार हो गए।
मजदूरों पर टूटा कहर
मिल बंद होने से सबसे ज्यादा मार श्रमिक वर्ग पर पड़ी है। वर्षों से इस मिल पर निर्भर मजदूर और उनके परिवार आज—भुखमरी के कगार पर हैं,बच्चों की पढ़ाई छूट रही है,
इलाज के लिए पैसे नहीं हैं,और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।कई मजदूरों का कहना है कि महीनों का बकाया वेतन अब तक नहीं मिला है। कुछ परिवार तो पलायन को मजबूर हो चुके हैं, तो कुछ लोग कर्ज लेकर किसी तरह जीवन चला रहे हैं।
क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर असर
कामेश्वर जूट मिल सिर्फ एक उद्योग नहीं थी, बल्कि मुक्तापुर और आसपास के इलाकों की अर्थव्यवस्था की धड़कन थी। मिल बंद होने से—छोटे दुकानदार,
ठेला-खोमचा लगाने वाले,ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोग,और स्थानीय व्यापार
सब बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पूरा इलाका आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है।
सरकार और प्रबंधन पर सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या बिहार सरकार इस ऐतिहासिक उद्योग को बचाने के लिए ठोस पहल करेगी?क्या कोई पुनरुद्धार योजना (Revival Plan) बनेगी?
या फिर यह मिल भी बिहार के उन दर्जनों उद्योगों की सूची में शामिल हो जाएगी, जो सिर्फ इतिहास की किताबों में सिमट कर रह गए?
स्थानीय लोग और मजदूर संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि मिल को राज्य या केंद्र सरकार अपने अधीन लेकर पुनः चालू करे, ताकि हजारों परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
भविष्य पर सवाल
आज कामेश्वर जूट मिल के सामने दो ही रास्ते दिखाई दे रहे हैं—या तो यह मिल फिर से उत्पादन शुरू कर बिहार के औद्योगिक गौरव को बहाल करेगी,या फिर यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा और लापरवाही की भेंट चढ़कर इतिहास के पन्नों में दबकर रह जाएगी।
फिलहाल, मिल के बंद पड़े गेट और बेरोजगार मजदूरों की सूनी आंखें सरकार और समाज से एक ही सवाल पूछ रही हैं—क्या कामेश्वर जूट मिल को दोबारा जीवन मिलेगा?