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Yearender 2025: बिहार में न्यायिक फैसलों ने बदली तस्वीर, पुल सुरक्षा से लेकर जमीन रजिस्ट्री तक चर्चा में

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पटना: साल 2025 में बिहार में कानून और न्याय के क्षेत्र में कई अहम फैसले आए, जिन्होंने आम जनता और प्रशासन दोनों के कामकाज को प्रभावित किया। सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के फैसलों ने पुलों की सुरक्षा, जमीन की रजिस्ट्री और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर नई दिशा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने जमीन पंजीकरण को आसान बनाया: नवंबर 2025 में कोर्ट ने बिहार सरकार के उस संशोधन को रद्द किया, जिसमें जमीन की बिक्री के लिए म्यूटेशन अनिवार्य था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री कार्यालय केवल दस्तावेज दर्ज करे, मालिकाना हक तय करना अदालत का काम है। इस फैसले से आम लोगों को राहत मिली और जमीन खरीदने-बेचने की प्रक्रिया सरल हुई।
पुलों की सुरक्षा पर सख्ती: अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्माणाधीन और बने पुलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पटना हाईकोर्ट से ऑडिट कराने का निर्देश दिया। बिहार में कई पुलों के ढहने की घटनाओं के बाद यह कदम उठाया गया। निर्देश के बाद सरकारी निरीक्षण बढ़ा और बाद में पुल गिरने की घटनाएं घटीं।
चुनावी पारदर्शिता के लिए एसआईआर: जून 2025 में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) बिहार में लागू किया गया। इसके तहत 47 लाख नाम कटे, जिनमें डुप्लीकेट या मृतक मतदाता शामिल थे। यह कदम विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों से पहले निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया।
बीपीएससी परीक्षा विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला: मार्च 2025 में पटना हाईकोर्ट ने 70वीं प्रारंभिक परीक्षा से जुड़े मामले में जांच के बाद बीपीएससी को मुख्य परीक्षा आयोजित करने की अनुमति दी। इस फैसले से हजारों युवाओं के भविष्य को राहत मिली।
समाज के विभिन्न वर्गों के लिए अहम फैसले: अदालतों ने किशोर न्याय मामलों में पुनर्वास पर जोर दिया, मेडिकल शिक्षा में मेरिट आधारित दाखिला और पारदर्शिता सुनिश्चित की, और वरिष्ठ नागरिक कल्याण अधिनियम के क्रियान्वयन का निर्देश दिया।
राष्ट्रहित में न्याय सर्वोच्च: पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता ऋषिकेश नारायण सिन्हा के अनुसार, साल 2025 न्याय के इतिहास में महत्वपूर्ण रहा। फैसलों ने साबित किया कि कानून सभी के लिए समान है और न्यायालय हर स्तर पर जिम्मेदारीपूर्वक काम करता है।
"कोर्ट ने हर बार यह सिद्ध किया कि कानून किसी के ऊपर या नीचे नहीं, बल्कि सभी के लिए समान है।" – अशोक सिन्हा, अधिवक्ता, पटना हाईकोर्ट

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