मोहम्मद आलम
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जब एक युग विदा हुआ: 26 वर्षों तक दिलों पर राज करने वाले आचार्य विजयव्रत कंठ की भावुक विदाई
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रोसड़ा (समस्तीपुर)सुंदरी देवी सरस्वती विद्या मंदिर सैनिक स्कूल बटहा का वह दिन शायद ही कोई भूल पाए। विद्यालय का हर कोना, हर दीवार, हर कक्षा मानो मौन होकर एक ही बात कह रही थी—
आज सिर्फ एक शिक्षक नहीं जा रहे, आज एक युग विदा हो रहा है।
वरिष्ठ आचार्य विजयव्रत कंठ के सेवानिवृत्ति पर आयोजित अभिनंदन समारोह औपचारिक कार्यक्रम से कहीं आगे बढ़कर भावनाओं का सागर बन गया। ऐसा लगा मानो वर्षों से संजोए गए रिश्ते, स्नेह, अनुशासन और संस्कार एक-एक कर आंखों के रास्ते बहने लगे हों।मुख्य अतिथि उत्तर बिहार विद्या भारती बेगूसराय विभाग के निरीक्षक विनोद कुमार ने भर्राए स्वर में कहा“शिक्षक दीपक के समान होते हैं, जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन को प्रकाशित करते हैं। आचार्य विजयव्रत कंठ ने अपने पूरे जीवन से इस बात को चरितार्थ किया है।”प्रधानाचार्य रामचंद्र मंडल ने कहा किविद्या भारती के विद्यालयों की पहचान आचार्य कंठ जैसे कर्मठ, निष्ठावान और संस्कारवान शिक्षकों के कारण ही बनी है। उनका जाना हमारे लिए व्यक्तिगत क्षति है।”
प्रभारी प्रधानाचार्य घनश्याम मिश्र ने कहा कि आचार्य कंठ सिर्फ शिक्षक नहीं थे, बल्कि विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक, अभिभावक और प्रेरणास्रोत थे।विज्ञान विभागाध्यक्ष शत्रुघ्न कुमार सिंह ने 26 वर्षों की सेवा को याद करते हुए कहा—
“इतनी लंबी सेवा में उन्होंने कभी थकान नहीं दिखाई, हमेशा मुस्कुराकर जिम्मेदारी निभाई।”
आईटी फैकल्टी मनोज कुमार ने उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान को याद करते हुए कहा कि आचार्य कंठ से सिर्फ पढ़ना नहीं, जीना भी सीखा जा सकता है।
जब छात्र यशराज ने काव्यपाठ किया, तो पूरा सभागार स्तब्ध हो गया।संगीताचार्य अमरेश झा और संतोष कुमार के निर्देशन में अपराजिता और ऑरेन दास के गीतों ने माहौल को इतना भावुक कर दिया कि कई शिक्षकों और छात्रों की आंखें छलक पड़ीं।सम्मान स्वरूप उन्हें पाग, अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ, डायरी और कलम भेंट की गई, लेकिन यह सम्मान उस प्रेम के सामने छोटा था, जो हर छात्र की आंखों में साफ झलक रहा था।
सबसे दर्दनाक क्षण तब आया, जब छात्रावासी बच्चों ने अपने प्रिय आचार्य को अंतिम बार प्रणाम किया।बच्चे फूट-फूटकर रो पड़े, महिलाएं अपनी आंखें पोंछती रहीं, पुरुष शिक्षक भी अपनी भावनाएं छुपा नहीं सके 26 वर्षों तक जिसने सबको संभाला, आज वही सबको ढांढस बंधा रहा था।इस अवसर पर रामबाबू दास, रवीन्द्र ठाकुर, मनोज राय, राघवेंद्र कुमार, मंजीत चौबे, विकास कुमार, रामशंकर झा, हृषीकेश सिंह, राजीव कुमार, मनोज हिमांशु, अशोक कुमार, ललित झा, रेणु कुमारी, सुमित कुमार, अरविंद मेहता, मनीष ठाकुर, अनीश कुमार, अंजू कुमारी, पूनम सिंह, पूनम कुमारी, पिंकी कुमारी, रीना शर्मा, सुष्मिता सिंह, रामबाबू कुमार, पंकज कुमार, धीरज कुमार, सीताकांत झा, स्मिता कुमारी सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
यह विदाई नहीं थी…
यह उस इंसान से बिछड़ने का दर्द था,
जिसने पीढ़ियों को गढ़ा,
जिसने शब्दों से नहीं—आचरण से सिखाया।
आचार्य विजयव्रत कंठ भले ही आज विद्यालय से विदा हो गए हों,
लेकिन उनकी सीख, उनका अनुशासन और उनका स्नेह
इस विद्यालय की दीवारों में,
इन बच्चों की सांसों में
और हर दिल में हमेशा जीवित रहेगा।