बटहा/रोसड़ा: जब शब्द केवल शब्द न रहकर भावनाओं का सागर बन जाएं, और गुरु की वाणी शिष्यों के हृदय को छू जाए—तो वह क्षण इतिहास बन जाता है। ऐसा ही एक भावुक क्षण रविवार को देखने को मिला, जब वरिष्ठ आचार्य विजयव्रत कंठ ने अपनी सेवा-निवृत्ति के अवसर पर कहा—
“एक बात कहता हूं तुमसे, कान खोलकर सुन…
मैं तो ठहरा द्रोणाचार्य, तुम सब हो अर्जुन…”
इन पंक्तियों के साथ ही आभासी मंच पर मौजूद सैकड़ों शिष्य भावनाओं से भर उठे। किसी की आंखें नम थीं, तो किसी का गला रुंध गया। अवसर था सुंदरी देवी सरस्वती विद्या मंदिर सैनिक स्कूल, बटहा के पूर्व छात्र परिषद द्वारा आयोजित गूगल मीट के माध्यम से आभासी समागम का, जिसमें बीते 25 वर्षों में विद्यालय से उत्तीर्ण भैया-बहनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
देश-विदेश से जुड़े शिष्य, यादों में लौटा विद्यालय
इस आभासी समागम में शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, पत्रकारिता, सुरक्षा बल, अभियांत्रिकी, प्रबंधन और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में देश-विदेश में कार्यरत पूर्व विद्यार्थियों ने सहभागिता की। सभी ने अपने-अपने विद्यालय जीवन की यादों को साझा किया और बताया कि किस तरह आचार्य विजयव्रत कंठ का स्नेह, अनुशासन और मार्गदर्शन उनके जीवन की दिशा तय करने में मील का पत्थर बना।
पूर्व विद्यार्थियों ने कहा कि कंठ आचार्य केवल शिक्षक नहीं थे, बल्कि हर छात्र के लिए एक संरक्षक, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत थे। उनके सान्निध्य में पढ़ाई केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन जीने की कला बन गई।
अच्छे शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होते”
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व छात्र परिषद के संयोजक एवं भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के सहायक महाप्रबंधक कुमार आशीष ने कहा—
“अच्छे शिक्षक समाज के शिल्पकार होते हैं। उनके लिए सेवानिवृत्ति केवल एक औपचारिक शब्द है। वे जीवनपर्यंत समाज की दशा और दिशा गढ़ते रहते हैं।”
उन्होंने कहा कि विद्यालय से निकलने के बाद भी आचार्य कंठ पूर्व विद्यार्थियों से निरंतर जुड़े रहे और पूर्व छात्र परिषद के माध्यम से सबको एक सूत्र में बांधे रखा।
भूगोल से जीवन-दर्शन तक
कार्यक्रम का संचालन करते हुए पूर्व छात्र परिषद के सहसचिव एवं भारतीय सूचना सेवा के वरीय अधिकारी ऋतेश पाठक ने कहा कि आचार्य कंठ भूगोल के शिक्षक होते हुए भी ‘भुवन कोष विज्ञान’ की अवधारणा को जीवंत कर देते थे।
टाटा स्टील में कार्यरत ई. रमेंद्र कुमार ने कहा कि वे साहित्य, समाज और संस्कारों से भी गहराई से जुड़े रहे।
पुणे से जुड़े ई. प्रेमरंजन ने कहा कि कंठ आचार्य की आत्मीयता ऐसी थी, जो हर छात्र को अपनेपन का अहसास कराती थी।
“मेरे शिष्य माला के मोती हैं”
अपने उद्बोधन में आचार्य विजयव्रत कंठ ने कहा कि उन्हें अपने शिक्षकीय जीवन पर पूर्ण संतोष है। उन्होंने भावुक स्वर में कहा—
“मेरे सभी शिष्य माला के मोती की तरह हैं, जिन्हें मैंने एक सूत्र में पिरोया है। उनकी उपलब्धियां ही मेरा सबसे बड़ा सम्मान हैं।”
उन्होंने पूर्व विद्यार्थियों को विद्यालय का राजदूत बताते हुए आग्रह किया कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाएं—यही जीवन को सार्थक बनाने का मूल मंत्र है।
यादों के दीप और शांति पाठ
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में कार्यरत अभिनव कृष्ण ने आचार्य कंठ की कक्षाओं की यादें साझा कीं।
इस समागम में मनोरंजन कुमार, डॉ. धीरेंद्र, डॉ. अमरदीप, रवि प्रकाश ठाकुर, हीरा लाल, ऋषभ, सीए सुमित गोयल, ई. शिवदानी राय, प्रेम कुमार, मेडिकल छात्र प्रणव कुमार (कमांडेंट, CISF), चंदन कुमार (डा. रेडीज, हैदराबाद), राज चौरसिया (दिल्ली मेट्रो), दीपक राज वर्मा, रुपेश कुमार, डॉ. विशाल कुमार, निखिल (मर्चेंट नेवी, जापान), निशा नायक, पंकज कुमार सहित अनेक पूर्व विद्यार्थियों ने अपने भाव साझा किए।
कार्यक्रम का समापन शांति पाठ के साथ हुआ, लेकिन गुरु–शिष्य के इस भावनात्मक मिलन की स्मृतियां सभी के हृदय में लंबे समय तक जीवित रहेंगी।