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बिहार में अपराध और राजनीति का घातक तालमेल

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पटना।बिहार में अपराध केवल कानून व्यवस्था की चुनौती नहीं रहा। यह अब राजनीति और अपराधियों के घातक तालमेल का नतीजा बन चुका है। हत्या, लूट-छिनतई, शराब तस्करी, अवैध निर्माण और जमीन विवाद में अक्सर राजनीतिक संरक्षण देखा जाता है। इसका असर पुलिस कार्रवाई, गवाहों के बयान और जनता के भरोसे पर सीधे पड़ता है।
ग्रामीण थाना क्षेत्रों में राजनीतिक दबदबा
सीतामढ़ी सदर थाना क्षेत्र में हाल ही में एक भूमि विवाद ने हत्या तक का रूप ले लिया। पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया, लेकिन स्थानीय प्रभावशाली नेता के दबाव के कारण जांच धीमी रही। गवाह डर के कारण बयान देने से कतराए, और अपराधी की गिरफ्तारी में दो सप्ताह से अधिक समय लगा।
पूर्णिया कोतवाली क्षेत्र में शराब तस्करी का एक नेटवर्क पकड़ा गया। थाने ने कार्रवाई की, लेकिन तस्करी में जुड़े कुछ लोग स्थानीय राजनीतिक संरक्षण के चलते जमानत पर जल्दी बाहर आ गए। इससे इलाके में अपराधियों का हौसला बढ़ा और जनता में असंतोष फैल गया।
शहरी थाना क्षेत्रों में अपराध और राजनीति
पटना कोतवाली में बाइक गिरोह ने बाजार और रेलवे स्टेशन के आस-पास कई लूट-छिनतई की घटनाएँ अंजाम दी। गिरोह का प्रभावशाली राजनीतिक संपर्क माना जाता है, जिससे पुलिस की कार्रवाई अक्सर सीमित और धीमी रही। नागरिक सुरक्षा के लिए रात्रि गश्ती बढ़ाई गई, लेकिन गिरोह की सक्रियता अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है।
मुजफ्फरपुर सदर थाना में हाल ही में तीन हत्या के मामले दर्ज हुए। इनमें दो मामलों में आरोपी का परिवार स्थानीय राजनीतिक दल से जुड़ा था। जांच और गिरफ्तारी में देरी हुई और गवाहों पर दबाव के चलते केस कमजोर हुआ।
साइबर और डिजिटल अपराध में राजनीतिक छाया
पाटलिपत्र थाना (पटना) में साइबर ठगी और फर्जी कॉल की शिकायतें बढ़ी हैं। विश्लेषण में पाया गया कि कई मामलों में अपराधी स्थानीय व्यापारियों और राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े हुए हैं। डिजिटल निगरानी और तकनीकी संसाधन सीमित होने के कारण इन मामलों में जांच धीमी रहती है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण
कानून और अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल गश्ती और गिरफ्तारी से स्थिति नियंत्रित नहीं होगी। प्रभावी समाधान के लिए आवश्यक हैं:
पारदर्शिता और जवाबदेही
स्वतंत्र और तेज़ जांच
थाना-वार रणनीति और डिजिटल निगरानी
सामुदायिक पुलिसिंग और मुखबिर नेटवर्क सशक्त करना
विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण वाले मामले कानून और पुलिस पर दबाव डालते हैं। इससे जनता का भरोसा कमजोर होता है और अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं।
संपादकीय निष्कर्ष
बिहार की कानून व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब अपराध और राजनीति के इस तालमेल को सिर्फ पुलिस नहीं, बल्कि प्रशासन, जनता और मीडिया मिलकर चुनौती दें।
सवाल यह है कि क्या हम अपने कानून और प्रशासन को इतने कमजोर छोड़ देंगे कि अपराधी और राजनीतिक संरक्षण एक-दूसरे के हाथ में खेलते रहें, या हम इस जटिल समस्या का सामना करेंगे।

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