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यूजीसी के नए 'इक्विटी प्रमोशन नियम 2026' ने सियासत में हलचल मचा दी: अगड़ी जातियों में नाराजगी, बीजेपी में बेचैनी, विपक्ष चुप

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नई दिल्ली: देश के विश्वविद्यालयों में समानता और जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए यूजीसी के नए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ ने शिक्षा जगत के साथ-साथ सियासत में भी हलचल पैदा कर दी है।
इस नियम के लागू होते ही सत्तारूढ़ बीजेपी के भीतर विरोध की लहर तेज हो गई है, खासकर उन नेताओं में जो अगड़ी जातियों से जुड़े हैं। कई मौजूदा और पूर्व सांसद व विधायकों ने खुले तौर पर या परोक्ष रूप से नाराजगी जाहिर की है। वहीं विपक्ष पूरी तरह से चुप है और कोई मुखर प्रतिक्रिया नहीं दी है। जेडीयू भी वेट एंड वॉच की स्थिति में दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अगड़ी जातियों में यह नाराजगी इसलिए तेज है क्योंकि वे लंबे समय से बीजेपी का कोर वोटबैंक मानी जाती रही हैं। नए नियमों के लागू होने के बाद अगड़ी जातियों में यह धारणा बन रही है कि केंद्र सरकार का सामाजिक न्याय एजेंडा दलित और ओबीसी वर्गों तक सीमित रह गया है और उनकी सियासी हिस्सेदारी नजरअंदाज की जा रही है। यही वजह है कि बीजेपी के कई नेता इस मुद्दे पर असमंजस में हैं—कुछ खुले तौर पर विरोध जता रहे हैं, तो कुछ सावधानी बरत रहे हैं।
वहीं राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि विपक्ष इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है क्योंकि उनके लिए दलित और ओबीसी वोटबैंक की राजनीति अभी भी मुख्य है। यूजीसी के नियमों को लेकर मुखर विरोध करने से उन्हें कोई राजनीतिक लाभ नहीं दिख रहा, इसलिए वे इस मुद्दे पर किसी भी जोखिम से बच रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मसला आने वाले समय में न केवल शिक्षा नीति बल्कि अगले चुनावों में सियासी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है। अगड़ी जातियों की नाराजगी अगर बढ़ती है, तो बीजेपी के लिए इसे संतुलित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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