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बिहार में खनन विभाग 3800 करोड़ के राजस्व लक्ष्य के करीब, अवैध खनन पर सख्ती और सरेंडर करने वाली कंपनियों पर बड़ा एक्शन

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पटना: बिहार में खनन क्षेत्र से सरकार को मिलने वाले राजस्व में इस बार बड़ी बढ़ोतरी दर्ज होने जा रही है। राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए खान एवं भूतत्व विभाग के सामने 3800 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है और विभाग अब इस लक्ष्य को हासिल करने के बेहद करीब पहुंच चुका है। सरकार का दावा है कि अब तक बड़ी राशि की वसूली हो चुकी है और शेष रकम भी विभिन्न स्रोतों से आने की संभावना है। इस बीच राज्य सरकार ने अवैध खनन, बालू घाटों के संचालन और नई खनिज संभावनाओं को लेकर भी कई अहम संकेत दिए हैं।
इस संबंध में जानकारी देते हुए उपमुख्यमंत्री सह खान एवं भूतत्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि विभाग ने चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 3252 करोड़ रुपये का राजस्व जुटा लिया है। इसके अलावा सरकार को उम्मीद है कि करीब 400 करोड़ रुपये कार्य विभागों से और लगभग 150 करोड़ रुपये बालू घाटों के जरिए प्राप्त होंगे। इन आंकड़ों को जोड़कर देखा जाए तो विभाग निर्धारित लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच रहा है और सरकार को विश्वास है कि यह लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।
राज्य सरकार के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि खनन क्षेत्र से मिलने वाला राजस्व बिहार की विकास योजनाओं, निर्माण कार्यों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। ऐसे में अगर विभाग 3800 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू लेता है, तो यह न सिर्फ राजस्व संग्रह के लिहाज से बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि खनन प्रशासन की कार्यप्रणाली में आए बदलाव का भी संकेत मानी जाएगी।
उपमुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि बिहार के 10 से अधिक जिलों ने अपने तय लक्ष्य से ज्यादा राजस्व जमा किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य के कई हिस्सों में खनन गतिविधियों की निगरानी और राजस्व वसूली की व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुई है। सरकार इसे प्रशासनिक मजबूती और निगरानी व्यवस्था के सुदृढ़ होने का नतीजा मान रही है।
खनन विभाग के राजस्व में तेजी से हुई बढ़ोतरी को समझने के लिए पिछले वर्षों के आंकड़े भी काफी अहम हैं। सरकार के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2021-22 में विभाग ने करीब 1600 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया था। वहीं हाल के वर्षों में इस संग्रह में लगातार तेजी आई है। 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 3536 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो कुछ ही वर्षों में लगभग दोगुनी वृद्धि को दर्शाता है। अब 2025-26 में 3800 करोड़ रुपये के लक्ष्य की ओर बढ़ता विभाग यह संकेत दे रहा है कि राज्य में खनन से जुड़े राजस्व प्रबंधन को सरकार ने अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
हालांकि, सरकार ने सिर्फ राजस्व बढ़ाने की बात नहीं की है, बल्कि उन कंपनियों और एजेंसियों के खिलाफ भी सख्त रुख दिखाया है, जिन्होंने तय मानकों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं किया। विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि राज्य के 78 बालू घाटों को उन संचालकों ने सरेंडर कर दिया, जो निर्धारित राजस्व लक्ष्य पूरा नहीं कर सके। सरकार ने इस पर स्पष्ट संदेश दिया है कि ऐसे संचालकों को दोबारा होने वाले टेंडर में हिस्सा लेने का मौका नहीं दिया जाएगा।
सरकार का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में बालू घाटों का संचालन लंबे समय से विवाद, अनियमितता और राजस्व हानि जैसे मुद्दों से जुड़ा रहा है। कई बार यह आरोप लगते रहे हैं कि कुछ कंपनियां घाटों का संचालन तो ले लेती हैं, लेकिन सरकार को अपेक्षित राजस्व नहीं दे पातीं या फिर संचालन के दौरान नियमों का पूरी तरह पालन नहीं होता। ऐसे में 78 घाटों के सरेंडर के बाद सरकार ने यह साफ कर दिया है कि अब केवल उन्हीं कंपनियों को मौका मिलेगा, जो आर्थिक और संचालन दोनों मोर्चों पर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हों।
इस सख्ती को अवैध खनन के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से भी जोड़कर देखा जा रहा है। बिहार सरकार पिछले कुछ समय से अवैध खनन पर नियंत्रण को लेकर अधिक सक्रिय नजर आ रही है। इसी दिशा में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने “बिहारी खनन योद्धा” जैसी प्रोत्साहन योजना भी शुरू की है, जिसका उद्देश्य अवैध खनन और अवैध परिवहन के खिलाफ स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र को मजबूत करना है।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि इस योजना के तहत 24 लोगों को सम्मानित किया गया है। इन सभी को पांच-पांच हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई, जिसे सीधे उनके बैंक खातों में भेजा गया। सरकार का कहना है कि यह योजना उन लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई है, जो अवैध खनन और खनिजों की अवैध ढुलाई की सूचना देकर प्रशासन की मदद करते हैं।
इस योजना के तहत यदि कोई व्यक्ति अवैध खनन में शामिल ट्रैक्टर को पकड़वाने में मदद करता है, तो उसे 5 हजार रुपये का इनाम दिया जाता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति ट्रक जैसे बड़े वाहन को पकड़वाने में सहयोग करता है, तो उसे 10 हजार रुपये तक की पुरस्कार राशि दी जाती है। सरकार का मानना है कि इससे स्थानीय लोगों को अवैध गतिविधियों के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा मिलेगी और प्रशासन को जमीनी स्तर पर अधिक मजबूत सूचना मिल सकेगी।
उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब इस योजना के तहत लोगों को सम्मानित किया गया हो। इससे पहले 12 मार्च को भी “बिहारी खनन योद्धा” योजना के अंतर्गत 72 लोगों को पुरस्कृत किया गया था। इससे यह साफ है कि सरकार इस योजना को केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय निगरानी तंत्र के रूप में विकसित करना चाहती है।
राजस्व और निगरानी के साथ-साथ बिहार में खनिज संसाधनों की नई संभावनाओं पर भी सरकार का ध्यान बढ़ा है। विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से बिहार के चार बड़े खनन ब्लॉकों के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई है। इनमें से तीन खनिज ब्लॉक रोहतास जिले में हैं, जबकि एक ब्लॉक गया जिले में स्थित है। इन ब्लॉकों में मौजूद खनिजों की प्रकृति भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सरकार के अनुसार, रोहतास जिले में ग्लूकोनाइट जैसे खनिज पदार्थ की संभावना है, जबकि गया जिले में निकेल, क्रोमियम और प्लेटिनियम जैसे बहुमूल्य खनिजों की मौजूदगी बताई गई है। यदि इन खनिज ब्लॉकों का दोहन वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से होता है, तो यह बिहार के लिए खनन क्षेत्र में एक नया अध्याय साबित हो सकता है। खासकर प्लेटिनियम, निकेल और क्रोमियम जैसे खनिज औद्योगिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
ऐसे में बिहार के लिए यह सिर्फ राजस्व संग्रह का मामला नहीं, बल्कि खनिज संसाधनों के नए आर्थिक उपयोग और औद्योगिक संभावनाओं का भी संकेत है। यदि आने वाले समय में इन ब्लॉकों पर खनन गतिविधियां शुरू होती हैं, तो इससे राज्य में निवेश, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिल सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार सरकार इस समय खनन क्षेत्र को केवल राजस्व जुटाने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक सेक्टर के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रही है। एक ओर सरकार निर्धारित लक्ष्य के करीब पहुंचकर वित्तीय उपलब्धि दर्ज करने की तैयारी में है, तो दूसरी ओर अवैध खनन पर अंकुश, घाट संचालन में जवाबदेही और नई खनिज संपदा की खोज जैसे मोर्चों पर भी सक्रिय नजर आ रही है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार 3800 करोड़ रुपये के लक्ष्य को किस हद तक हासिल कर पाती है और अवैध खनन तथा खनिज संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के मोर्चे पर कितनी ठोस सफलता दर्ज करती है। फिलहाल इतना तय है कि बिहार में खनन विभाग अब सिर्फ परंपरागत प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि राजस्व, निगरानी और संसाधन विकास का एक अहम केंद्र बनकर उभर रहा है।

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