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बिहार के भ्रष्ट अफसरों का सिलीगुड़ी कनेक्शन उजागर, हवाला और नकदी से बन रही बेनामी संपत्तियों का बड़ा नेटवर्क

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आर्थिक अपराध इकाई की जांच में बिहार के कई भ्रष्ट अधिकारियों का सिलीगुड़ी कनेक्शन सामने आया है। हवाला और रिश्वत के पैसे से बंगाल की सोसायटी में करोड़ों की बेनामी संपत्ति खरीदने के सबूत मिले हैं।

पटना/आलम की खबर:बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई के बीच आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच ने एक ऐसा बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में यह सामने आया है कि राज्य के कई सरकारी अधिकारी न सिर्फ रिश्वत ले रहे थे, बल्कि उस अवैध कमाई को सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में जमीन, फ्लैट और सोसायटी प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रहे थे। यह पूरा नेटवर्क किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि एक संगठित आर्थिक तंत्र की तरह काम कर रहा था, जिसमें अफसर, दलाल और रियल एस्टेट डेवलपर सभी शामिल बताए जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार यह पूरा खेल लंबे समय से चल रहा था और इसमें नकद लेन-देन को प्राथमिकता दी जा रही थी ताकि किसी भी तरह का डिजिटल ट्रैक या बैंकिंग रिकॉर्ड न बन सके। यही वजह है कि जांच एजेंसियों के लिए इस नेटवर्क तक पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन हाल की छापेमारी और दस्तावेजों की जांच ने पूरे सिस्टम को उजागर कर दिया।

सिलीगुड़ी बना भ्रष्ट पैसे का ठिकाना

EOU की जांच में यह बात बेहद गंभीर रूप से सामने आई है कि सिलीगुड़ी और उसके आसपास की कई रिहायशी सोसायटियों में बिहार के अधिकारियों की बड़ी हिस्सेदारी है। एक विशेष सोसायटी में तो स्थिति यह है कि करीब 90 प्रतिशत खरीदार बिहार से जुड़े हुए हैं। इनमें विभिन्न विभागों के अधिकारी, पुलिस अफसर और कुछ इंजीनियरिंग तथा निबंधन विभाग से जुड़े लोग शामिल बताए जा रहे हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन संपत्तियों का बड़ा हिस्सा बेनामी तरीके से खरीदा गया है और कई मामलों में संपत्ति रिश्तेदारों के नाम पर दर्ज कराई गई है। जांच एजेंसी को यह भी संकेत मिले हैं कि कई आईएएस और आईपीएस स्तर के अधिकारियों के नाम भी इस रडार पर हैं, हालांकि उनकी भूमिका की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

हवाला नेटवर्क के जरिए पूरा खेल

जांच में जो सबसे गंभीर पहलू सामने आया है, वह है हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल। ईओयू की रिपोर्ट के अनुसार, रिश्वत की रकम पहले पटना से विभिन्न जिलों में इकट्ठा की जाती है और फिर उसे पूर्णिया के रास्ते सिलीगुड़ी तक पहुंचाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में हवाला ऑपरेटर सक्रिय रहते हैं, जो नकद को बिना किसी रिकॉर्ड के एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाते हैं।

इसके बाद यह पैसा सीधे रियल एस्टेट डेवलपर्स तक पहुंचता है, जहां से जमीन और फ्लैट की खरीदारी की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में नकद भुगतान को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे जांच एजेंसियों के लिए ट्रांजैक्शन ट्रेस करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

सुपौल और किशनगंज से जुड़े बड़े मामले

EOU की हालिया कार्रवाई में सुपौल के तत्कालीन जिला अवर निबंधक अमरेंद्र कुमार के ठिकानों से मिले दस्तावेजों ने बड़ा खुलासा किया है। जांच में पाया गया कि उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर सिलीगुड़ी के पास लगभग 42 डिसमिल जमीन खरीदी थी, जिसकी कीमत करोड़ों रुपये में आंकी गई है। इस जमीन का पूरा भुगतान नकद में किया गया और इसके साक्ष्य जांच एजेंसी के हाथ लगे हैं।

इसी तरह किशनगंज में भी कई मामलों ने जांच को और गंभीर बना दिया है। यहां के तत्कालीन थानेदार और डीएसपी स्तर के अधिकारियों पर सिलीगुड़ी में बेनामी संपत्ति खरीदने का आरोप है। एक मामले में तो सिलीगुड़ी के बागडोगरा क्षेत्र में एक दो मंजिला भवन किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर रजिस्टर्ड मिला, लेकिन जांच एजेंसी को संदेह है कि असली मालिक एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं।

संपत्ति खरीद में बेनामी का पूरा तंत्र

जांच में यह भी सामने आया है कि कई संपत्तियां तीसरे या चौथे व्यक्ति के नाम पर खरीदी गई हैं ताकि असली मालिक की पहचान छिपाई जा सके। इसके लिए रिश्तेदारों, परिचितों और यहां तक कि बाहर के राज्यों के लोगों का भी इस्तेमाल किया गया है।

कुछ मामलों में जमीन की कीमत बाजार दर से कई गुना अधिक नकद में दी गई, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि यह पैसा वैध आय का नहीं बल्कि अवैध स्रोतों से आया हुआ है।

EOU और आयकर विभाग की संयुक्त कार्रवाई की तैयारी

आर्थिक अपराध इकाई अब इस पूरे मामले को आयकर विभाग के साथ साझा करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि जैसे ही दोनों एजेंसियां मिलकर जांच करेंगी, इस पूरे नेटवर्क की और बड़ी परतें खुल सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस नेटवर्क की गहराई से जांच हुई तो बिहार से लेकर बंगाल तक फैला एक बड़ा भ्रष्टाचार और हवाला तंत्र सामने आ सकता है, जिसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल हो सकते हैं।

प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल

इस पूरे खुलासे ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस तरह से अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और अवैध कमाई को बाहरी राज्यों में निवेश कर रहे हैं, वह न केवल कानून व्यवस्था बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

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