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विदेशों में भारतीय कामगारों की मौत पर चिंता
- Reporter 12
- 03 Apr, 2026
सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच विदेशों में 37,740 भारतीय कामगारों की मौत हुई। सबसे अधिक मौतें खाड़ी देशों में दर्ज की गईं, जबकि शोषण और वेतन विवाद जैसी शिकायतों की संख्या भी लगातार बढ़ी है।
नई दिल्ली, आलम की खबर। विदेशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा और जीवन-स्थितियों को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। राज्यसभा में केंद्र सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों ने यह संकेत दिया है कि बीते पांच वर्षों में बड़ी संख्या में भारतीय कामगारों ने विदेशी धरती पर अपनी जान गंवाई है। संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच कुल 37,740 भारतीय कामगारों की विदेशों में मौत हुई।
यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज है, जिनके सदस्य रोजी-रोटी की तलाश में घर-परिवार से दूर गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए। आंकड़ों से यह भी साफ हुआ है कि सबसे अधिक मौतें खाड़ी देशों में हुई हैं, जहां बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिक रोजगार के लिए जाते हैं।
हर दिन औसतन 20 से ज्यादा मौतें
यदि इन आंकड़ों को दैनिक औसत में समझें, तो तस्वीर और भी अधिक चिंताजनक हो जाती है। 2021 से 2025 के बीच विदेशों में हर दिन औसतन 20 से अधिक भारतीय कामगारों की मौत हुई। इनमें से बड़ी संख्या खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी है, जहां निर्माण, सेवा, घरेलू कार्य, परिवहन और औद्योगिक क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि खाड़ी देशों में काम करने वाले श्रमिकों का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर या मध्यमवर्गीय परिवारों से आता है। ये लोग अपने परिवार की उम्मीदें लेकर विदेश जाते हैं, लेकिन कई बार वहां की कार्य-स्थितियां, मौसम, दबाव और असुरक्षित श्रम ढांचा उनके लिए भारी पड़ जाता है।
सरकार ने संसद में यह जरूर बताया कि मौतों की कुल संख्या कितनी रही, लेकिन इन मौतों के कारणों का विस्तृत ब्योरा साझा नहीं किया गया। यही बात इस मुद्दे को और गंभीर बनाती है, क्योंकि कारण स्पष्ट न होने से यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर किस स्तर पर सबसे ज्यादा खतरे मौजूद हैं।
यह भी पढ़ें: खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों की बढ़ती संख्या और उनकी चुनौतियां
सबसे ज्यादा मौतें खाड़ी देशों में
आंकड़ों के मुताबिक, विदेशों में हुई कुल मौतों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी खाड़ी देशों की है। यह कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, कतर और ओमान जैसे देशों में लाखों भारतीय रोजगार के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन जो बात चिंताजनक है, वह यह कि मौतों का अनुपात भी सबसे अधिक इन्हीं देशों में सामने आया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा भारतीय कामगारों की मौत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में हुई, जहां यह संख्या 12,380 रही। इसके बाद सऊदी अरब में 11,757, कुवैत में 3,890, ओमान में 2,821, और कतर में 1,760 मौतें दर्ज की गईं।
इन आंकड़ों से यह साफ है कि भारतीय श्रमिकों के लिए सबसे बड़ा जोखिम उन्हीं देशों में है, जहां सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन देशों में श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-स्थितियों को लेकर पर्याप्त निगरानी और व्यवस्था है?
साल-दर-साल क्या कह रहे हैं आंकड़े?
पांच वर्षों के आंकड़े भी इस चिंता को और गहरा करते हैं। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार:
2021 में 8,234 भारतीय कामगारों की मौत हुई
2022 में यह संख्या 6,614 रही
2023 में 7,291 मौतें दर्ज हुईं
2024 में 7,747
और 2025 में 7,854 भारतीय कामगारों की जान गई
इन आंकड़ों से साफ है कि कुछ उतार-चढ़ाव के बावजूद मौतों का सिलसिला लगातार बना रहा। 2022 में थोड़ी कमी के बाद अगले वर्षों में संख्या फिर बढ़ती दिखाई दी। यह बताता है कि स्थिति में कोई स्थायी सुधार अब तक स्पष्ट रूप से नजर नहीं आता।
पुरानी रिपोर्टों से तुलना और बड़ा संकेत
इस पूरे मुद्दे का एक और अहम पहलू यह है कि यदि पुराने वर्षों से तुलना की जाए, तो खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की मौत का औसत बढ़ता हुआ दिखाई देता है। पहले जिन वर्षों में रोजाना लगभग 10 भारतीय श्रमिकों की मौत का अनुमान सामने आता था, अब वही औसत बढ़कर करीब 18 प्रतिदिन तक पहुंचता दिख रहा है।
यानी सिर्फ कुल संख्या ही नहीं, बल्कि मृत्यु दर का रुझान भी गंभीर चिंता पैदा करता है। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि श्रमिकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा चुनौतियां भी और बड़ी हुई हैं।
यह भी पढ़ें: विदेशों में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा, क्या व्यवस्था पर्याप्त है?
मौतों से भी बड़ा संकट: शोषण और उत्पीड़न
विदेशों में भारतीय कामगारों की स्थिति सिर्फ मौतों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। संसद में सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि बीते पांच वर्षों में 80,985 शिकायतें भारतीय मिशनों को मिलीं, जो कामगारों के साथ गलत व्यवहार, शोषण, वेतन विवाद, पासपोर्ट जब्ती, अधिक काम, छुट्टी न मिलने और नौकरी छूटने जैसे मामलों से जुड़ी थीं।
यह संख्या इस बात का संकेत है कि विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की बड़ी आबादी केवल कठिन श्रम नहीं, बल्कि कई बार मानव गरिमा और बुनियादी अधिकारों के संकट से भी गुजर रही है। शिकायतों की यह संख्या बताती है कि हजारों कामगार ऐसे हालात में काम कर रहे हैं, जहां न तो काम के घंटे तय हैं, न ही सुरक्षा और सम्मान की गारंटी।
सबसे अधिक शिकायतें भी उन्हीं देशों से आईं, जहां सबसे ज्यादा भारतीय श्रमिक मौजूद हैं। यूएई में 16,965, कुवैत में 15,234, ओमान में 13,295, और सऊदी अरब में 12,988 शिकायतें दर्ज हुईं।
शिकायतें बढ़ना क्या बता रहा है?
शिकायतों की संख्या में लगातार वृद्धि इस बात का भी संकेत है कि या तो समस्याएं बढ़ रही हैं, या फिर लोग अब अधिक संख्या में अपनी बात भारतीय मिशनों तक पहुंचा पा रहे हैं। दोनों ही स्थितियां अपने-आप में महत्वपूर्ण हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुल शिकायतें 2021 में 11,632 थीं, जो बढ़कर 2025 में 22,479 तक पहुंच गईं। यानी पांच वर्षों में शिकायतों का बोझ लगभग दोगुना हो गया।
यह वृद्धि बताती है कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के सामने कार्यस्थल, वेतन, दस्तावेज और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। खास बात यह भी है कि कुछ देशों में मौतें कम रहीं, लेकिन शिकायतें अधिक सामने आईं—इससे यह संकेत मिलता है कि हर संकट सिर्फ मृत्यु से नहीं मापा जा सकता, बल्कि कामगारों के जीवन की गुणवत्ता भी उतनी ही अहम है।
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार का कहना है कि विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास और मिशन ऐसे मामलों में तत्काल मदद देने की कोशिश करते हैं। सरकार के अनुसार, कई देशों के साथ श्रमिकों की सुरक्षा, अधिकारों और कार्य-स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए समझौते भी किए गए हैं।
यह भी कहा गया कि भारतीय मिशन वेतन न मिलने, पासपोर्ट जब्त होने, अनुबंध विवाद और अन्य शिकायतों पर हस्तक्षेप करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब शिकायतों और मौतों दोनों की संख्या इतनी बड़ी है, तो क्या मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त मानी जा सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ शिकायत निवारण तंत्र पर्याप्त नहीं है; जरूरत इस बात की है कि विदेश जाने से पहले श्रमिकों को सही जानकारी, कानूनी सुरक्षा, हेल्पलाइन, बीमा और आपात सहायता जैसे तंत्र और मजबूत किए जाएं।
यह भी पढ़ें: विदेश जाने वाले कामगारों के लिए क्या होने चाहिए जरूरी सुरक्षा उपाय?
निष्कर्ष
विदेशों में भारतीय कामगारों की मौत और शोषण से जुड़े ताजा आंकड़े एक गंभीर और असहज तस्वीर पेश करते हैं। 37,740 मौतें और 80,985 शिकायतें यह बताने के लिए काफी हैं कि विदेश में काम करने वाले लाखों भारतीय सिर्फ बेहतर कमाई के लिए संघर्ष नहीं कर रहे, बल्कि कई बार वे अपने जीवन, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई भी लड़ रहे हैं।
सरकार ने मदद और सुरक्षा व्यवस्था का दावा जरूर किया है, लेकिन आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। खासकर खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल अधिकारों को लेकर अब और अधिक ठोस, संवेदनशील और सख्त नीति की जरूरत महसूस की जा रही है।
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