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बिहार में जल्द होगा मंत्रिमंडल विस्तार, सम्राट चौधरी सरकार में नए चेहरों की एंट्री तय

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बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। 3 या 6 मई को विस्तार की संभावना, सीट बंटवारे पर मंथन जारी।

पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की नई सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर गर्म है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अब सबकी नजरें बिहार पर टिक गई हैं, जहां मई के पहले सप्ताह में कैबिनेट विस्तार होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। 3 मई और 6 मई की तारीख को लेकर खास तौर पर राजनीतिक हलकों में कयास लगाए जा रहे हैं।

दरअसल, हाल ही में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सरकार का गठन तो हो गया, लेकिन मंत्रिमंडल का पूरा स्वरूप अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में विस्तार को लेकर राजनीतिक समीकरण साधने की कवायद तेज हो गई है। सत्ता पक्ष के भीतर लगातार बैठकों और मंथन का दौर जारी है, ताकि सभी सहयोगी दलों और विधायकों को संतुलित तरीके से प्रतिनिधित्व दिया जा सके।

बंगाल चुनाव के बाद तेज हुई कवायद

सूत्रों के अनुसार, बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार का फैसला काफी हद तक पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया खत्म होने के बाद वहां की राजनीतिक स्थिति का आकलन किया जा रहा है। इसी रिपोर्ट के आधार पर बिहार में कैबिनेट विस्तार की तारीख तय की जा सकती है। यदि परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो 6 मई को विस्तार संभव है, जबकि किसी भी तरह की रणनीतिक जरूरत को देखते हुए इसे 3 मई को पहले भी अंजाम दिया जा सकता है।

सीमित चरण में हो सकता है विस्तार

बिहार में संवैधानिक प्रावधानों के तहत मुख्यमंत्री समेत कुल 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। हालांकि, माना जा रहा है कि सभी पद एक साथ नहीं भरे जाएंगे। पहले चरण में सीमित संख्या में मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है और कुछ पद जानबूझकर खाली रखे जाएंगे। इसका उद्देश्य भविष्य में राजनीतिक संतुलन बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर नए समीकरणों के अनुसार विस्तार करना है।

क्या होगा दलों के बीच फॉर्मूला

मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे अहम सवाल यह है कि किस दल को कितनी हिस्सेदारी मिलेगी। भले ही मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी से हों, लेकिन सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना जताई जा रही है। पूर्व की सरकारों में अपनाए गए फॉर्मूले को देखते हुए यह माना जा रहा है कि जदयू को संख्या और अहम विभागों में प्राथमिकता दी जा सकती है।

चर्चाओं के अनुसार, भाजपा और जदयू के बीच लगभग बराबरी का बंटवारा हो सकता है, जिसमें दोनों दलों के मंत्रियों की संख्या लगभग समान रखी जा सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व के स्तर पर ही लिया जाएगा, जिसे लेकर अभी आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

पुराने चेहरों की वापसी तय

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कुछ अनुभवी नेताओं की वापसी लगभग तय मानी जा रही है। खासकर पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। उन्हें फिर से मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि उन्हें कौन सा विभाग मिलेगा, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजस्व, भूमि सुधार या पथ निर्माण जैसे अहम विभागों की चर्चा जोरों पर है।

सहयोगी दलों को भी मिलेगा मौका

एनडीए गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों को भी मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे दलों को पहले की तरह सरकार में शामिल किया जा सकता है। इन दलों के वरिष्ठ नेताओं या उनके भरोसेमंद चेहरों को फिर से मंत्री पद मिल सकता है, जिससे गठबंधन की एकजुटता मजबूत बनी रहे।

संतुलन साधना बड़ी चुनौती

मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना है। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और अनुभव को ध्यान में रखते हुए मंत्रियों का चयन किया जाएगा। इसके अलावा युवा और नए चेहरों को भी मौका देने पर विचार किया जा रहा है, ताकि सरकार में नई ऊर्जा का संचार हो सके।

सभी की नजरें पहली कैबिनेट पर

बिहार की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपनी पहली पूर्ण कैबिनेट में किन चेहरों को जगह देते हैं। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि कौन-कौन से विभाग किस दल के हिस्से में जाते हैं और किसे कितना महत्व मिलता है।

आने वाले कुछ दिनों में यह तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी, लेकिन अभी के लिए सियासी गलियारों में अटकलों का दौर जारी है। हर नेता और समर्थक अपने-अपने स्तर पर संभावनाओं का आकलन कर रहा है।

कुल मिलाकर, बिहार में कैबिनेट विस्तार सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है, जो आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

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