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भभुआ कोर्ट का बड़ा फैसला, सूबेदार मेजर शशिभूषण तिवारी हत्याकांड में छह को उम्रकैद

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भभुआ कोर्ट ने असम राइफल्स के सूबेदार मेजर शशिभूषण तिवारी हत्याकांड में छह आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। सभी दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

कैमूर/आलम की खबर:बिहार के कैमूर जिले स्थित भभुआ न्यायालय ने बहुचर्चित सूबेदार मेजर शशिभूषण तिवारी हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए छह दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने सभी दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में प्रत्येक दोषी को अतिरिक्त छह महीने की सजा भुगतनी होगी। यह फैसला एडीजे द्वितीय अजीत कुमार मिश्रा की अदालत ने सुनाया।

अदालत के फैसले के बाद न्यायालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। लंबे समय से इस फैसले का इंतजार कर रहे मृतक के परिजनों ने अदालत के निर्णय पर संतोष जताया और कहा कि उन्हें आखिरकार न्याय मिला है। यह मामला पिछले चार वर्षों से अदालत में चल रहा था और इलाके में काफी चर्चित रहा।

सजा पाने वालों में चैनपुर थाना क्षेत्र के मेढ़ गांव निवासी दीनानाथ गोंड के बेटे श्रवण गोंड और राकेश गोंड, बचाऊ सिंह के पुत्र सुभाष सिंह, नचकू गोंड के बेटे अर्जुन कुमार, चांद थाना क्षेत्र के बभनियांव गांव निवासी कुमार गोंड के बेटे अनिल गोंड तथा तेनउरा गांव निवासी सुदामा राम के पुत्र राजेश कुमार उर्फ राजेश राम शामिल हैं। न्यायालय के आदेश के बाद सभी दोषियों को जेल भेज दिया गया।

जानकारी के अनुसार मृतक शशिभूषण तिवारी असम राइफल्स में सूबेदार मेजर के पद पर तैनात थे। वे मणिपुर में सेवा दे रहे थे और वर्ष 2022 में छुट्टी लेकर अपने गांव आए थे। परिवार के लोगों के अनुसार वे अपने कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव और अनुशासित जीवन के लिए जाने जाते थे। गांव में भी उनकी अच्छी छवि थी।

मामले की शुरुआत तब हुई जब 16 जून 2022 की रात उन पर जानलेवा हमला किया गया। आरोप है कि हमलावरों ने लोहे के फरसे और कुदाल जैसे धारदार हथियारों से उनके सिर पर हमला किया। हमला इतना गंभीर था कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना की खबर फैलते ही इलाके में सनसनी फैल गई थी और बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर जुट गए थे।

अगले दिन मृतक की पत्नी और पेशे से अधिवक्ता सीमा तिवारी ने चांद थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। उन्होंने अपने बयान में आरोप लगाया था कि उनके पति की हत्या सुनियोजित तरीके से की गई। शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और धीरे-धीरे मामले की परतें खुलती गईं।

जांच के दौरान पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की और घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए। पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले में कई तकनीकी और प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने आए, जिनके आधार पर आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। अदालत में अभियोजन पक्ष ने गवाहों और साक्ष्यों के जरिए आरोप साबित करने की कोशिश की।

इस केस की सुनवाई के दौरान कई बार मामला चर्चा में आया। पीड़ित परिवार का आरोप था कि कुछ लोग मामले को प्रभावित करने और दबाने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि परिवार लगातार न्याय की मांग पर अडिग रहा। अदालत में लगातार सुनवाई चलती रही और आखिरकार चार साल बाद फैसला सामने आया।

कानूनी जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में अदालत केवल प्रत्यक्ष साक्ष्य ही नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों की विश्वसनीयता को भी गंभीरता से देखती है। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और जांच रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

फैसले के बाद इलाके में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। कई लोगों ने इसे न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करने वाला फैसला बताया। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे इंतजार के बाद परिवार को इंसाफ मिला है। वहीं कुछ लोगों ने इस घटना को समाज में बढ़ती हिंसा और आपसी दुश्मनी का खतरनाक उदाहरण बताया।

विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार सहित देश के कई हिस्सों में व्यक्तिगत विवाद और पुरानी रंजिशें कई बार गंभीर अपराध का रूप ले लेती हैं। ऐसे मामलों में समय पर कानूनी हस्तक्षेप और निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी होती है। इस केस में अदालत के फैसले को कानून के प्रति सख्त संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

असम राइफल्स जैसे प्रतिष्ठित सुरक्षा बल में कार्यरत अधिकारी की हत्या ने उस समय पूरे इलाके को झकझोर दिया था। लोगों का कहना है कि जो व्यक्ति देश की सुरक्षा में अपनी सेवा दे रहा था, उसकी इस तरह हत्या होना बेहद दुखद था। घटना के बाद स्थानीय लोगों ने आरोपियों की गिरफ्तारी और कड़ी सजा की मांग की थी।

मृतक के परिवार ने अदालत के फैसले के बाद कहा कि भले ही उनका अपना सदस्य वापस नहीं आ सकता, लेकिन दोषियों को सजा मिलने से उन्हें न्याय व्यवस्था पर भरोसा मिला है। परिवार ने पुलिस और अदालत की प्रक्रिया के प्रति आभार भी जताया।

फिलहाल अदालत के आदेश के बाद सभी दोषियों को जेल भेज दिया गया है। यदि जुर्माना राशि जमा नहीं की जाती है तो उन्हें अतिरिक्त सजा भी भुगतनी होगी। इस फैसले के बाद एक बार फिर यह संदेश गया है कि गंभीर अपराधों में कानून देर से सही, लेकिन अपना काम जरूर करता है।

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