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कभी कोसी की प्रमुख धारा रही धर्ममूला नदी आज संकट में, नदी संवाद में संरक्षण और पुनर्जीवन की

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सहरसा की ऐतिहासिक धर्ममूला नदी गाद, अतिक्रमण और प्रदूषण की वजह से संकट में है। नदी विशेषज्ञों ने संरक्षण के लिए समाज और सरकार से संयुक्त पहल की अपील की है।

सहरसा/आलम की खबर:मिथिला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी धर्ममूला नदी आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। कभी कोसी नदी के प्रवाह का एक प्रमुख मार्ग रही यह नदी वर्तमान समय में गाद जमाव, अतिक्रमण और बढ़ते प्रदूषण के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही है। नदी विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अगर समय रहते इसके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक जलधारा अपना अस्तित्व खो सकती है।

सहरसा जिले के बलुवाहा में रविवार को धर्ममूला नदी के संरक्षण को लेकर “संकटग्रस्त धर्ममूला का सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य” विषय पर नदी संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में नदी संरक्षण से जुड़े लोगों ने नदी के ऐतिहासिक महत्व, वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम में नदी मित्र ओम प्रकाश भारती ने कहा कि वर्तमान समय में जिसे धेमुरा नदी के नाम से जाना जाता है, वही प्राचीन धर्ममूला नदी है। यह नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि मिथिला की सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि सदियों से इस नदी ने क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन आज मानव हस्तक्षेप के कारण इसका प्राकृतिक स्वरूप लगातार प्रभावित हो रहा है।

नेपाल से निकलकर कोसी में मिलती है धर्ममूला

नदी विशेषज्ञों के अनुसार धर्ममूला नदी का उद्गम नेपाल के तराई क्षेत्र से होता है। यह नदी बिहार में प्रवेश करने के बाद सुपौल जिले के विभिन्न क्षेत्रों से होकर गुजरती है। आगे चलकर चैनसिंह पट्टी के आसपास यह दो धाराओं में विभाजित हो जाती है।

इसकी एक धारा धेमुरा और दूसरी धारा मनुआ या पुरैन धार के नाम से जानी जाती है। दोनों धाराएं सहरसा जिले के क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ती हैं और सलखुआ के समीप जाकर कोसी नदी में मिल जाती हैं।

ओम प्रकाश भारती ने बताया कि ऐतिहासिक रूप से कोसी नदी का प्रवाह भी कई समय तक धर्ममूला नदी के मार्ग से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि इस नदी का महत्व केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध क्षेत्र के भूगोल और इतिहास से भी रहा है।

धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है नदी

धर्ममूला नदी के किनारे मिथिला की कई महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरें विकसित हुई हैं। नदी संवाद में वक्ताओं ने बताया कि इस नदी का संबंध कई प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों और ऐतिहासिक स्थानों से रहा है।

कंदाहा सूर्य मंदिर, महिषी क्षेत्र से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं, संत कारू खिरहर और देवन ऋषि की मान्यताएं इस नदी क्षेत्र की पहचान का हिस्सा रही हैं। इसके अलावा कपलेश्वर स्थान, उग्रतारा शक्तिपीठ, नाकुचेश्वर शिव मंदिर और बाबा मटेश्वर धाम जैसे धार्मिक स्थलों का भी इस नदी क्षेत्र से गहरा संबंध माना जाता है।

वक्ताओं ने कहा कि धर्ममूला नदी के आसपास कई ऐसे पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं, जो क्षेत्र के पुराने इतिहास की कहानी बताते हैं। कर्णपुर, कोपागढ़ टीला, मंडनधाम टीला और पालकालीन अवशेष इस इलाके की ऐतिहासिक समृद्धि को दर्शाते हैं।

गाद और अतिक्रमण से प्रभावित हुआ प्राकृतिक प्रवाह

नदी संवाद में विशेषज्ञों ने कहा कि कभी कृषि और मखाना उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण रही धर्ममूला नदी अब कई समस्याओं से घिर चुकी है। नदी में लगातार जमा हो रही गाद के कारण इसका जल प्रवाह प्रभावित हो रहा है।

इसके अलावा नदी क्षेत्र में बढ़ता अतिक्रमण भी इसके प्राकृतिक स्वरूप के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। कई स्थानों पर नदी का फैलाव क्षेत्र कम होने से जल निकासी की क्षमता प्रभावित हुई है।

नदी मित्रों का कहना है कि नदी में बढ़ते भाकन और गाद की समस्या के कारण जलधारा कमजोर होती जा रही है। अगर समय रहते इसकी सफाई, पुनरुद्धार और प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करने की दिशा में काम नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

प्रदूषण भी बना बड़ी समस्या

धर्ममूला नदी के सामने एक बड़ी चुनौती प्रदूषण की भी है। कार्यक्रम में बताया गया कि कई क्षेत्रों से निकलने वाले नालों का पानी बिना उचित शोधन के नदी में पहुंच रहा है, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

विशेषकर सुपौल और नवहट्टा क्षेत्र से आने वाले गंदे पानी के कारण नदी पर दबाव बढ़ रहा है। नदी संरक्षण से जुड़े लोगों ने मांग की कि नालों के पानी को नदी में गिरने से पहले उसका उचित उपचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नदी केवल जल का स्रोत नहीं होती, बल्कि उसके आसपास रहने वाले लोगों की आजीविका, कृषि व्यवस्था और पर्यावरण संतुलन से भी जुड़ी होती है।

संरक्षण के लिए समाज और सरकार को साथ आना होगा

नदी संवाद कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि धर्ममूला नदी का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए स्थानीय समाज, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और प्रशासन को मिलकर काम करना होगा।

उन्होंने सुझाव दिया कि नदी की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, गाद हटाने की योजना बनाई जाए, अतिक्रमण रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था मजबूत की जाए।

वक्ताओं ने कहा कि धर्ममूला नदी मिथिला की पहचान का हिस्सा है। इसे बचाना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयास भी है।

कार्यक्रम में पूर्व मुखिया नरेश यादव, नदी कार्यकर्ता दीपक कुमार, डॉ. महेंद्र, अविनाश आर्या, विवेक झा, राकेश मिश्र सहित कई लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में धर्ममूला नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता जताई।

धर्ममूला नदी का इतिहास सदियों पुराना है, लेकिन वर्तमान चुनौतियां इसके भविष्य पर सवाल खड़ा कर रही हैं। अब जरूरत है कि समय रहते इसके संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक नदी को जीवित रूप में देख सकें।

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धर्ममूला नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी नदी का खत्म होना केवल पानी का खत्म होना नहीं होता, बल्कि उसके साथ जुड़ी परंपराएं, इतिहास और स्थानीय जीवन भी प्रभावित होते हैं।

आज जब नदियां अतिक्रमण और प्रदूषण की समस्या से जूझ रही हैं, तब संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार पर छोड़ना उचित नहीं होगा। प्रशासनिक पहल के साथ समाज की भागीदारी भी जरूरी है।

धर्ममूला जैसी ऐतिहासिक नदी को बचाने के लिए समय रहते कदम उठाना जरूरी है, ताकि क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सके।

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