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पुलिस उत्पीड़न मामले में हाईकोर्ट सख्त, मुरार थाने के पूर्व थानाध्यक्ष पर केस दर्ज कर CID जांच का आदेश

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पटना हाईकोर्ट ने बक्सर के मुरार थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष कमल नयन पांडेय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने मामले की जांच CID को सौंपते हुए डीजीपी से 30 दिनों में रिपोर्ट मांगी है।

पटना/आलम की खबर:बिहार में पुलिस कार्रवाई से जुड़े एक गंभीर मामले में पटना हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा आदेश जारी किया है। कोर्ट ने बक्सर जिले के मुरार थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष कमल नयन पांडेय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही पूरे मामले की जांच बिहार अपराध अनुसंधान विभाग यानी CID को सौंपने का आदेश दिया गया है।

मामला कथित पुलिस उत्पीड़न और हिरासत में मारपीट से जुड़ा हुआ है। इस मामले में भोजपुर निवासी मनीष कुमार की ओर से पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई।

याचिकाकर्ता मनीष कुमार का आरोप है कि जुलाई 2024 में वह दस्तावेज अपलोड कराने के सिलसिले में मुरार थाना पहुंचे थे। इसी दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की गई। आरोप है कि इस घटना में उनकी दोनों टांगों में गंभीर चोट आई और वह टूट गईं।

मनीष कुमार के अनुसार, घटना के बाद उन्होंने पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उनकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने न्याय पाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से अलग पक्ष रखा गया। पुलिस ने अदालत को बताया कि चोट बारिश के दौरान फिसलने के कारण लगी थी। हालांकि कोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों और मेडिकल रिपोर्ट को देखते हुए इस दलील पर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड और एक्स-रे रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद कहा कि उपलब्ध तथ्यों से प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराध की संभावना दिखाई देती है। ऐसे में मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जाए और जांच की जिम्मेदारी CID को दी जाए। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच ऐसी एजेंसी से होनी चाहिए जिससे पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ सके।

इसके साथ ही पटना हाईकोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि 30 दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाए। कोर्ट ने जांच की प्रगति और पुलिस कार्रवाई पर भी नजर रखने की बात कही है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता को जांच से संतुष्टि नहीं होती है या आगे किसी तरह की आवश्यकता महसूस होती है तो वह भविष्य में सीबीआई जांच की मांग को लेकर अदालत का रुख कर सकता है।

इस पूरे मामले के बाद पुलिस विभाग में भी चर्चा तेज हो गई है। अदालत का यह आदेश पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही और हिरासत में लोगों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस पर लगे गंभीर आरोपों की जांच पारदर्शी तरीके से होना जरूरी है, ताकि दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई हो सके और निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।

फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद FIR दर्ज करने और CID जांच की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। अब जांच एजेंसी घटना से जुड़े सभी पहलुओं, दस्तावेजों, मेडिकल रिपोर्ट और संबंधित लोगों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।

यह मामला एक बार फिर पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया को लेकर चर्चा में आ गया है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब सभी की नजर CID जांच और आने वाली कार्रवाई रिपोर्ट पर रहेगी।

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पुलिस व्यवस्था जनता की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए होती है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति की ओर से पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए जाते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी हो जाती है।

पटना हाईकोर्ट का यह आदेश इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र जांच एजेंसी CID को जांच की जिम्मेदारी दी है।

किसी भी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगना और आरोप साबित होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए जांच प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से पूरा करना जरूरी है। इससे जहां दोषी पर कार्रवाई होगी, वहीं पुलिस व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी मजबूत होगा।

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